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क्या महिलाओं के लिए रात में अकेले निडर होकर चलना संभव होगा?

वित्तीय वर्ष २०७८/७९ में नेपाल में २५०७ बलात्कार की घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनमें अधिकांश महिलाओं और बालिकाओं को पीड़ित बनाया गया। इन बलात्कार मामलों में दोषी पुरुषों में पिता, बड़े भाई, पति, शिक्षक जैसे रिश्तेदार भी शामिल हैं। पुरुषप्रधान सोच, सामाजिक संरचना और न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। २७ जुलाई २०१८ को १३ वर्षीय बालिका निर्मला पन्त के बलात्कार के बाद हत्या कर उखु के झाड़ियों में फेंक दिए जाने की घटना ने देश को झकझोर दिया था। ३ फरवरी २०२१ को १७ वर्षीया किशोरी भागीरथी भट्ट के बलात्कार और हत्या कर जंगल में फेंके जाने की घटना याद करें, साथ ही २३ भाद्र २०८२ को १६ वर्षीय किशोरी ईनिशा विक का मृत शरीर वीरेन्द्रनगर के जंगल से मिला था, जिसकी मौत जबरदस्ती करणी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के कारण हुई।

आर्थिक वर्ष २०१९–२० के नवंबर महीने में ही आठ बलात्कार के मामले दर्ज हुए, जिनमें ११ वर्षीया, ७ वर्षीया, १३ वर्षीया और ३ वर्ष की बच्चियाँ भी पीड़ित थीं। इन क्रूरतम अपराधों में संलिप्त व्यक्तियों की उम्र १६ वर्ष से लेकर ६० वर्ष तक पाई गई, जिनमें कुछ पीड़ितों के अपने पिता भी शामिल हैं। ये केवल सार्वजनिक हुए मामले हैं; छुपे हुए अपराध और भी अधिक हो सकते हैं।

अब महिलाओं को बलात्कार से सुरक्षित रह पाने की संभावना कहां बची है और कौन-से रिश्ते इससे अछूते हैं? उम्र की कोई सीमा नहीं रह गई है, न ही रिश्तों की मर्यादा। पहले से ही विश्वास की डोर टूट चुकी है। चाहे घर हो या विद्यालय, मंदिर हो या सड़क, पिता हो या भाई, प्रेमी हो या पति — एक महिला किस पर आँख बंद कर भरोसा कर सकती है?

दोषी कौन है? क्या महिला होकर जन्म लेना अभिशाप है? और किन-किन क्षेत्रों में एक बेटी को संघर्ष करना पड़ता है? बेटी बनकर जन्म लेना ही परिवार के गर्भ में संघर्ष है, भाग्य या दुर्भाग्य कहीए, पुरुष प्रधान समाज से खुद को बचाना एक कठिन संघर्ष है जहाँ ‘पुरुष’ शब्द सुनते ही मन में कटुता उमड़ती है। कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि समाज में केवल बुरे पुरुष ही नहीं हैं, पर यथार्थ यही है कि समाज के पुरुषों में से कोई न कोई महिला के प्रति बलात्कारी हो सकता है।

पर फिर सवाल उठता है — इन सभी बलात्कार मामलों में दोषी कौन है? जब हमारी जैसी समाज में इस प्रकार के अमानवीय अपराध हो रहे हैं तब भी दोष पूछने का दायित्व महिलाओं पर ही क्यों थोप दिया जाता है? ‘तुम किसके साथ जा रही थी?’ ‘तुम अकेली क्यों थीं?’ ‘तुमने क्या पहना था?’ ‘तुम्हारा बॉयफ्रेंड था या नहीं?’ ‘तुम क्या काम करती हो?’ जैसे प्रश्नों के जरिए पीड़िता को यह बताना कि दोष सिर्फ उनके कपड़ों या आचरण में है। जब ४० वर्ष का पिता अपनी किशोरी बेटी को बार-बार बलात्कार करता है (ललितपुर में) तो क्या उसकी कामुकता बेटी के छोटे कपड़े पहनने पर जागती है?

