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सर्वोच्च न्यायालय में रवि लामिछाने के खिलाफ मामले का निर्णय कैसे होगा?

समाचार सारांश

समीक्षा के बाद प्रस्तुत।

  • महान्यायवादक सविता भण्डारी ने रवि लामिछाने के खिलाफ सहकारी ठगी के मामले में लगे संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप हटाने का निर्णय लिया था।
  • महान्यायवादक के निर्णय के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी सहित कई ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट दायर की है और दो दिन से सुनवाई जारी है।
  • यदि सर्वोच्च न्यायालय निर्णय को स्वीकृति देता है तो संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के मामले वापस होंगे और रवि लामिछाने की सांसद के रूप में निलंबन की स्थिति समाप्त हो जाएगी।

३ चैत, काठमांडू। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के सभापति रवि लामिछाने के खिलाफ आपराधिक मुकदमे में संशोधन करने वाले महान्यायवादक के निर्णय के खिलाफ दायर रिट याचिकाओं की सुनवाई दो दिन से सर्वोच्च न्यायालय में हो रही है।

उनके खिलाफ सहकारी ठगी के मामले में लगे संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप हटाने के लिए महान्यायवादक सविता भण्डारी ने संशोधन की मंजूरी दी थी, जिसका विरोध सर्वोच्च न्यायालय में जारी है।

पांच विभिन्न अदालतों में मुकदमे

विभिन्न सहकारी संस्थाओं से गोर्खा मीडिया में आये धन को ग्यालेन्सी टेलिविजन के प्रबंध निदेशक के रूप में खर्च करने के आरोप में अघिल्लो सरकार ने रवि लामिछाने के खिलाफ पांच जिला अदालतों में सहकारी ठगी के मुकदमे दायर किए थे।

इनमें से कास्की जिला अदालत में संपत्ति शोधन का आरोप लगा है जबकि चितवन के अलावा अन्य जिला अदालतों में संगठित अपराध के आरोप भी हैं।

विशेष रूप से, संपत्ति शोधन के मामले से लामिछाने की सार्वजनिक पद ग्रहण में बाधा उत्पन्न होने की संभावना को ध्यान में रखते हुए महान्यायवादक ने विभिन्न जिला अदालतों में चल रहे मामलों को संशोधित करने का निर्णय लिया था।

महान्यायवादक के निर्णय के मुख्य अंश

महान्यायवादक भण्डारी ने २ माघ २०७९ को अपना निर्णय काठमांडू, रुपन्देही और कास्की के जिला अदालतों में दायर याचिकाओं की समीक्षा के आधार पर दिया। रवि लामिछाने ने इन सरकारी वकील कार्यालयों में राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में सहकारी ठगी, संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के मामले दायर होने का दावा कर संशोधन के लिए याचिका दी थी।

गत ३ पुष को रुपन्देही के सुप्रीम सहकारी के बचतकर्ता नारायणबहादुर पहराई ने “रवि लामिछाने के खिलाफ किटानी न देने का हवाला देते हुए शिकायत बदलने की मांग की” जिसे आधार मानकर आरोपपत्र संशोधन की प्रक्रिया शुरू हुई। निर्णय में चितवन, कास्की, रुपन्देही, काठमांडू और पर्सा की जिला अदालतों में दायर मामलों का विवरण शामिल है।

निर्णय के अनुसार बचतकर्ताओं ने महान्यायवादक के कार्यालय तक आकर यह बताया कि किनके विरुद्ध मामला है, यह उनका विषय नहीं, बल्कि बचत राशि की वापसी मुख्य मुद्दा है। इसी के आधार पर आरोपपत्र संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

निर्णय के चार आधार

पहला, महान्यायवादक ने सहकारी से रकम वापसी को आरोपपत्र संशोधन का मुख्य आधार बनाया। यदि संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप बरकरार रहेंगे तो बचत राशि वापस नहीं हो सकेगी इसलिए ‘आरोपित दोषी हो या न हो’ बचत वापसी को प्राथमिकता देना जरूरी है।

दूसरा, कुछ सहकारी ने ठगी कर फर्जी लोन लिया एवं कुछ ने अपनी कंपनियों में निवेश किया मामले की जांच की गई। उनकी संपत्ति जब्त कर बचत राशि वापसी न हो पाने पर संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप मामले का समाधान रोक रहे हैं।

तीसरा, संसदीय विशेष जांच समिति ने भी मामला उठाया लेकिन बचतकर्त्ता की राशि वापसी को प्राथमिकता देने के कारण संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप निरर्थक हो जाएंगे।

निर्णय में कहा गया है कि “सहकारी से धन के अवैध लेनदेन करने वालों के खिलाफ कानूनी कारवाही जारी रखते हुए संशोधित कानून के अनुसार निक्षेप वापसी द्वारा समाधान संभव है जो राज्य की जिम्मेदारी एवं पीड़ितों की भावना संरक्षण करेगा।”

चौथा, दफा ३६, मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता, २०७४ के तहत आरोपपत्र संशोधन संभव है, इसलिए महान्यायवादक ने सहकारी ठगी के अलावा संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के अभियोग वापस लेने की अनुमति दी।

महान्यायवादक ने ३० पुष को “निज के हक में” शब्द जोड़कर केवल रवि लामिछाने के लिए संशोधन स्वीकृत की थी, पर दो दिन बाद यह शब्द हटाकर सभी अभियुक्तों के लिए लागू कर दिया।

निर्णय का प्रभाव

महान्यायवादक के निर्णय के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी, अधिवक्ता आभास रेग्मी और युवराज पौडेल ने अलग-अलग सर्वोच्च न्यायालय में रिट दायर की है। सुनवाई रविवार से चल रही है।

न्यायाधीश शारंगा सुवेदी और सुनिलकुमार पोखरेल की अदालत इस निर्णय का न्यायिक परीक्षण करेगी। जल्द से जल्द एक-दो दिनों में या सप्ताह भर के अंदर फैसले की उम्मीद है।

यदि सर्वोच्च न्यायालय महान्यायवादक के निर्णय को मान्यता देता है तो रवि लामिछाने सहित गोरखा मीडिया से जुड़े सभी व्यक्तियों के विरुद्ध संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के मामले वापस लिए जाएंगे।

मुकदमे वापस लेने पर संपत्ति शोधन के आरोपों के कारण सांसद के रूप में निलंबित रहने की स्थिति समाप्त हो जाएगी और पांच अदालतों में विचाराधीन मामलों के पक्षकारों के साथ समझौता करना आसान होगा।

लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय महान्यायवादक के निर्णय को खारिज करता है तो रवि लामिछाने के खिलाफ मामले यथावत रहेंगे, जिससे उनके सांसद के रूप में गतिविधियों पर प्रतिबंध लग सकता है।

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