
समाचार सारांश
- ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच 2026 के फरवरी 28 से शुरू हुए सैन्य संघर्ष ने मध्य पूर्व के लाखों प्रवासी श्रमिकों के जीवन को गंभीर जोखिम में डाल दिया है।
- भारत ने 16 मार्च तक लगभग 2 लाख 20 हजार नागरिकों को खाड़ी क्षेत्र से सुरक्षित निकालते हुए विश्व के सबसे बड़े कूटनीतिक उद्धार अभियान का संचालन किया है।
- नेपाल सरकार ने खाड़ी और युद्ध प्रभावित देशों में रहने वाले 17 लाख से अधिक नेपाली नागरिकों की सुरक्षा को उच्च प्राथमिकता देते हुए इमरजेंसी रिस्पांस टीम गठित कर उद्धार के लिए आवश्यक व्यवस्था की है।
6 चैत, काठमांडू। फरवरी 28, 2026 से शुरू हुए ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच सीधे सैन्य टकराव ने न केवल मध्य पूर्व के भूगोल को प्रभावित किया है, बल्कि वहाँ रहने वाले लाखों प्रवासी श्रमिकों के जीवन को भी गंभीर खतरे में डाल दिया है।
‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत अमेरिका और इजरायल ने ईरान के रणनीतिक केंद्रों पर हमला किया, जिसके जवाब में ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमला किया है, जिससे खाड़ी क्षेत्र युद्ध के मैदान में तब्दील हो गया है।
आर्थिक, भू-राजनीतिक प्रभावों तथा शक्ति संतुलन पर विविध विश्लेषण हो रहे हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न मानव सुरक्षा बना हुआ है।
युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में विशेष तौर पर दक्षिण एशियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जो दशकों से वहां की निर्माण और सेवा क्षेत्रों में कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

जोखिम की वर्तमान स्थिति और मानवीय मूल्य
गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के छह सदस्य देशों में लगभग 3 करोड़ 50 लाख से अधिक प्रवासी श्रमिक कार्यरत हैं।
ईरान द्वारा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और ओमान में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले के बाद पूरा गल्फ क्षेत्र ‘नो-फ्लाई जोन’ में तब्दील हो गया है।
इस क्षेत्र के 92 प्रतिशत श्रमिक यूएई में केंद्रित हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से दुबई और अबू धाबी जैसे व्यावसायिक स्थलों में हवाई उड़ानें ठप हो गईं, लोग भूमिगत बंकरों और सुरक्षित आश्रयों की तलाश में भाग निकले हैं।
मार्च 2026 के तीसरे सप्ताह तक की जानकारी के अनुसार, ईरानी हमलों के कारण यूएई और अन्य गल्फ देशों में कम से कम 14 आम नागरिक मारे जा चुके हैं, जिनमें 11 विदेशी शामिल हैं।
मृतकों में नेपाल, भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के श्रमिक शामिल हैं। अबू धाबी और दुबई जैसे व्यस्त शहरों में ड्रोन और मिसाइल के अवशेषों के कारण यातायात और श्रमिकों को नुकसान पहुंचा है।
धनी नागरिक निजी विमानों या वैकल्पिक मार्गों से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने में सफल रहे हैं, जबकि कम आय वाले श्रमिक ‘काम करने या जिंदा रहने’ की दुविधा में हैं। कई लोग परिवार को भेजे जाने वाले पैसे न रोकने के भय से काम छोड़ नहीं पा रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, इस समय ‘कफाला सिस्टम’ के कारण श्रमिक तत्काल कार्यक्षेत्र छोड़ पाने में असमर्थ हैं, जो बड़ी चुनौती है।

