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ओली, लेखक समेत प्रधानसेनापति सिग्देल जेनजिए आन्दोलनका दोषी घोषित

समाचार सारांश

  • राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग ने २३ और २४ भदौ की घटनाओं की जांच रिपोर्ट आयोग के अध्यक्ष तपबहादुर मगर को सौंप दी है।
  • रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने जेनजिए आंदोलन के दौरान सुरक्षा योजना प्रभावी ढंग से लागू नहीं करने का निष्कर्ष निकाला है।
  • रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है और आयोग ने ९० लोगों से बयान लिया है।

६ चैत, काठमांडू। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने २३ और २४ भदौ की घटनाओं की जांच के लिए गठित समिति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, गृहमंत्री रमेश लेखक, प्रधानसेनापति अशोकराज सिग्देल सहित राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करते हुए रिपोर्ट तैयार की है।

शुक्रवार को आयोग के अध्यक्ष तपबहादुर मगर के समक्ष समिति ने जांच के बाद तैयार की गई रिपोर्ट प्रस्तुत की।

आयोग की सदस्य डॉ. लिली थापा के संयोजन में आयोग ने जेनजिए प्रदर्शन के दौरान हुए मानवाधिकार उल्लंघन की जांच के लिए समिति गठित की थी। आयोग के प्रवक्ता टीकाराम पोखरेल ने कहा, ‘अनुसंधान समिति ने अध्यक्ष को रिपोर्ट सौंप दी है। अब आयोग की पूर्ण बैठक में इस विषय पर निर्णय लिया जाएगा।’

जांच रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने जेनजिए आंदोलन के दौरान अपनी भूमिका प्रभावी रूप से निभाने में विफल रहने का निष्कर्ष निकाला है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी सुरक्षा परिषद की है, लेकिन घटना की गंभीरता के कारण आवश्यक सुरक्षा योजना बनाने और लागू करने की कार्यवाही नहीं हुई।

‘रिपोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारियों को दोषी माना है और मानवाधिकार उल्लंघन में कार्रवाई की सिफारिश की है,’ सूत्र ने बताया, ‘आयोग रिपोर्ट पारित करने के बाद सिफारिशों को लागू करेगा।’

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सुरक्षा परिषद गठित होती है, जिसमें रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, विदेश मंत्री, अर्थ मंत्री, मुख्य सचिव और प्रधान सेनापति सदस्य होते हैं। रक्षा मंत्रालय के सचिव सदस्य सचिव के रूप में होते हैं।

आंदोलन के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी ओली सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष थे। उपप्रधानमंत्री एवं अर्थ मंत्री विष्णुप्रसाद पौडेल, गृह मंत्री रमेश लेखक, विदेश मंत्री डॉ. आरजु राणा देउवा, रक्षा मंत्री मानवीर राई, मुख्य सचिव एकनारायण अर्याल, और प्रधान सेनापति अशोक सिग्देल सदस्य थे।

सुरक्षा परिषद के सभी सदस्यों के खिलाफ मानवाधिकार आयोग अधिनियम तथा अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली, गृहमंत्री लेखक, संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुङ, नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक चन्द्रकुवेर खापुङ, सशस्त्र पुलिस महानिरीक्षक राजु अर्याल सहित कई अन्य से बयान भी लिया है।

पूर्व गृहमंत्री रवि लामिछाने, काठमांडू महानगर के मेयर बालेन्द्र शाह, कलाकार दीपकराज गिरि, निशचल बस्नेत सहित और व्यक्तियों से भी बयान लिए गए थे।

प्रधान सेनापति अशोकराज सिग्देल को भी बयान के लिए बुलाया गया था, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए, आयोग के सूत्र ने जानकारी दी।

शुक्रवार मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष तपबहादुर मगर को रिपोर्ट सौंपते हुए जांच समिति संयोजक डॉ. लिली थापा।

समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षा योजना भी प्रभावी रूप से लागू नहीं हुई, आंदोलन नियंत्रण के लिए चरणबद्ध बल प्रयोग न करके एक साथ अत्यधिक बल और घातक हथियार उपयोग किया गया। ऐसी घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