कई शोधों ने दिखाया है कि केवल यौन इच्छा से ही बलात्कार नहीं होता। कपड़ों की वजह से दोषी बनाना कहां तक सही है? एक ऐसी बेटी जो जीवन बचाने के संकल्प के साथ चिकित्सक बनी हो, उस वक्त ड्यूटी में सफेद एप्रन पहने हुए हो, बलात्कार के बाद हत्या हो सकती है? काम के कारण कैसे कोई दोषी हो सकता है? फिर भी बुद्धिजीवी इस भ्रम में हैं कि महिला के कपड़े की लंबाई से बलात्कार कम हो जाएगा।

आज एक महिला जब अपने पिता, भाई, पति, प्रेमी, शिक्षक या विश्वसनीय रिश्तेदार से बलात्कार का शिकार होती है, तो कौन-सा रिश्ता पवित्र रह जाता है? वह ‘मैं’ किसके पास जाकर कहें कि मैं समस्या में हूं? मैं पीड़ित हूं, किसे बेबाक महसूस कर कहें? नेपाल में हर दिन औसतन ७ महिलाएं और बालिकाएं बलात्कार की शिकार होती हैं। वित्तीय वर्ष २०८०/८१ में २५०७ बलात्कार के मामले दर्ज हुए। ये केवल आंकड़े नहीं, अपितु टूटे हुए जीवनों की आवाज हैं, उजाड़े हुए जिंदगियों के आंसू हैं। बलात्कार केवल शारीरिक चोट नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की निरंतर जलन और दैनिक यातना है। पीड़ितों को पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर, चिंता, डिप्रेशन जैसी समस्याओं से कैसे निपटना होता है?

हमारा समाज तो घाव पर मरहम लगाने के बजाय नमक छिड़कता है। बिना सहमति ही शरीर का किसी पुरुष द्वारा उपयोग होना जीवन को बर्बाद करने वाला पल होता है। इसे सहते हुए जीवन बिताने वाली महिला के मन में क्या गुजरता होगा? और जब अपराधी खुलेआम समाज में घूमते नजर आते हैं, तो पीड़ित का क्या हाल होता होगा? नेपाल का संविधान और फौजदारी संहिता २०७४ अनुसार कड़ी सजा का प्रावधान है, लेकिन लगता नहीं कि यह कानून प्रभावी रूप से लागू होता है।

एक स्त्री के जन्म के गर्भ को भी बलात्कार करने वाला व्यक्ति कैसी मानसिकता रखता होगा? उनकी नज़र में महिला कोई मानव नहीं, केवल उपयोग की वस्तु मात्र है। जो समाज देवी पूजते हैं, वही महिलाओँ के प्रति जघन्य अपराध पर क्यों चुप रह जाते हैं? हमारा समाज कहाँ गलती कर गया? बलात्कार के खिलाफ न्याय मांगने सड़कों पर आने वाली महिलाओं में से कुछ खुद अपराधियों के बिना भी अपराध की स्थिति में आ जाती हैं, और न्याय की बात करने वाली महिलाओं पर ही हिंसा होती है। हम कहां अटक गए हैं?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर तीन में से एक महिला यौन हिंसा की शिकार होती है, पर ये सभी घटनाएं उजागर नहीं होतीं। जो स्वयं बलात्कार की शिकार हैं, उनकी पीड़ा और उनका मन रो नहीं पाता। विभिन्न शोधों से यह स्पष्ट होता है कि केवल यौन इच्छा ही बलात्कार का कारण नहीं है। पुरुष प्रधान सोच, पुरुष विशेषाधिकार, महिलाओं का अपमान और सामाजिक संरचना बलात्कार के प्रमुख कारण हैं। यह दर्शाता है कि ‘पुरुष’ को शक्तिशाली दिखाने वाली हमारी सामाजिक व्यवस्था को पुनः परखा जाना आवश्यक है।

घर में जब भाई-बहन की उम्र समान होती है, तो भाई पर प्रश्न नहीं उठते लेकिन बहन को ‘तुम तो लड़की हो’ कहकर पुरुषवादी व्यवस्था का समर्थन किया जाता है। जहां मां बेटी को कर्तव्य का बोध कराती हैं, वहीं पिता बेटे को जिम्मेदारी सिखाने में लापरवाह रहते हैं, जिससे समाज में पुरुषवादी प्रभाव बढ़ता है। मैं ऐसा समाज देखना चाहती हूं जहां रात के ८ बजे एक महिला निडर होकर घर के बाहर चल सके। जहां २१-२२ साल की बेटी घर से बाहर जाए तो मां उसे छोटे भाई के साथ भेजने को मजबूर न हो। जहां बस में घर तक जाते समय पिता बेटी से ‘लड़का है या लड़की?’ पूछने को विवश न हों।

क्या यह संभव है? क्या हम परिवर्तन के ऐसे सपने देखने का हक नहीं रखते? नमस्ते सरकार! मैं एक महिला हूं, मुझे स्वतंत्र और सुरक्षित जीवन बिताने का अधिकार है!