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क्यों जेनरेशन जेड फोन कॉल के बजाय ‘टेक्स्ट मेसेज’ को प्राथमिकता दे रहे हैं?

जेनरेशन जेड फ़ोन कॉल को तनाव और व्यवधान के रूप में अनुभव करते हुए टेक्स्ट मेसेज को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं। तकनीकी इस युग में पले-बढ़े उनकी संचार शैली अलग है। वे अक्सर दोस्तों से पता पूछने या खाना ऑर्डर करने के लिए फ़ोन कॉल करने की बजाय टेक्स्ट मेसेज भेजना अधिक सहज महसूस करते हैं। कुछ लोग इसे आलस्य के रूप में देखते हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे टेलीफोबिया, यानी फोन कॉल से जुड़ा मानसिक तनाव का एक रूप मानते हैं।

ब्रिटेन में किए गए एक अध्ययन में लगभग 56 प्रतिशत जेनरेशन जेड आयु वर्ग के प्रतिभागियों ने कहा कि वे फ़ोन कॉल का जवाब देने में अनिच्छुक होते हैं। अचानक आने वाली फोन की घंटी उनके लिए तनाव का कारण बनती है। कुछ मामलों में तो वे अपने अभिभावकों से भी फ़ोन न करने का आग्रह करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे चैट, सोशल मीडिया डाइरेक्ट मैसेज और मीम्स के अधिक अभ्यस्त हैं।

संचार विशेषज्ञों के अनुसार, टेक्स्ट मेसेज उपयोगकर्ताओं को फ़ोन कॉल की तुलना में अधिक सुरक्षा प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, टेक्स्ट में भेजी गई बातें बार-बार संशोधित की जा सकती हैं, वर्तनी जांची जा सकती है। किसी प्रश्न का उत्तर देने से पहले शोध करने या सोचने का समय टेक्स्ट में मिलता है। वहीं फ़ोन कॉल तत्काल होती है और बिना पूर्व विचार के होती है, जबकि टेक्स्ट में ऐसा नहीं होता। टेक्स्ट मेसेज की इन विशेषताओं के कारण जेनरेशन जेड फ़ोन कॉल से दूरी बनाए रखने लगे हैं।

इसके अलावा, अधिकांश युवा फ़ोन कॉल को किसी जरूरी काम या बुरी खबर के संकेत के रूप में लेते हैं। उनके लिए बिना सूचना के आने वाली फ़ोन कॉल सिर्फ बाधा होती है। इस प्रवृत्ति का कार्यस्थल और सामाजिक संबंधों पर असर पड़ रहा है। क्योंकि फ़ोन कॉल को पूरी तरह नजरअंदाज करने से सक्रिय रूप से सुनने की आदत, संवाद करने की क्षमता और दूसरों की भावनाओं को समझकर तुरंत प्रतिक्रिया देने जैसे व्यक्तिगत कौशल प्रभावित हो सकते हैं। इस वजह से इस समस्या के समाधान के लिए ब्रिटेन जैसे देशों में कार्यशालाएँ आयोजित की जा रही हैं, जहाँ बच्चों को फ़ोन कॉल से डर कम करना सिखाया जाता है। क्योंकि संचार केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों की भी कड़ी है।