इरानी शासन प्रणाली ‘टिकी हुई लेकिन कमजोर’ : अमेरिकी गुप्तचर प्रमुख तुलसी गबार्ड

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संयुक्त राज्य अमेरिका की गुप्तचर एजेंसी की शीर्ष अधिकारी तुलसी गबार्ड ने कहा है कि ईरानी शासन प्रणाली “टिकी हुई है लेकिन काफी कमजोर” हो चुकी है।
अमेरिकी कांग्रेस की एक संसदीय सुनवाई में राष्ट्रीय गुप्तचर निदेशक तुलसी गबार्ड और ट्रम्प प्रशासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने विश्वभर अमेरिका को झेल रहे खतरों पर अपने बयान दिए। यह सुनवाई बुधवार को संपन्न हुई।
पिछले महीने अंत में शुरू हुए युद्ध के बाद, अमेरिकी अधिकारी पहली बार गुप्तचर मामलों पर सार्वजनिक जानकारी प्रदान कर रहे हैं। सुनवाई से पहले आतंकवाद विरोधी प्रमुख ने ईरान से तत्काल अमेरिका को कोई खतरा नहीं है कहते हुए इस्तीफा दिया था।
गबार्ड के अनुसार अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समस्या उत्पन्न होने की संभावना पहले से ही अनुमानित कर ली थी। उनके नेतृत्व में अमेरिकी गुप्तचर गतिविधियां संचालित होती हैं।
“गुप्तचर समुदाय का मानना है कि ईरानी शासन प्रणाली स्थिर तो है लेकिन नेतृत्व और सैन्य क्षमता की कमजोरी के कारण यह प्रणाली काफी कमजोर हो गई है,” उन्होंने कहा।
वे CIA, FBI, राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी और रक्षा खुफिया के प्रमुखों के साथ सुनवाई में उपस्थित थीं।
डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन ओसॉफ ने गबार्ड से बार-बार पूछा कि क्या वे अब ईरान को अमेरिका के लिए खतरा मानती हैं? लेकिन उन्होंने इस सवाल का जवाब देने से इंकार कर दिया।
“इस निर्णय का एकमात्र अधिकारी राष्ट्रपति हैं,” उन्होंने उत्तर दिया।
युद्ध शुरू होने के बाद रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों पार्टीयों के सांसद और विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं कि अमेरिकी आक्रमण क्यों हुआ और क्या ट्रम्प प्रशासन ने पहले से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समस्या आने का अनुमान लगा लिया था।
संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ईरान पर इसलिए भी चिंता जताते थे क्योंकि उन्होंने कहा था कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर रहा है और अमेरिका तथा इजरायल के लिए खतरा हो सकता है।
ईरान से क्या खतरा है?
मंगलवार को इस्तीफा देने के समय राष्ट्रीय काउंटर टेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट ने दावा किया था कि ‘‘इजरायल और अमेरिकी शक्तिशाली लॉबी के दबाव में ट्रम्प प्रशासन ने युद्ध शुरू किया।’
उन्होंने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर इस्तीफे में कहा था कि ईरान से अमेरिका को तत्काल कोई खतरा नहीं है।
बुधवार की सुनवाई में CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ ने इस बात से असहमति जताई।
“मेरे विचार में ईरान लंबे समय से अमेरिका के लिए निरंतर खतरा रहा है और अभी भी खतरा पैदा कर रहा है,” उन्होंने कहा।
गबार्ड ने कहा कि अमेरिकी और इजरायली आक्रमणों में ईरानी सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो गई है।
उनका कहना है कि 12 दिन के युद्ध के दौरान ईरान ने अपने परमाणु पूर्वाधार को हुए व्यापक नुकसान से खुद को बचाने का प्रयास किया और परमाणु जिम्मेदारी लेने से इनकार किया, यह निष्कर्ष गुप्तचर निकाले हैं।
विरोधाभास?
सुनवाई के लिए तैयार किए गए लिखित बयान में गबार्ड ने कहा था कि ये हमले ईरान के परमाणु कार्यक्रम को तहस-नहस कर चुके हैं और उसने पुनर्निर्माण प्रयास नहीं किए हैं, लेकिन उन्होंने यह हिस्सा पढ़कर सुनाया नहीं।
डेमोक्रेटिक सीनेटर मार्क वार्नर ने पूछा, तो गबार्ड ने बताया कि बयान काफी विस्तृत था इसलिए कुछ हिस्से संक्षेप में बताने पड़े।
“अर्थात आपने राष्ट्रपति के कुछ विरोधाभासी हिस्सों को हटा दिया,” वार्नर ने प्रश्न किया, ख़ासकर ट्रम्प के उस तर्क को लेकर जिसमें कहा गया कि ईरान ने परमाणु हथियार विकसित कर लिए हैं इसलिए सैन्य कार्रवाई ज़रूरी है।
संसदवालों ने भी पूछा कि ट्रम्प के ईरान पर हमले के निर्णय में गुप्तचर अधिकारियों की क्या भूमिका थी। स्वतंत्र सीनेटर एंगस किंग ने पूछा कि क्या निर्णय लेने के दौरान आप उस कमरे में थे?
रैटक्लिफ ने कहा कि वे राष्ट्रपति के साथ दर्जनों बैठकों में शामिल हुए हैं लेकिन किसी एक ख़ास फैसले की जानकारी उन्हें नहीं है।
किंग ने पूछा कि जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर हमला करने की संभावना जताई तो क्या गुप्तचर अधिकारियों ने ट्रम्प को सूचित किया था?
युद्ध की शुरुआत से ही इस संकीर्ण जल मार्ग को ईरान लगातार निशाना बना रहा है और तेल निर्यात बाधित कर रहा है।
रैटक्लिफ ने कहा, “राष्ट्रपति को निरंतर खुफिया जानकारी दी जाती है।” उनके अनुसार अमेरिकी ऊर्जा केंद्रों पर ईरान संभावित हमले कर सकता है इसलिए रक्षा विभाग ने सुरक्षा उपाय लागू कर लिए हैं।
गबार्ड ने कहा कि गुप्तचर एजेंसियां पहले ही अनुमान लगा चुकी थीं कि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण की कोशिश करेगा, इसलिए अमेरिकी रक्षा विभाग ने पूर्वसतर्क योजना शुरू की।





