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विवाह और आत्मानुभूति

वि. सं. २०५० के दशक में हम विवाह बंधन में बंधे। हमारा विवाह अंतरजातीय प्रेम पर आधारित था। हम दोनों किशोरावस्था में थे, लेकिन सामाजिक स्तर, पारिवारिक संरचना और सम्मान के प्रति सजग थे। प्रेम के सामने किसी भी बात को बाधा नहीं बनने देना, उस वक्त की हमारी अनुभूति थी और हमें विश्वास है कि वह निर्णय सही था। हम अपने संबंधों के प्रति दृढ़ और संतुष्ट हैं। उस समय उम्र के कारण हम अधपके लगते थे, लेकिन जिम्मेदारी, स्नेह और नैतिकता में हमारी समझ आवश्यक थी।

विवाह के कुछ वर्षों बाद हमारी बेटी का जन्म हुआ और छह वर्ष के अंतराल में पुत्र भी हुआ। दादा-दादी, नाना-नानी, और चाचा-ताऊ के संयुक्त संरक्षण में बच्चों की परवरिश संभव हुई। बेटी ने एसएलसी उत्तीर्ण करने के बाद कक्षा ११ के लिए काठमांडू के स्कूली होस्टल में पढ़ाई शुरू की। समय बीतता गया, बच्चों ने शिक्षा पूरी की। बेटी ने स्नातक की डिग्री हासिल की। हमारे संतान विनम्र, नैतिक और व्यवहारिक व्यक्ति बने और किसी भी गलत राह पर नहीं गईं, जिससे हम प्रसन्न हैं। हम खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि यह स्थिति बनी।

छोटी बेटी अपने स्नातकोत्तर की पढ़ाई के दौरान एक दिन मुझसे निकट आकर बोली, “मम्मी, आपसे कुछ बात करनी है।” शुरुआत में मुझे थोड़ी चिंता हुई। मन में कई प्रश्न उठे। कुछ समय चुप्पी रहने के बाद उसने बताया कि वह प्रेम संबंध में है। तभी मेरे मन में प्रश्न उठे- वह लड़का कौन है? उसका व्यक्तित्व कैसा है? उसका परिवार कैसा है? हमने यह सोचने लगे कि आने वाले दिनों में स्थिति को कैसे संभालना है। पिता को विश्वास दिलाने में समय लगा। लेकिन अंततः वे मान गए। बेटी ने उस लड़के से स्नातक दीक्षांत समारोह में परिचय कराया, जब वह वहां उपस्थित था। उस समय बेटी के पिता इस अप्रत्याशित मुलाकात से चकित रह गए। वे कम बोलने वाले, पढ़े-लिखे और करीबी लोगों तक ही सीमित रहने वाले व्यक्ति हैं।

उन्हें बेटी के प्रेम संबंध को स्वीकार करने में ज्यादा समय नहीं लगा। भले ही बेटी विवाह योग्य आयु में थी, हम उसे अभी भी छोटी लगती थी। हम स्वयं को परिपक्व समझते थे, लेकिन बेटी को शादी के लिए योग्य नहीं मानते थे। उस समय हम केवल सत्य को एक सपने की तरह देखते थे। पिछले दशहरा पर लड़का पक्ष से बेटी के विवाह के लिए विवाह प्रस्ताव आ गया। बातचीत शुरू हुई। गत फाल्गुन २८ को बेटी का विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। बेटी खुशी-खुशी विदा हुई। हमें लगा कि हमने अपनी जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभाई।

जीवन में कई बातें किताब से नहीं, अनुभव से सिखाई जाती हैं। सच्चे मित्र और परिवार के अर्थ भी इसी प्रकार समझ में आते हैं। कई बार जो रिश्तेदार होते हैं, वे वास्तव में रिश्तेदार नहीं होते, जबकि कुछ रिश्तेदारों से अधिक आत्मीय, सहायक और सम्मानजनक भी होते हैं। ऐसी बातें सोचने पर मजबूर करती हैं – पूर्ण रूप से सच्चे और आत्मीय संबंध की कद्र करो और जीवन की मिठास का अनुभव करो, इसमें कोई तुम्हें रोक नहीं सकता।

(लेखिका पूजा खड्का, गोरखा मॉडल सेकेंडरी स्कूल, लमही-६, दाङ में कार्यरत शिक्षिका हैं।)