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प्रहरी समायोजन कब होगा? निजामती कानून कब बनेगा?

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा के बाद।

  • नई प्रतिनिधि सभा २० चैत को बैठक से अपना पहला सत्र शुरू कर नई सरकार और संसद का कार्यभार ग्रहण कर चुकी है।
  • सरकार ने ४५ दिनों के भीतर संघीय निजामती सेवा विधेयक तैयार करने और प्रशासन को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कराने की योजना बनाई है।
  • संविधान लागू हुए एक दशक के बावजूद संघीय कानून, पुलिस समायोजन और शिक्षा विधेयक अभी तक बन नहीं पाए हैं।

२० चैत, काठमांडू। चुनावी जनादेश के अनुसार नई सरकार और प्रतिनिधि सभा ने अपने कार्यों की शुरुआत कर दी है। गुरुवार को नई प्रतिनिधि सभा की पहली बैठक हुई, जहां सांसदों ने नई सरकार और संसद की जिम्मेदारी को याद दिलाया।

“नई संसद के पास सिर्फ पिछले उपलब्धियां नहीं बल्कि बीते दिन के दायित्व भी हैं,” नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के नेता वर्षमान पुन ने कहा, “शांतिसंधि के कई अधूरे पहलू और उसके बाद की संक्रमणकालीन न्याय प्रक्रिया हैं। इसमें नई सरकार को स्वामित्व लेना होगा।”

देश में शांति प्रक्रिया को दो दशक हो चुके हैं, लेकिन संक्रमणकालीन न्याय अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। द्वंद्व संबंधी मुद्दे अस्पष्ट हैं और पीड़ित न्याय नहीं पा सके हैं।

पूर्व विघटित प्रतिनिधि सभा ने बेपत्ता व्यक्तियों की जाँच, सत्य निरूपण तथा मेलमिलाप आयोग संबंधी कानून बनाकर आयोग को सक्रिय किया था। अब संक्रमणकालीन न्याय को पूर्णता दिलाने की जिम्मेदारी नई संसद की है।

संक्रमणकालीन न्याय ही नहीं, पिछली संसद में बहस के बावजूद निष्कर्ष न निकल पाये कई अन्य कार्य भी अब नई संसद को करने हैं।

संविधान लागू हुए एक दशक बीत जाने के बाद भी संघीय कानून बने नहीं हैं। तीन स्तर के सरकारों के कर्मचारी संरचना, पुलिस प्रबंधन, वित्तीय अधिकार जैसे मुद्दे संघीय कानून के अभाव में विवादित हैं।

निजामती कानून को प्राथमिकता

सरकार ने कई क्षेत्रों में प्राथमिकता देने और समयसीमा तय करने का निर्णय लिया है। इसके तहत ४५ दिनों के भीतर संघीय निजामती सेवा विधेयक बनाने की योजना है।

१००-धारा के प्रशासनिक सुधार कार्यसूची में यह प्रावधान है कि सरकार ४५ दिनों के अंदर संघीय निजामती सेवा विधेयक प्रस्तुत करेगी।

सरकारी प्रशासन को पूर्ण राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त, निष्पक्ष और नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाने का लक्ष्य है। इसके तहत निजामती कर्मचारियों, शिक्षकों, प्राध्यापकों और अन्य सेवा कर्मियों को किसी भी राजनीतिक दल या स्वार्थ समूह से संबंध न रखने की शर्त लगेगी।

इस नियम का उल्लंघन होने पर कड़े दंड का प्रावधान भी विधेयक में शामिल किया जाएगा। सार्वजनिक प्रशासन में राजनीतिक ट्रेड यूनियनों को समाप्त कर अनावश्यक दबाव खत्म करने का लक्ष्य है।

सरकार संघीय निजामती सेवा विधेयक में जरूरी कानूनी प्रावधान लाने की तैयारी में है और इसे ४५ दिनों के अंदर तैयार करने का लक्ष्य है।

संविधान ने तीन स्तरों पर कर्मचारियों की व्यवस्था की है, लेकिन संघीय निजामती विधेयक न बनने से प्रशासनिक संघीयता लागू नहीं हो सकी है।

कर्मचारी समायोजन का मुख्य कार्य पिछले कार्यकाल में किया गया था, लेकिन अभी भी संघ, प्रदेश और स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों को कहां और कैसे समायोजित किया जाए इस पर सहमति नहीं बनी है। प्रादेशिक लोक सेवा आयोग बन चुके हैं, फिर भी कर्मचारी संघीय स्तर के अधीन हैं।

प्रदेश के मुख्य सचिव, मंत्रालय के सचिव, स्थानीय तह के प्रमुख प्रशासक और लेखा अधिकारी संघ के अधीन होने को लेकर विवाद है, इसलिए पिछले संसद ने विधेयक पारित नहीं कर पाया। यह जिम्मेदारी अब नई संसद पर है।