भारत की सफल कूटनीतिक नागरिक उद्धार योजना
भारत ने अपने नागरिकों को गल्फ से निकालने के लिए सफल कूटनीतिक योजना पेश की है। मार्च 16 तक भारत ने लगभग 2 लाख 20 हजार नागरिकों को खाड़ी क्षेत्र से सुरक्षित निकालकर विश्व का सबसे बड़ा उद्धार अभियान संचालित किया है।
मार्च 4, 2026 को भारत के विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली में 24 घंटे युद्ध नियंत्रण कक्ष स्थापित कर पूरी कूटनीतिक व्यवस्था को सक्रिय किया। इसने ‘मल्टी-मोडल’ परिवहन प्रणाली अपनाई, जिससे केवल हवाई मार्ग पर निर्भरता न रहे और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
मार्च 1 से 7 के बीच यूएई और सऊदी अरब से 52 हजार से अधिक भारतीय नागरिक लौटे। 9 मार्च तक यह संख्या 67 हजार से ऊपर पहुंच गई। भारत ने हवाई सेवा के साथ-साथ सड़क मार्ग का उपयोग भी कर सुरक्षित ट्रांजिट कराया।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खाड़ी के समकक्षों से संवाद कर भारतीय जहाजों के ‘स्पेशल कोरिडोर’ की अनुमति सुनिश्चित की।
भारतीय दूतावासों ने ‘प्रवासी भारतीय’ पोर्टल के माध्यम से नागरिकों को ट्रैक कर प्राथमिकता दी।
अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों की ‘टास्क फोर्स’ रणनीति
अमेरिका ने मध्य पूर्व में लगभग 10 लाख नागरिकों की सुरक्षा के लिए ‘स्टेट डिपार्टमेंट टास्क फोर्स’ स्थापित किया। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने सुरक्षित वापसी का आदेश देने के बाद सऊदी और यूएई से चार्टर उड़ानें चलाई गईं।
मार्च मध्य तक 28 हजार से अधिक अमेरिकी नागरिकों को सीधे सहायता मिली और 43 हजार से अधिक को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
यूरोपीय देशों ने सामूहिक रूप से ‘ईयू सिविल प्रोटेक्शन मैकेनिज्म’ चलाया। फ्रांस ने अबुधाबी से 180 और इजरायल से 205 नागरिकों को तुरंत सुरक्षित निकाला। ब्रिटेन ने एक लाख 30 हजार पंजीकृत नागरिकों में से 4 हजार को ओमान के मस्कट से स्वदेश वापस भेजा।
इटली ने सऊदी, कुवैत और कतर के स्थलीय मार्गों से 25 हजार से अधिक नागरिकों को सुरक्षित निकास कराया।
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने मस्कट (ओमान), अम्मान (जॉर्डन), और शार्म एल-शेख (मिस्र) को महत्वपूर्ण उद्धार केंद्र बनाया।
नीदरलैंड्स ने यूएई से बस द्वारा ओमान पहुंचा कर मिस्र के हुरगाडा होते हुए एम्स्टर्डम तक पहुंचाने में सफल 75 से अधिक नागरिकों को सुरक्षित निकास दिलाया। इसके लिए संबंधित देशों के दूतावासों ने ‘रैपिड कांसुलर सपोर्ट टीम’ तैनात की।

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संघर्ष और नागरिक प्रबंधन
फिलीपींस, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, और बांग्लादेश को लाखों नागरिकों को एक साथ वापस लाने में आर्थिक और तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
फिलीपींस ने 20 लाख से अधिक नागरिकों में से 1,416 को बचाया है। इंडोनेशिया ने जेद्दा में मौजूद 10,060 तीर्थयात्रियों को विशेष विमान से जकार्ता भेजा।
पाकिस्तान की स्थिति जटिल है; ईरान की सीमा के समीप होने के कारण 792 नागरिकों को अजरबैजान के रास्ते स्वदेश भेजा गया।
मलेशिया ने 431, दक्षिण कोरिया ने 500 से अधिक नागरिकों को यूएई से चार्टर विमानों द्वारा वापस लाया। थाईलैंड ने 292 नागरिकों को तुर्की के मार्ग से स्वदेश भेजा।

ओमान और कतर का ‘मानवीय कोरिडोर’
इस युद्ध में ओमान और कतर ने मानवता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
यूएई और सऊदी के हवाई क्षेत्र असुरक्षित होने पर ओमान ने अपने स्थलीय और हवाई मार्ग विदेशी नागरिकों के उद्धार के लिए खोल दिए।
यूएई में फंसे हजारों विदेशी बस के ज़रिए ओमान की सीमा पार कराए गए और वहां से सुरक्षित उड़ानों की व्यवस्था की गई।
कतर ने अपने आधुनिक हवाई अड्डों और बड़े विमानों का आपातकालीन उद्धार के लिए उपयोग किया और युद्धरत पक्षों के साथ वार्ता कर ‘ह्यूमैनिटेरियन कोरिडोर’ सुनिश्चित किया, जिसने हवाई अड्डों पर फंसे यात्रियों को सुरक्षित निकाला।
पोलैंड और सिंगापुर जैसे देशों ने भी अपने नागरिकों को निकालने के लिए सैन्य विमान भेजे, जो युद्ध की गंभीरता को दर्शाता है।
नेपाल की स्थिति और तैयारी
विदेश मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार खाड़ी और युद्ध प्रभावित देशों में लगभग 17 लाख 29 हजार 288 नेपाली निवासी हैं। बिना कागजात वालों की संख्या मिलाकर यह 20 लाख के करीब पहुंचेगी, मंत्रालय का दावा है।
ईरान में पहले 6 नेपाली थे, अब 4 और संपर्क में आए हैं और सभी 10 सुरक्षित हैं। उन्होंने भारतीय जहाज के जरिए वापसी के लिए पंजीकरण करवा दिया है।
मध्य पूर्व के देशों में नेपाली श्रमिकों की संख्या बड़ी है, विशेषकर यूएई में लगभग 7 लाख, सऊदी अरब में 3 लाख 84 हजार 865, कतर में 3 लाख 57 हजार 913 हैं।

