
समाचार का संक्षिप्त विवरण संपादकीय रूप में प्रस्तुत। २०६० साल असार में डॉ. नारायण खड्क के नेतृत्व में काठमांडू में सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापना के लिए एक बैठक आयोजित की गई थी। २०६२ साल असार २५ को पुस्तकालय भृकुटीमंडप में स्थानांतरित किया गया और संस्कृतिविद् सत्यमोहन जोशी ने इसका उद्घाटन किया। २०८२ साल चैत ३० को समाज कल्याण परिषद ने पुस्तकालय द्वारा किराया न देने का आरोप लगाकर ताला लगवा दिया।
२ वैशाख, काठमांडू। २०६० साल असार में डिल्लीबजार के भोजनालय में समाज के कुछ प्रबुद्ध वर्गों की बैठक हुई। इस बैठक का नेतृत्व नेपाली कांग्रेस के नेता डॉ. नारायण खड्क ने किया जहां डॉ. केदारभक्त माथेमा, हिमालय शम्शेर जबरा समेत कई व्यक्तिगण उपस्थित थे। बैठक का मुख्य उद्देश्य काठमांडू में सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित करना था। सार्वजनिक पुस्तकालय के संचालन के माध्यम से अध्ययनशील समाज बनाने के लक्ष्य के साथ उसी वर्ष असोज में काठमांडू उपत्यका सार्वजनिक पुस्तकालय समाज का गठन किया गया। काठमांडू महानगर पालिका ने पुस्तकालय के लिए राष्ट्रीय सभागृह के एक कक्ष की सुविधा दी जहाँ लगभग दो वर्षों तक संचालन हुआ।
२०६२ साल असार २५ को पुस्तकालय का स्थानांतरण भृकुटीमंडप किया गया, जहां संस्कृतिविद् एवं शताब्दी पुरुष सत्यमोहन जोशी ने उद्घाटन किया। २०८२ के अंत में, २० वर्षों तक लगातार चलने वाले सार्वजनिक पुस्तकालय के लिए ‘काला दिन’ आया जब समाज कल्याण परिषद ने किराया न चुकाने का मुद्दा उठाकर चैत ३० को ताला लगा दिया। पुस्तकालय की व्यवस्थापक लीला भट्टराई के अनुसार यह पहली बार था जब २०६२ के बाद ताला लगाया गया। समाज कल्याण परिषद के भृकुटीमंडप स्थित दो स्टालों में काठमांडू उपत्यका सार्वजनिक पुस्तकालय समाज पुस्तकालय चला रहा था। परिषद ने निजी व्यवसाय, सामाजिक संस्थाओं और मीडिया कार्यालयों सहित २० स्टालों में ताला लगाते हुए यह नीति पुस्तकालय पर भी लागू की।
परिषद के अनुसार, ३४ नंबर के स्टाल ने किराया के रूप में १ करोड़ १३ लाख ५३ हजार ९५ रुपये जमा करना बाकी है जबकि दूसरे स्टाल ३८ का बकाया १ करोड़ ७६ लाख ७० हजार २८१ रुपये है। परिषद और सार्वजनिक पुस्तकालय समाज ने २०६४ असोज २१ को किराए का समझौता किया था जिसमें पुस्तकालय को अन्य से ७५ प्रतिशत किराया छूट दी गई थी। ३४ नंबर स्टाल से मासिक ४,८४४ रुपये और ६८ नंबर स्टाल से ७,५५५ रुपये किराया त кровь रूप में लिया जाना तय था, जिसे पुस्तकालय व्यवस्थापिका भट्टराई ने बताया।
उन्होंने कहा, ‘दोनों स्टालों से सालाना ढाई लाख रुपये चुकाते आ रहे हैं। पुराने समझौते का पुनर्विचार किए बिना समाज कल्याण परिषद ने पुस्तकालय को निजी व्यवसाय की तरह ही व्यवहार किया।’ परिषद के सदस्य सचिव सरोजकुमार शर्मा ने कहा कि अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ने पुस्तकालय को छूट देने पर सवाल उठाया है। आयोग ने पुस्तकालय को छूट न देने का निर्देश दिया है, और हम स्थिति स्पष्ट करने में असमर्थ हैं। दोनों पक्षों के बीच हर दो वर्ष में समझौते का नवीनीकरण होना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। २०६६ में नवीनीकरण के प्रस्ताव पर परिषद का कहना था, ‘यह पुस्तकालय है, इसे क्यों नवीनीकृत करना चाहिए? बस चलाते रहो।’