आयोग ने जेनजिए आंदोलन के नेताओं और सड़क पर नेतृत्व करने वालों की भूमिकाओं का भी विस्तार से अध्ययन किया है।

२३ भदौ के आंदोलन की पूर्व तैयारी का भी व्यापक मूल्यांकन किया गया। विभिन्न सोशल मीडिया में प्रसारित संदेशों और वीडियो का अध्ययन किया गया। डिस्कॉर्ड समेत सामाजिक मीडिया पर बम बनाने की शिक्षा देने, नेताओं एवं व्यवसायियों के घर और कार्यालय के नक्शे साझा करने की गतिविधियां भी पाई गईं, सूत्र ने बताया।

आयोग ने ३-४ सौ संदेश, वीडियो, ऑडियो आदि का अध्ययन किया है। फॉरेंसिक और बैलिस्टिक दोनों प्रकार की रिपोर्टों के साथ घटनाओं का गहराई से विश्लेषण किया गया।

२३ भदौ को हुई पुलिस गोलीबारी में मारे जाने वालों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट अधिकांशतः कमर के ऊपर गोली लगने की पुष्टि करती हैं, जिसे आयोग ने प्राप्त किया है।

उस समय काठमांडू महानगर पालिका की भूमिका और रवि लामिछाने की जेल से रिहाई के दौरान हुए मानवाधिकार मामले पर भी आयोग ने जांच की। तत्कालीन मेयर बालेन्द्र शाह और रवि लामिछाने से बयान लेकर उनकी भूमिका समझी गई।

जेनजिए आंदोलन में हुई घटनाओं की जांच के लिए सरकार ने गौरी बहादुर कार्की की अध्यक्षता में एक जांच आयोग बनाया था, जो हाल ही में रिपोर्ट प्रस्तुत कर चुका है, लेकिन वह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है।

मानवाधिकार आयोग ने विशुद्ध मानवाधिकार और जवाबदेही के दृष्टिकोण से जांच की बताई है, विशेष रूप से अत्यधिक बल उपयोग के मुद्दे को केंद्र में रखा गया।

डॉ. लिली थापा के संयोजन में ६ सदस्यों वाली समिति ने लगभग ६ सौ पृष्ठों से अधिक लंबी रिपोर्ट तैयार की है। अनुसूची सहित कुल लगभग १० हजार पृष्ठों की रिपोर्ट बनी है।

आयोग ने बताया कि मानवाधिकार उल्लंघन हुआ या नहीं, तथा आंदोलन में अत्यधिक बल प्रयोग हुआ या नहीं, इस पर रिपोर्ट केंद्रित है।

आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, गृहमंत्री रमेश लेखक, काठमांडू महानगर के मेयर बालेन्द्र शाह सहित ९० लोगों से बयान लिए थे। दूसरे चरण में ५ सय ६ लोगों से पूछताछ की गई।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारी, नेपाल पुलिस तथा सशस्त्र पुलिस के महानिरीक्षक और कमांडर, जिला सुरक्षा समिति के अधिकारी आदि से भी आयोग ने बयान लिए।

‘आंदोलन के समय की जिम्मेदारियों और भूमिकाओं का विस्तार से अध्ययन किया गया है,’ सूत्र ने बताया।

सरकारी रिपोर्ट में दो दिन की घटनाओं में ७७ मौतें बताई गई हैं जबकि आयोग की रिपोर्ट में ७६ मौतें दर्ज हैं। घायलों की संख्या २४९ बताई गई है।

आंदोलन के दौरान मारे गए लोगों के परिवार, घायल, आंदोलन आयोजक, जेनजिए नेता, सड़क पर मौजूद प्रदर्शनकारी, और आंदोलन में शामिल कलाकार और पेशेवरों से भी पूछताछ की गई।

आयोग की टीम और क्षेत्रीय कार्यालयों ने ४५ जिलों में स्थल अध्ययन किया था और सभी ७७ जिलों का भी निरीक्षण किया गया। दो दिन की घटनाओं के सैकड़ों सीसीटीवी फुटेज का फॉरेंसिक अध्ययन रिपोर्ट में शामिल है।

मानव अधिकार आयोग ने गत १५ चैत को तीनकुने में हुए राजावादी आंदोलन की भी रिपोर्ट बनाई थी, जो अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है।