
नई सरकार द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रीय प्रतिबद्धता पत्र के मसौदे में नेपाल को ‘बफर स्टेट’ के रूप में चित्रित किया गया है। इस पर कूटनीतिक विशेषज्ञों ने देश की संप्रभुता को प्रतिबंधित करने की आशंका जताते हुए इसे संशोधित करने की मांग की है। दो प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच स्थित होकर सीधे संघर्ष का जोखिम कम करने के लिए छोटे देशों को ‘बफर स्टेट’ के रूप में परिभाषित किया जाता है। लेकिन सरकार द्वारा इस सप्ताह जारी प्रतिबद्धता पत्र में नेपाल को ‘बफर स्टेट’ से भारत और चीन को जोडऩे वाले ‘ब्राइट ब्रिज’ यानी गतिशील पुल में बदलने का संकल्प व्यक्त किया गया है।
इस शब्दावली को लेकर दो पूर्व विदेश मंत्रियों सहित कूटनीतिक विशेषज्ञों ने असंतोष प्रकट किया है और मसौदे के अंतिम रूप देने के दौरान उक्त शब्द को हटाने की उम्मीद है। एक पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि भारत और चीन दोनों त्रिपक्षीय साझेदारी की अवधारणा को अस्वीकार करते हैं, इसलिए नेपाल को अपने राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखकर प्राथमिकताएं निर्धारित करनी चाहिए। अनौपचारिक रूप से प्रयुक्त यह शब्द सरकारी दस्तावेज में आने के कारण, चीन, भारत और नेपाल के बीच त्रिपक्षीय साझेदारी बनाने, संबंधों के नेटवर्क का विस्तार करने और दोनों महाशक्तियों के बीच नेपाल को पुल के रूप में स्थापित करने की धारणा सार्वजनिक हुई, जिसे काठमांडू के शीर्ष नेतृत्व ने पहले भी व्यक्त किया था।
हालांकि इस बार सभी पार्टियों के घोषणापत्रों के आधार पर तैयार सरकारी दस्तावेज में ही नेपाल को ‘बफर स्टेट’ के रूप में चिन्हित करने के प्रयास को देखकर, राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी नेतृत्व वाली सरकार के इस कदम पर कूटनीतिक जानकारों ने असंतोष जताया है। नेपाल में दो पूर्व प्रधानमंत्री के सलाहकार भी रह चुके कूटनीतिज्ञ दिनेश भट्टराई ने कहा, “ऐतिहासिक रूप से हम संप्रभु राष्ट्र हैं और किसी भी परिस्थिति में किसी और की सुरक्षा छत्रछाया में रहना नहीं चाहते।”





