
किशोरावस्था में बच्चों के शरीर, मन, भावनाओं और मूल्यों में बड़े बदलाव आते हैं और वे अक्सर उलझन में पड़ जाते हैं। खराब दोस्त बच्चे की पढ़ाई, व्यवहार और भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, जिसके लिए माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। माता-पिता को बच्चों को गलत दोस्तों से बचाना चाहिए, खुला संवाद बनाए रखना चाहिए और सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। ‘किशोरावस्था’ एक ऐसा दौर होता है, जो बच्चों के रास्ता चुनने के शुरुआती संकेत देता है। यह उनके और माता-पिता दोनों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील समय होता है। इस उम्र में बच्चे के शरीर ही नहीं, मन, दिमाग, भावनाएं और मूल्य भी बड़े परिवर्तित होते हैं। वे बचपन और युवावस्था के बीच होते हैं, जिसकी वजह से अक्सर वे उलझन में आ जाते हैं और सही-गलत को अलग करने में कठिनाई होती है। इसलिए कई किशोर गलत दोस्त चुनने की गलती करते हैं। खराब संगत उनके पढ़ाई, व्यवहार, आत्मसम्मान और पूरे भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। इस उम्र में बच्चे पूरी तरह परिपक्व नहीं होते, इसलिए माता-पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। माता-पिता को बच्चों को सही रास्ता दिखाना, दोस्तों की गुणवत्ता पहचानना और आवश्यक होने पर हस्तक्षेप करना चाहिए।
खराब दोस्त के प्रमुख संकेत नीचे दिए गए हैं। यदि ये संकेत दिखें तो तुरंत सावधान हो जाना चाहिए और बच्चे को ऐसे व्यक्तियों से दूर रहने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
1. घर में न बताने की सलाह: कोई दोस्त बार-बार कहता है ‘‘यह बात घर में मम्मी-पापा से मत कहना’’, ‘‘यह हमारा सीक्रेट है’’ तो समझना चाहिए कि उसके मन में कुछ गलत बात है। अच्छा दोस्त कभी गुप्त बातें नहीं सिखाता। ऐसा दोस्त बच्चे को गलत रास्ते पर ले जा सकता है। माता-पिता को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि जो बात घर पर बताने में डर लगे वह काम बिल्कुल न करें।
2. भावनात्मक दबाव देना: अगर दोस्त कहता है ‘‘तुम मेरे दोस्त हो तो यह काम करना पड़ेगा’’, ‘‘नहीं करने पर दोस्ती खत्म’’ जैसे दबाव देता है तो यह साफ खतरा है। असली दोस्त जबरदस्ती नहीं करता। इससे बच्चा कमजोर और निर्भर बनता है। माता-पिता को सिखाना चाहिए कि सच्चा दोस्त स्वतन्त्रता और सम्मान देता है, दबाव नहीं।
3. गलत काम को कूल बताना: गलत बातों को ‘‘कूल’’ या ‘‘आकर्षक’’ कह कर सामान्य मानने वाला दोस्त खराब संकेत है। कक्षा मिस करना, सिगरेट या शराब पीना, किसी को मारना या गाली देना जैसी आदतों को मनोरंजक और स्वीकार्य ठहराने वाला दोस्त बच्चे को गलत दिशा में ले जाता है। ऐसे लोगों से तुरंत दूरी बनानी चाहिए।
4. पढ़ाई को बोरिंग कहना: खराब दोस्त पढ़ाई, अनुशासन और शिक्षकों के साथ अच्छे संबंध को ‘‘बोरिंग’’ या ‘‘चमचा’’ कह कर तुच्छ समझता है। ऐसा दोस्त प्रगतिशील मित्रों को नीचा दिखाना चाहता है। अच्छा दोस्त दूसरों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, नीचा दिखाने के लिए नहीं।
5. बच्चे में नकारात्मक बदलाव दिखना: अगर बच्चे में झूठ बोलना बढ़ जाये, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना, परिवार से झगड़ा करना, पढ़ाई में ध्यान न देना या मोबाइल और सोशल मीडिया में अत्यधिक समय बिताना जैसे लक्षण दिखें, तो सावधान होना चाहिए। इस स्थिति में माता-पिता को तुरंत ध्यान देना जरूरी है।
6. दोस्त की सीमा का सम्मान न करना: दोस्तों की व्यक्तिगत सीमाओं को न मानना भी खतरे का संकेत है। यदि बच्चा कहता है ‘‘मैं यह नहीं करूंगा’’ और दोस्त जबरदस्ती कराता है या सीमा पार करता है तो वह सच्चा दोस्त नहीं है। अच्छा दोस्त ‘‘ना’’ को सम्मान देता है। माता-पिता को बच्चे को ‘‘ना’’ कहना और आत्मसम्मान बनाए रखना सिखाना चाहिए।
7. गलत काम के लिए उकसाना: किसी गलत काम के लिए सीधे उकसाने वाला दोस्त सबसे खतरनाक होता है। घर से पैसे चोरी करने, परीक्षा में नकल करने, अश्लील सामग्री देखने के लिए प्रोत्साहित करने जैसे दोस्त से जल्द दूरी बनानी चाहिए। ऐसी संगत बच्चे की पूरी जिंदगी बिगाड़ सकती है।
खराब दोस्त की पहचान होने पर माता-पिता को खुला और विश्वासपूर्ण संवाद बनाए रखना चाहिए ताकि बच्चा बिना डर अपनी बात कह सके। कभी-कभी दोस्त को घर पर बुलाकर या स्कूल में मिलकर उनके व्यवहार को समझना जरूरी होता है। अच्छे दोस्तों की प्रशंसा करनी चाहिए और उनसे समय बिताने के लिए प्रेरित करना चाहिए। माता-पिता को खुद भी सकारात्मक उदाहरण पेश करना चाहिए क्योंकि बच्चे माता-पिता के व्यवहार से बहुत कुछ सीखते हैं। किशोरावस्था में खराब दोस्त बच्चे के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, लेकिन माता-पिता की सतर्कता, समझदारी, प्यार और निरंतर साथ से बच्चे को सही राह पर वापस लाया जा सकता है। इस उम्र में माता-पिता की मार्गदर्शन ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।