विदेश मंत्रालय के आंकड़े अनुसार कुवैत में 1 लाख 75 हजार, इराक में 30 हजार, बहरीन में 28 हजार और ओमान में 25 हजार नेपाली हैं। साथ ही साइप्रस में 17 हजार, इजरायल में लगभग 6 हजार 500, लेबनान में 1,500 और मिस्र में 500 नेपाली निवास करते हैं।
सरकार ने उन देशों में श्रम स्वीकृति, एनओसी और मांगपत्र प्रमाणीकरण को रोक दिया है, लेकिन चैत 4 को श्रम, रोजगार एवं सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय ने खाड़ी क्षेत्र के 7 देशों में स्वीकृति पुनः खोलने का निर्णय लिया है।
नेपाल सरकार ने इन देशों में रहने वाले नेपाली नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और चल रही घटनाओं की लगातार समीक्षा कर रही है।
विदेश मंत्रालय ने सचिव अमृतबहादुर राई के नेतृत्व में ‘इमरजेंसी रिस्पांस टीम’ गठित की है, जिसमें गृह, अर्थव्यवस्था, कानून, संस्कृति पर्यटन, नागरिक उड्डयन, शिक्षा, श्रम, वैदेशिक रोजगार और अन्य विभागों के प्रतिनिधि शामिल हैं।
ईआरटी के निर्देशानुसार युद्ध प्रभावित देशों में स्थित 10 राजदूतावासों और मिशनों को रोजाना ‘स्थिति विश्लेषण रिपोर्ट’ भेजी जाती है। विदेश मंत्रालय में 24 घंटे ‘इमरजेंसी कंट्रोल रूम’ स्थापित किया गया है।
साथ ही नेपाली नागरिकों के राहत और उद्धार के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल भी विकसित किया गया है, जिसमें शुक्रवार तक 81 हजार 100 नागरिकों ने पंजीकरण किया है।
सरकार ने कुवैत और कतर से सऊदी होते हुए नेपाल वापसी की व्यवस्था की है। कुवैत और कतर से सऊदी तक सड़क मार्ग उपलब्ध कराया गया है और सऊदी से हवाई मार्ग द्वारा नेपाल पहुंचने का प्रबंध है।
दूतावास अपने व्यय से नेपाल वापस जाना चाहने वालों के लिए यह सेवा उपलब्ध करा रहे हैं।
वर्तमान में इराक, कुवैत, और बहरीन के हवाई उड़ानें बंद हैं जबकि कतर और यूएई की उड़ान सीमित मात्रा में खुली हैं। सऊदी के रियाद, दम्माम और ओमान के हवाई मार्ग पूरी तरह से खुले हैं।

अब तक लगभग हजार नेपाली विभिन्न मार्गों से स्वदेश लौट चुके हैं। कुछ को दूतावासों ने सहायता की है और कुछ को सरकारी निकायों के समन्वय से लौटाया गया है।
नेपाल वायुसेवा निगम और हिमालय एयरलाइंस को प्रभावित देशों के लिए उद्धार उड़ान चलाने की अनुमति लेने का निर्देश दिया गया है। यात्रियों को हवाई किराया स्वयं भरना होगा।
पश्चिम एशिया और अफ्रीका स्थित नेपाली मिशनों, गैर-आवासीय नेपाली संघों, राष्ट्रीय समन्वय परिषद और नेपाली समुदायों के बीच आपातकालीन समन्वय और सहयोग के लिए ‘रैपिड रिस्पांस टास्क फोर्स’ गठित किया गया है।
विदेश मंत्री बालानन्द शर्मा ने कहा है कि नेपाली नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और आवश्यकता पड़ने पर उद्धार के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर जलयान किराये पर लेकर भी उद्धार किया जा सकता है।





