कांग्रेस की सबसे युवा सांसद के प्रमुख मुद्दे: मस्तिष्क पलायन और जलवायु परिवर्तन

समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा के साथ।
- सोलुखुम्बु की ३० वर्षीय गीता गुरुङ ने नेपाली कांग्रेस से समानुपातिक सांसद के रूप में भूमिका संभाली है और वे संसद में युवाओं की आवाज बुलंद करने का संकल्प रखती हैं।
- गीता गुरुङ ने जलवायु परिवर्तन, शिक्षा नीति और मस्तिष्क पलायन जैसे मुद्दों पर संसद में विशेष चर्चा करने और विपक्षी भूमिका में मजबूत आवाज बनकर कार्य करने का वादा किया है।
- उन्होंने कांग्रेस की राजनीतिक नर्सरी में सुधार, विद्यार्थी राजनीति की आवश्यकता और पार्टी के अंदर निष्पक्ष समीक्षा का महत्व भी बताया।
६ चैत, काठमाडौं। नेपाली कांग्रेस की सबसे युवा सांसद बनने में सफल हुई हैं सोलुखुम्बु की ३० वर्षीय गीता गुरुङ। कांग्रेस ने उन्हें समानुपातिक सूची से सांसद बनाया है।
सोलुखुम्बु के थुलुङ दूधकोशी गाँव में आठवीं-नवीं कक्षा पढ़ते हुए उन्होंने नेपाल विद्यार्थी संघ की इकाई अध्यक्ष बनकर राजनीति में कदम रखा। वे संसद में युवाओं की आवाज़ को ऊँचा उठाने का संकल्प रखती हैं।
गीता एक नई पीढ़ी के सपनों, जलवायु परिवर्तन के खतरों और मस्तिष्क पलायन की समस्याओं को लेकर संसद में प्रवेश कर रही हैं। वह कहती हैं, ‘‘मैं अन्य मुद्दे भी उठाऊंगी, लेकिन हमारी हिमालयी जिलों को जो जलवायु परिवर्तन की मुश्किलें झेलनी पड़ रही हैं, उन पर विशेष बहस करूंगी।’’
३० वर्ष की उम्र में कांग्रेस जैसे पुराने दल से सांसद बनी गीता का पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि भी मजबूत है। उनके पिता इंद्र गुरुङ स्थानीय समाजसेवी और कांग्रेस कार्यकर्ता थे। गांव के किसी भी कार्यक्रम में लोग पूछते थे कि ‘इंद्र गुरुङ कहाँ हैं?’
‘‘इस तरह सेवा करने से लोग आपको खोजते और सम्मान करते थे, मुझे भी बचपन में यही करने का सपना था,’’ उन्होंने याद करते हुए कहा।

