नेपाल ने ७० वर्षों के बाद बेइजिंग में पहली महिला कूटनीतिक नेतृत्व प्रदान किया

चीन स्थित नेपाली दूतावास में पहली महिला नेतृत्वकर्ता रोशन खनाल कार्यवाहक राजदूत के रूप में जिम्मेदारी निभा रही हैं। वह निजी बैंक के अनुभव के बाद सरकारी सेवा में प्रवेश कर 2010 में विदेश सेवा में सफल हुई थीं। इजरायल और ब्रिटेन में कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए काम करने वाली खनाल चीन में नेपाल-चीन संबंधों को मजबूत बनाने के प्रयास में लगी हुई हैं। बेइजिंग। इस वर्ष देश ने पहली बार महिला प्रधानमंत्री पाकर जो उत्साह मनाया, वह बेइजिंग तक पहुंच गया है। वर्तमान में महिला प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने नए प्रधानमंत्री को जिम्मेदारी सौंप कर विदाई ले ली है। जेनजी आंदोलन के प्रभाव के बाद चीन के लिए नेपाल के राजदूत कृष्णप्रसाद ओली के वापसी के बाद, चीन स्थित नेपाली दूतावास की कार्यवाहक राजदूत की जिम्मेदारी रोशन खनाल ने संभाली है।
नेपाल के कूटनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी सीमित है। हालांकि, सीमित अवसरों में अपनी मेहनत, क्षमता और आत्मविश्वास के बल पर आगे बढ़ने वाली रोशन खनाल एक सशक्त व्यक्तित्व हैं। चीन स्थित नेपाली दूतावास में कार्यवाहक राजदूत की जिम्मेदारी निभा रही खनाल का जीवन सफर एक सामान्य परिवार से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंच तक पहुंचने की प्रेरणादायक कहानी है। वह ब्रिटेन में दो बार कार्यवाहक राजदूत रह चुकी सहसचिव हैं। वर्तमान में चीन में नेपाली दूतावास का नेतृत्व कर रही हैं। नेपाल-चीन संबंधों के ७० साल के इतिहास में वह चीन स्थित नेपाली दूतावास की पहली महिला नेतृत्वकर्ता हैं।
पाल्पा में जन्मी खनाल का बचपन सामान्य था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा वहीं से शुरू की और आठवीं कक्षा पाल्पा में ही पूरी की। बाद में भैरहवा होते हुए काठमांडू तक उनकी शिक्षा का सफर जारी रहा। उन्होंने भैरहवा से बीबीए और काठमांडू से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। ‘‘मेरा पृष्ठभूमि कॉमर्स है। शुरू में सरकारी सेवा में जाने का इरादा नहीं था,’’ उन्होंने कहा। विदेश सेवा में प्रवेश उनके लिए अवसर और साहस का परिणाम था। पहली बार लोकसेवा परीक्षा देने पर ही सफल होने के बारे में उन्होंने कहा, ‘‘मैंने खास तैयारी नहीं की थी, फिर भी मेरा नाम निकला।’
2010 में विदेश सेवा में शामिल होने के बाद उनका पहला चुनौती प्रणाली के भीतर मार्गदर्शन की कमी थी। ‘‘उस समय किसी को किसी को सिखाने की संस्कृति नहीं थी,’’ उन्होंने बताया। इजरायल में कार्यकाल ने उन्हें महत्वपूर्ण अनुभव दिया। वहां उन्होंने नेपाली श्रमिकों के जीवन को करीब से पहचाना। खासतौर पर महिला श्रमिकों की स्थिति बहुत संवेदनशील थी। ‘‘90 प्रतिशत से अधिक महिलाएं थीं। वे 24 घंटे काम करती थीं और परिवार से दूर होने के कारण मानसिक समस्याएं महसूस होती थीं,’’ उन्होंने कहा।
2012 में इजरायल में युद्ध चल रहा था। ‘‘युद्ध के समय सभी चिंतित हो जाते हैं। उस दौरान नेपाली लोगों के परामर्श और समन्वय की जिम्मेदारी हमारी थी,’’ वह बताती हैं। चार साल बाद नेपाल लौटने के बाद उन्होंने विभिन्न जिम्मेदारियाँ संभाली और फिर विदेश पोस्टिंग के रूप में ब्रिटेन पहुंचीं। लंदन में अनुभव पहले से अलग था। ‘‘इजरायल में कामगार ज्यादा थे, लेकिन लंदन में परिवार, विद्यार्थी और गोर्खा समुदाय का मिश्रित समाज था,’’ उन्होंने कहा।
चीन नेपाल के लिए महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है, पर इसमें कई चुनौतियां भी हैं। ‘‘चीन से हम बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन उसका पूरा उपयोग नहीं किया जा सका है,’’ उन्होंने कहा। ‘‘हमें अपनी आवश्यकता स्पष्ट करनी होगी और उसी अनुसार काम करना होगा। अवसर बाहर तलाशना पर्याप्त नहीं है।’ रोशन खनाल की यात्रा केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी प्रतीक है। वह महिलाओं पर पूरा विश्वास रखती हैं। उनका मानना है कि महिलाओं को दया नहीं, बल्कि अवसर देकर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। ‘‘हमें बहाने बनाने की जरूरत नहीं, बल्कि कार्य करके प्रमाणित करना होगा,’’ उन्होंने कहा।
जीवन में व्यक्तिगत और पेशेवर जिम्मेदारियों का संतुलन बनाए रखना कभी-कभी चुनौतीपूर्ण निर्णय लेने को मजबूर करता है। ‘‘जब कभी छोटे बच्चे को छोड़कर काम पर जाना पड़ा, उस समय वह अनुभव थोड़ा मुश्किल था,’’ वह बताती हैं। लेकिन वह निर्णय आवश्यक था, इस पर उनका दृढ़ विश्वास है। ‘‘उस समय यह साबित करना जरूरी था कि महिलाएं काम कर सकती हैं,’’ उन्होंने कहा।