प्रहरी कानून बनने के बाद भी समायोजन नहीं हुआ

एक दशक गुजरने के बावजूद सुरक्षा निकायों का संघीय प्रबंधन पूरी तरह नहीं हो पाया है। पिछले संसदों में इस मुद्दे पर चर्चा हुई पर व्यावहारिक प्रगति नहीं हुई। अब भी देश में केंद्रीकृत सुरक्षा प्रणाली प्रचलित है।

प्रहरी समायोजन से जुड़े दो विधेयक २०७६ साल में बन चुके हैं और माघ २८ को राष्ट्रपति ने इन्हें प्रमाणीकरण दिया था।

प्रहरी समायोजन के अनुसार केंद्रीय पुलिस में २४,८१६ और सात प्रदेशों में ५४,७२० कर्मियों को समायोजित करना है, लेकिन इसका कार्यान्वयन नहीं हो पाया है।

शिक्षा कानून पर नागरिकों की चिंता

नई सरकार के प्रति जनता की एक बड़ी उम्मीद शिक्षा विधेयक से जुड़ी हुई है। संविधान ने तीनों स्तरों को शिक्षा का अधिकार दिया है, लेकिन संघीय शिक्षा कानून अभी तक तयार नहीं हो पाया है।

पूर्व विघटित प्रतिनिधि सभा में इस विषय पर लंबी बहस हुई थी, विधेयक संसद में लाया गया था लेकिन संसद विघटन के कारण वह रुका हुआ है। अब नई संसद को यह कार्य करना है।

२०८० साल भदौ २७ को विद्यालय शिक्षा विधेयक प्रस्तुत किया गया था जिसे संसदीय समिति ने चर्चा के बाद संसद में पेश किया, पर आगे नहीं बढ़ सका।

इस कारण स्थानीय सरकारों को शिक्षा का अधिकार प्रभावी रूप से उपयोग करने का अवसर नहीं मिला है। माध्यमिक शिक्षा स्थानीय स्तर का पूर्ण अधिकार होते हुए भी इसे प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका।

राष्ट्रिय स्वतन्त्र विद्यार्थी यूनियन ने शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाने के लिए तीन प्रमुख मत व्यक्त किए थे। इसमें शिक्षकों के अधिकार, प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और महिलाओं की छुट्टियां तथा पदोनति में विशेष प्राथमिकता देने की मांग शामिल है।

२०७५ में बनाए गए अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा कानून में कुछ शुल्क ठीक किए गए हैं, लेकिन उनका प्रभावी कार्यान्वयन अभी बाकी है।

संविधान की धारा ३१ प्रत्येक नागरिक को आधारभूत शिक्षा का अधिकार देती है, लेकिन वर्षों बीतने के बाद भी लोकलुभावन अधिकार प्रभावी नहीं हो सके हैं।

रास्वपा महिलाओं से जुड़ी समस्याओं, प्रजनन स्वास्थ्य, छुट्टियों और पदोनति में विशेष प्राथमिकता की मांग करती रही है।

संविधान की धारा ३८ (५) में महिलाओं के लिए सकारात्मक भेदभाव का प्रावधान है।

अब रास्वपा के पास सांसदों का दो तिहाई बहुमत है, जिससे विधेयक पारित करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

मौलिक अधिकारों में प्रगति कमज़ोर

संविधान द्वारा निर्धारित मौलिक अधिकारों का प्रभावी कार्यान्वयन अधिकांश रूप से अभी तक नहीं हो पाया है। तीन वर्षों में संविधान के अनुरूप कानून बनाने का लक्ष्य अधूरा है।

मौलिक अधिकारों की कार्यान्वयन के लिए आवश्यक नियमावली भी अभी तक तैयार नहीं हुई है। आवास, शिक्षा, स्वच्छ वातावरण, रोजगार जैसे १६ अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल हैं।

नई सरकार ने कानून निर्माण की गति तेज करने और समयसीमा निर्धारित कर कार्य पूरा करने का आश्वासन दिया है।

कानून न्याय एवं संसदीय मामलों की मंत्री सोबिता गौतम ने कहा कि सरकार कानून निर्माण प्रक्रिया को तेज करने के लिए तत्पर है।

रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने ने भी नई संसद से उम्मीद जता दी है और पिछली गलतियों को सुधारते हुए कानून निर्माण की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

लामिछाने ने कहा है कि संसद बहस का स्थान होगा, न कि प्रतिशोध का, और स्वार्थ समूहों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

नेपाली कांग्रेस के सांसद भीष्मराज आङ्देम्बे ने कहा कि स्थिर सरकार और नीति आवश्यक हैं और नई सरकार को आपसी सद्भाव, सुशासन और समृद्धि की दिशा में काम करना चाहिए।