
समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा पश्चात तयार।
- २०६२/६३ के जनआंदोलन के बाद कम्युनिस्ट पार्टियों ने नेपाली संसद की प्रमुख शक्ति हासिल की और पाँच प्रधानमंत्री, दो राष्ट्रपति तथा पाँच सभामुख बनाए।
- २०७४ के बाद कम्युनिष्ट पार्टियों का मत प्रतिशत घटता गया और वे अब संयुक्त रूप से २३ प्रतिशत मत लेकर तीसरी शक्ति बन गए हैं।
- २०८२ के जेनजी आंदोलन ने युवाओं में कम्युनिष्ट पार्टी के प्रति असंतोष बढ़ाया और एक नई युवा शक्ति राजनीतिक रूप से उभरी।
- पश्चिम बंगाल में ३४ वर्षों तक शासन करने वाली CPI (एम) जनता से संपर्क टूटने पर ध्वस्त हुई, वैसे ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी उसी मार्ग पर चल रही हैं।
२०६२/६३ के ऐतिहासिक जनआंदोलन के बाद कम्युनिस्ट पार्टियों ने नेपाली संसद की प्रमुख सत्ता प्राप्त की। कम्युनिस्ट पार्टी से पाँच प्रधानमंत्री, दो राष्ट्रपति और पाँच सभामुख चुने गए। गणतंत्र के पहले प्रधानमंत्री, पहली महिला राष्ट्रपति, पहली महिला सभामुख और बहुमत तथा दो-तिहाई सरकार का अवसर प्राप्त करने वाला यह आंदोलन आज इतिहास के दयनीयतम दौर में पहुँच गया है। कभी ‘नेता मतलब सेवक’ की सोच पर आधारित इस आंदोलन ने अब ‘नेता मतलब मालिक’ की राह पकड़ी है।
ऐतिहासिक पतन की कहानी
२०६४ में कम्युनिस्ट पार्टियों को ५७ प्रतिशत मत और ६१ प्रतिशत सीटें मिलीं, जिससे वे संविधान सभा की सबसे शक्तिशाली शक्ति बने। २०७४ में ४८ प्रतिशत मत और ६४ प्रतिशत सीटें जीत कर और भी मजबूत हुए। लेकिन इसके बाद से उल्टा रास्ता शुरू हुआ। अब संयुक्त रूप से २३ प्रतिशत मत और १७ प्रत्यक्ष तथा २५ समानुपातिक सीटें जीत कर ये कमज़ोर तीसरी शक्ति बन गए हैं। इतनी तेजी से यह बदलाव कैसे हुआ?
पहले नेता के कमरे में देर रात बहस करने वाले कार्यकर्ता अब गेट के बाहर ठहरे रहते हैं। नेताओं का देवत्वकरण हुआ, उनकी मुलाकात भी मुश्किल हुई, न वार्ता न विचारों पर बहस संभव है। हर निर्णय ‘अंतिम सत्य’ बन गया, आलोचकों को ‘पार्टी विरोधी’ कहा गया। आंतरिक लोकतंत्र बर्बाद हो गया।
स्वीय सचिवों की बात ही क्या? वे नेता और जनता के बीच सेतु बनने की बजाय दीवार बन गए। दलाल, कमीशनखोर और ठेकेदारों का तो उनके दरबार में स्वागत था, लेकिन जनता और ईमानदार कार्यकर्ता बाहर ही रह गए। पार्टी में घुसपैठ के लिए उनके दर्शन आवश्यक मानदंड बन गए।
पीढ़ियों का सपना और तीनों नेताओं का अहंकार
पुष्पलाल, मनमोहन और मदन द्वारा शुरू किया गया आंदोलन प्रचंड के समय २०६४ में अपनी चरम सीमा पर था। लेकिन २०८२ में आते-आते, ओली और प्रचंड के युग में, वह आंदोलन पतन की कगार पर पहुंच गया है। क्योंकि उन्होंने दो लोगों को छोड़कर किसी और को नेतृत्व में स्वीकार नहीं किया। खुद को अध्यक्ष बनाए रखने की और दूसरों को दबाने की प्रवृत्ति ने आंदोलन को कमजोर कर दिया। प्रचंड अपनी सीमित घेराबंदी में लगे रहे जबकि ओली अहंकार और घमंड में डूबे रहे।
दक्षिणपंथी सुधारवादी धाराओं में चल कर वे नातावाद, कृपावाद और चापलूसी में फंसे। प्रचंड पर नातावाद के आरोप अधिक लगे। थानकोट से खुमलटार घूमने के बाद गाँव के सच्चे नेता नजरअंदाज हुए। पिरामिड संगठन उल्ट गया और अंतत: ध्वस्त हो गया।
आत्मालोचनाओं की समाप्ति