सोलुखुम्बु उस समय माओवादी संघर्ष से बहुत प्रभावित था। मुख्यालय से गांव पहुंचने के लिए दो दिन पैदल चलना पड़ता था। उनके पिता ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी कांग्रेस का झंडा थामे आगे बढ़ते रहे। कांग्रेस के कई नेता उनके घर आते-जाते रहते थे। वे गिरिजाप्रसाद कोइराला द्वारा शुरू किए गए शांति प्रक्रिया की कहानी भी सुन चुकी हैं। उन्हें घर से ही लोकतंत्र और बहुदल प्रणाली की समझ मिली। इन सब कारणों से उन्होंने कांग्रेस को अपना सही पार्टी माना। जब उन्होंने राजनीति में आने की इच्छा जताई तो उन्हें पूरा समर्थन मिला। कक्षा ८ से नेविसंघ की राजनीति शुरू की।
‘‘मेरी दो बेटियां हैं। जब समाज में ‘बेटा नहीं है’ जैसी बातें होती थीं, तो मेरे पिता डिफेंड करते थे– बेटियों को बेटों जैसा शिक्षा और अवसर देने चाहिए, वे भी आगे बढ़ सकती हैं,’’ गीता ने अपने पिता की बात याद करते हुए कहा।
उन्होंने कहा कि विद्यार्थी राजनीति अभी भी जरूरी है। इसकी आवश्यकता खत्म नहीं हुई है। हाल के समय में विद्यार्थी संगठन की उपयोगिता खत्म हो जाने की धारणा के बारे में उन्होंने कहा: यह स्थायी विपक्ष है। यह शैक्षिक हितों, प्रशासनिक सुधारों की रक्षा करता है और सरकार को सचेत करने वाला भूमिका निभाता है। इसकी बजाय इसे सुधारने की जरूरत है।
उनके पारिवारिक विद्रोही चेतना ने उनकी राजनीतिक यात्रा को मजबूत आधार दिया। बचपन में भी वे विद्यालय की ‘फर्स्ट स्टूडेंट’ थीं, जो काम को आसान बनाता था। गांव में उन्होंने वॉलीबॉल प्रतियोगिता, वक्तृत्व कला, हाजिरी जवाब जैसे कार्यक्रमों में नेतृत्व किया और हमेशा गांव के विद्यार्थियों को सक्रिय रखा।
२०६६ साल में एसएलसी देने के बाद वे काठमांडू आईं और ट्रिनिटी इंटरनेशनल कॉलेज से प्लस टू साइंस, त्रिचन्द्र कॉलेज से बीएससी और त्रिभुवन विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंध में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की।
कालेज में भी वे नेविसंघ में सक्रिय थीं। त्रिचन्द्र में छात्र संगठन की अध्यक्ष पद के दावेदार थीं। २०७३ में उन्होंने नेपाल विद्यार्थी संघ की केंद्रीय सदस्य बनीं और सांसद बनने से पहले वे नेविसंघ की केंद्रीय समिति की सदस्य थीं। २०७३ साल के बाद और दुजाङ शेर्पा के कार्यकाल में वे केन्द्रीय सदस्य रहीं।
‘‘विद्यार्थी राजनीति अब भी जरूरी है, इसका औचित्य समाप्त नहीं हुआ है,’’ उन्होंने पुनः जोर दिया।
उन्होंने कहा कि आज तक कांग्रेस की राजनीतिक नर्सरी में सुधार की कमी रही है। अधिवेशन रुका, तदर्थ समिति पर निर्भरता रही और सदस्यता वितरण नहीं हो पाया। इसलिए नई पीढ़ी संगठन में सक्रिय नहीं हो सकी, जिसके कारण संगठन निष्क्रिय लगे।
पार्टी के परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं आने के कारण उन्होंने कहा, ‘‘हमारी नतीजा उम्मीद के मुताबिक नहीं आया है। इसके बारे में पार्टी में निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है।’’
उनका कहना है कि वर्तमान में दो तरह की शिक्षा नीति है। दूर-दराज के विद्यार्थी और शहर के विद्यार्थियों के बीच की खाई को कम करने की जरूरत है।
अभी संसद में वे विपक्ष की भूमिका निभाते हुए शिक्षा, युवा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर मजबूत आवाज उठाने का संकल्प रखती हैं। ‘‘सरकार ने अच्छा काम किया तो हम उसकी प्रशंसा करेंगे। गलती हुई तो सचेत करेंगे। विपक्ष को मजबूत रहना चाहिए,’’ उन्होंने कहा। ‘‘यह हार मानने या डरने का समय नहीं है। जनता ने जो अधिकार दिया है उसका सही उपयोग करना आवश्यक है, मैं इसके लिए लगातार आग्रह करती हूं।’’

मध्य पूर्व में अब १९-२० लाख नेपाली हैं। यदि युद्ध बढ़ा तो उन्हें कैसे वापस लाया जाएगा? गांवों के युवाओं को रोकने के लिए नीतिगत सुधार आवश्यक हैं। गांव खाली हो रहे हैं। इन सब बातों का संतुलन कैसे बनाए? काम कैसे आसानी से हो सकता है? इन मुद्दों पर इस बार गीता संसद में मुखर होंगी।
उन्होंने कहा, ‘‘अभी दोहरी शिक्षा नीति है। दूर-दराज और शहर के विद्यार्थियों के बीच भेदभाव हटाना जरूरी है।’’
गीता के अनुसार, सोलुखुम्बु जलवायु परिवर्तन के कारण उच्च जोखिम में है। दिन में ही हिमपहिरो गिर चुका है। अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले भौगोलिक क्षेत्रों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ रहा है। इस आवाज़ को केवल संसद में नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाना जरूरी है। सगरमाथा संवाद जैसे कार्यक्रमों को निरंतर जारी रखना चाहिए। इसलिए वे इन सभी समस्याओं को उजागर करने के लिए संसद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का दावा करती हैं।





