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भारत लिपुलेक नाके से चीन के साथ व्यापार शुरू करने की तैयारी में, नेपाल की प्रतिक्रिया क्या होगी?

भारत लिपुलेक नाके से चीन के साथ व्यापार शुरू करने की तैयारी कर रहा है। नेपाली सरकार ने अभी तक इस मामले में अपनी आधिकारिक राय सार्वजनिक नहीं की है। नेपाल लिपुलेक, कालापानी, लिम्पियाधुरा क्षेत्र को अपना क्षेत्र मानता आया है। पूर्व विदेश मंत्री ज्ञवाली ने सरकार से अपनी स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता जताई है। १० चैत, काठमांडू। भारत नेपाली क्षेत्र लिपुलेक के माध्यम से चीन के साथ व्यापार करने वाला है, जिसके कारण नेपाल सरकार ने इस विषय पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) ने गत चैत ६ को बताया था कि भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव अंशु बर्धन को पत्र लिखकर लिपुलेक नाके से व्यापार फिर से शुरू करने को कहा था। नेपाल महाकाली पूर्वी क्षेत्र जैसे कालापानी, लिपुलेक और लिम्पियाधुरा को अपना दावा करता है। १८१६ में ब्रिटिश भारत के साथ हुई सुगौली संधि के अनुसार काली (महाकाली) नदी के पूर्वी सारे क्षेत्र नेपाल के अंतर्गत आते हैं। उसी क्षेत्र का लिपुलेक नाके से भारत आगामी जून से चीन के साथ व्यापार शुरू करने वाला है, यह पीटीआई ने बताया। इस मामले में नेपाल सरकार को जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाकर वार्ता के माध्यम से समाधान खोजने की कूटनीतिक विशेषज्ञों ने सलाह दी है।

पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं कि नेपाल सरकार को लिपुलेक नाके को लेकर बीजिंग और नई दिल्ली दोनों को अपनी स्पष्ट स्थिति बतानी चाहिए। वे कहते हैं, ‘इस विषय में सरकार को अपना रुख और मान्यता स्पष्ट करनी होगी। २०१५ से हम इसे नेपाली क्षेत्र करार देते आए हैं और बिना नेपाल की अनुमति इसके कोई निर्णय नहीं कर सकता।’ पूर्व राजदूत दिनेश भट्टराई ने सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मामले में सरकार को देर न करने पर जोर दिया है। भट्टराई कहते हैं, ‘यह सरकार कई बातों पर चुप्पी साधे हुए है। नेपाली भूमि पर अवैध गतिविधि होने पर भी चुप न रहना चाहिए।’ दोनों पड़ोसी असंवेदनशील नजर आ रहे हैं। २०१५ में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चीन भ्रमण के बाद जारी ४१ बिंदु वाले संयुक्त बयान के २८वें बिंदु में नेपाली क्षेत्र लिपुलेक के उपयोग का भी उल्लेख है। उस वक्त मोदी और चीनी समकक्ष ली खछ्यांग के बीच लिपुलेक नाके को व्यापारिक और तीर्थयात्रा आवागमन का केन्द्र बनाने पर सहमति हुई थी। नेपाल सरकार ने बिना अपनी स्वीकृति के अपने क्षेत्र के उपयोग पर असहमति जताई थी और दोनों पड़ोसी देशों को पत्र भेजा था, ऐसा तत्कालीन प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के विदेश मामले विशेषज्ञ दिनेश भट्टराई ने बताया। वे कहते हैं, ‘हमारे बिना सलाह के हमारे क्षेत्र का उपयोग स्वीकार्य नहीं है। इसके लिए दोनों देशों को विरोध नोट भेजा था।’