जो कम्युनिस्ट पार्टियाँ पारदर्शिता का नारा देती थीं, वे भ्रष्टाचार के सागर में डूब गईं। बड़ी घोटालों में कम्युनिस्ट नेताओं के नाम आने लगे तो जनता का विश्वास टूट गया। पश्चिम बंगाल में ३४ वर्षों शासन करने वाली CPI (एम) जमीन अधिग्रहण, भ्रष्टाचार और जनता से संपर्क टूटने के कारण वर्षों में ध्वस्त हुई, वैसी ही दशा नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों की भी है।
बंदूक उठाने वालों का महत्व संसद में कम हुआ, जबकि भ्रष्ट दलाल और ठेकेदारों का महत्व बढ़ा। युद्ध में शामिल कई अपंग और घायल व्हीलचेयर तक सीमित हैं, उनकी पत्नियाँ खाड़ी देशों में कड़ी मेहनत कर रही हैं। वर्तमान कम्युनिस्ट नेतृत्व नवसामंतवाद और पूंजीवाद का वाहक बन चुका है।
कम्युनिस्ट वही हैं, पर जनता अब वही नहीं रही। पहले जो दूसरों को ठगते थे, इस बार खुद जनता के साथ धोखा किया।
जनता ने २०६४ और २०७४ में बड़ी उम्मीदों के साथ कम्युनिस्टों को वोट दिया। पर सत्ता में आने पर नेताओं को सत्ता का नशा चढ़ा, वे झगड़े में व्यस्त रहे, एक-दूसरे की कमियां दिखाने में लगे और अंततः सब बेनकाब हुए। इसके मुख्य नायक केपी शर्मा ओली, प्रचंड और माधवकुमार नेपाल हैं। आश्चर्य की बात यह है कि वे गलती मानने की बजाय अमेरिका और भारत को दोष देते रहे। अपनी विफलताओं की बजाय विदेशी फोड़ने को सफलता समझा।
जेनजी पीढ़ी का आक्रोश
२०८२ के जेनजी आंदोलन ने पुराने दलों खासकर कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति युवाओं में गहरा असंतोष दिखाया। रोजगार, सुशासन और स्थिरता मांगने वाले युवाओं ने कम्युनिस्ट पार्टी पर भरोसा करना बंद कर दिया। ‘पिताजी के दौर की क्रांति, अपने दौर का निराशा’ की भावनाओं ने आंदोलन को बड़ा झटका दिया।
राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) जैसी नई शक्तियों ने पुराने दलों के विकल्प खोज रहे जनता को अपनी ओर आकर्षित किया। परिवर्तन के नारे और नई शैली ने युवाओं और मध्यम वर्ग को प्रभावित किया। २०७४ में ६० प्रतिशत मत पाकर सत्ता में रहने पर जनता को सेवा प्रदान न कर पाने से जनता स्वाभाविक रूप से नए नेतृत्व की ओर मुड़ी।
भदौ २०८२ के जेनजी आंदोलन के बाद नेपाल की राजनीति में परिवर्तन की लहर दौड़ी। पुराने दल सत्ता से हटे और नई युवा शक्ति उभरी। केपी ओली झापा-५ से ४० साल छोटे बालेन्द्र शाह से लगभग ५० हजार मतों से हार गए। प्रचंड ने जीत हासिल की, पर कई कम्युनिस्ट नेता इस बदलाव का कड़वा परिणाम भुगत रहे हैं।
युद्ध में घायल हुए अनेक लोग अब व्हीलचेयर तक सीमित हैं, उनकी पत्नियाँ खाड़ी देशों में कठिन मेहनत कर रही हैं। कम्युनिस्ट नेतृत्व नवसामंतवाद और पूंजीवाद का समर्थक बन चुका है।
निष्कर्ष
जब पार्टियाँ अपने मूल सिद्धांतों और जनता के विश्वास से दूर हो जाती हैं, तब उनके बीच का फर्क मिट जाता है। फिर नीति, कार्यशैली, वादे और परिणाम सब समान हो जाते हैं। २०८२ के चुनाव में यही बात दिखी। कम्युनिस्ट वही हैं, पर जनता वही नहीं रही। जिसने हमेशा दूसरों को धोखा दिया, इस बार उसने अपनी जनता को धोखा दिया।
अब कहा जाने लगा है, ‘जनता जाग चुकी है, अब नेताओं की बारी है।’ जोखिम लेकर भी नई युवा पीढ़ी को अवसर देना जनता का यह निर्णय आने वाले राजनीतिक बदलाव का मार्ग प्रशस्त करेगा।
कम्युनिस्ट शक्तियाँ आज एक बड़े प्रश्न के सामने हैं, क्या वे पूरी तरह से सच्चेंगे या फिर टूटेंगे।
(गण्डकी प्रदेश नीति तथा योजना आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. अधिकारी, वर्तमान में चीन के लान्झोउ विश्वविद्यालय के तृतीय ध्रुव पर्यावरण केंद्र में शोधकर्ता हैं।)






