
प्राकृतिक प्रकाश और रात के अंधकार में रहने से सोने का समय लगभग दो घंटे पहले हो जाता है और हृदय रोग तथा अवसाद के जोखिम में कमी आती है। अच्छी नींद न आना आज की जीवनशैली की एक प्रमुख समस्या बन गई है। अधिक स्क्रीन टाइम, तनाव और असंतुलित आहार के कारण कई लोगों को नींद की समस्या का सामना करना पड़ता है। हालांकि, अनिद्रा से पीड़ित व्यक्तियों के लिए प्रकृति के निकट रहना, अर्थात् कैंपिंग, एक प्रभावी समाधान हो सकता है, ऐसा कई अध्ययनों ने दर्शाया है। बिस्तर की कमियों और बाहरी वातावरण की चुनौतियों के बावजूद पक्षियों की चहचहाहट और प्राकृतिक प्रकाश नींद की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार करते हैं, यह दावा किया जाता है।
विशेष रूप से अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो बोल्डर के प्रोफेसर केनेथ राइट और उनकी टीम इस विषय पर अनुसंधान कर रहे हैं। राइट, स्लिप एंड क्रोनोबायोलॉजी लैबोरेटरी के निदेशक हैं और पिछले १५ वर्षों से कैंपिंग, प्राकृतिक प्रकाश और मानव जैविक घड़ी के बीच संबंध पर कई चरणों में अध्ययन कर रहे हैं। उनकी मान्यता है कि कई लोग सूर्यास्त के बाद देर तक सोते हैं, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसके विपरीत, कैंपिंग हमारे शरीर की जैविक घड़ी को पुनः सेट करने में सक्षम होती है।
कई लोग कैंपिंग करने के बाद नींद बेहतर होने की पुष्टि करते हैं। वर्तमान में नेपाल में भी यह अभ्यास बढ़ रहा है, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में यह परंपरा तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, कैंपिंग करते समय कुछ सावधानियां बरतनी आवश्यक होती हैं। कई लोग पेड़ों के नीचे तम्बू लगाते हैं क्योंकि यह आसान होता है, लेकिन यह उचित नहीं होता। बारिश में पेड़ से गिरने वाली बड़ी बूंदें अतिरिक्त आवाज़ पैदा करती हैं, जिससे नींद में बाधा आ सकती है। ठंडे जमीन से बचने के लिए अच्छा इन्सुलेशन पैड उपयोग करना चाहिए। यदि कैंपिंग संभव न हो तो घर पर शाम को मंद या लाल प्रकाश का उपयोग कर प्राकृतिक वातावरण का अनुभव किया जा सकता है।