व्यवस्थापक भट्टराई को यह बात याद है। पुस्तकालय बिना बाधा के जारी रहा और शिक्षा मंत्रालय ने वार्षिक ५० लाख रुपये देने शुरू किए। प्रदेश एवं स्थानीय सरकारों ने भी आर्थिक सहायता प्रदान की। दानदाताओं और व्यक्तियों ने पुस्तकालय में ४० हजार पुस्तकें, पत्रिकाएं, जर्नल और मंत्रालय की रिपोर्ट्स उपलब्ध कराई हैं। पुस्तकालय में डिजिटल प्रणाली का भी उपयोग हो रहा है। यहाँ बच्चे से लेकर वृद्ध तक नियमित अध्ययन के लिए आते हैं। परिषद के अनुसार, लगभग २०० पाठक प्रतिदिन अध्ययन के लिए पुस्तकालय आते हैं।
पुस्तकालय के नियमित पाठक ही नहीं बल्कि समाज कल्याण परिषद के इस कदम से असंतुष्ट भी हैं। देश भर से आए नागरिकों ने अध्ययन के अवसरों को बाधित करने पर आपत्ति जताई है। लामा ने कहा, ‘पुस्तकालय सरकार को ही खोलना चाहिए। जो पुस्तकालय समाज सेवा के लिए खोला गया था, उसे बंद कर समाज कल्याण का क्या मतलब है? पुस्तकालय बंद करने से किसका कल्याण हुआ?’ उन्होंने बताया कि उन्होंने सिफारिश की कई लोग पुस्तकालय आते थे। पिछले वित्तीय वर्ष में २१,३६२ पाठकों ने पुस्तकालय सेवाओं का लाभ लिया और ३,००० व्यक्तियों ने वार्षिक सदस्यता लेकर पुस्तकें उधार लीं।
पुस्तकालय प्रबंधन के लिए तीन साल की अवधि में संचालक समिति है। कांग्रेस नेता डॉ. गोविन्दराज पोखरेल वर्तमान में संस्था के अध्यक्ष हैं। पोखरेल का कहना है कि अध्ययन संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए पुस्तकालय चलाया जाता है। ‘पुस्तकालय लाभ कमाने के लिए नहीं खोला गया। जूते की दुकान और पुस्तकालय को एक ही पैमाने पर रखना उचित नहीं,’ उन्होंने कहा, ‘विकसित देशों ने मुख्य स्थानों पर बड़े पुस्तकालय खोले हैं।’ उन्होंने सुझाव दिया कि पुस्तकालय सरकार की संपत्ति है और सरकार को ही इसे संचालित करना चाहिए।
पुस्तकालय संचालित करने के लिए सात कर्मचारी कार्यरत हैं। अतीत के कई प्रधानमंत्री और नेपाल में नियुक्त राजदूतों ने पुस्तकालय का निरीक्षण किया है। आर्थिक संकट के कारण पुस्तकालय बंद करने की योजना बन रही थी, इसी बीच समाज कल्याण परिषद ने माघ महीने में किराया बकाया चुकाने हेतु पत्र भेजा था। वित्तीय संकट शिक्षामंत्री सुमना श्रेष्ठ के कार्यकाल से शुरू हुआ माना जाता है, क्योंकि उस दौरान पुस्तकालय के लिए वार्षिक बजट रोक दिया गया था। पुस्तकालय को कहीं और समाहित करने की अधूरी योजना के बाद परिषद ने ताला लगा दिया।
प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के काठमांडू महानगरपालिका के मेयर रहते हुए मुख्य प्रशासकीय अधिकारी प्रदीप परियार पुस्तकालय के लिए १ करोड़ रुपये आवंटित करने की योजना बना रहे थे, लेकिन उनके तबादले के बाद नए प्रभारी ने कोई धनराशि नहीं दी। डॉ. पोखरेल का कहना है, ‘पाठकों से शुल्क, संचालक और निजी संस्थानों तथा व्यक्तियों के सहयोग से पुस्तकालय चला रहा है। अब चंदा इकट्ठा कर किराया देना होगा अन्यथा पुस्तकालय को बंद करना पड़ेगा। पुस्तक और सामग्री प्रबंधन की भी समस्याएं हैं।’
परिषद के सदस्य सचिव शर्मा का कहना है कि किराया किराने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने कहा, ‘यदि सरकार छूट देती है तो स्थिति बेहतर हो सकती है, लेकिन अभी हमारे पास किराया वसूलने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।’ ताला लगने के बाद कुछ स्टालों ने किराया देने की बात कही है और कुछ किस्तों में भुगतान करने की जानकारी दी है। शर्मा ने कहा, ‘समाज कल्याण परिषद ने एक साथ किराया जमा करने का निर्देश दिया है।’




