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कम्युनिस्टों के इतिहास के कठघरे में पुकार

हे कम्युनिस्टों, अब तुम सुधर जाओ! पैरों के धूल को झाड़ते हुए वहीं जमीन को छुओ जहां से इंसान ने संघर्ष किया है, अन्याय के पहाड़ और शोषण के जख्म अब भी जिंदा हैं, समानता, न्याय और समृद्धि के लिए जुट जाओ। तुम थे – लाल अग्नि की तरह जो अपनी गर्जना से नया सवेरा लेकर आया, जिसका त्याग और बलिदान ही संविधान की धाराओं – गणतंत्र, स्वतंत्रता और जनाधिकार का आधार बना। लेकिन देखो, तुम्हारी वह महान धरोहर कहाँ पहुंची? कोई बोया कोई काट रहा है फसल!

हे युवा समाजवादी, इतिहास के रक्त और बलिदान की कीमत मत भूलो। ‘एल्गोरिदम’, ‘एआई’ और ‘वैश्वीकरण’ के भंवर में तुम पीछे छूट गए हो शायद, लेकिन विचारों की मृत्यु नहीं हुई है। समय की चाल को समझो, जागो और नेतृत्व की बागडोर संभालो। हे सच्चे क्रांतिकारियों, अब थकना मत। ‘पॉपुलिज्म’ के सस्ते बाजार में अपने सिद्धांत न बेचो। पूंजीवादी चमकधमक से अपनी चेतना छुपाओ मत। विज्ञान की गति के अनुरूप समाजशास्त्र का नया व्याख्यान लिखो, बीमारियों के बंधनों को काटो और गतिशीलता की अगुवाई करो।

हे प्रगतिशील चिंतक, तुम पराजित नहीं हो, बल्कि भ्रमित हो। अब मार्क्सवाद के ‘क्लासिकल’ सिद्धांतों से ऊपर उठो। पुनर्व्याख्या करके पूंजी और तकनीक के संगम को समझो। आर्थिक नई रफ्तार और समाज की बदलती धड़कन को महसूस करो। यथास्थिति की स्थिरता की झील को तोड़ो और समय के प्रवाह में तैरो। हे क्रांति के मशालधारक, अब बुझने का समय नहीं है। अहंकार, तुष्टि, दिखावा, मामूली मोहभंग और कुंठा को त्यागो और एकता, संघर्ष और परिवर्तन की नई ज्योति जलाओ। सिर पर सगरमाथा और दिल में सार्वभौमिक संप्रभुता लिए स्वाधीन देश के नए निर्माण के लिए आधुनिक दुश्मनों के खिलाफ जागो, उठो और चलो!

जब तुम खुद टूटते हो, तो तुम्हारा गौरव टूट जाता है और जनमत डगमगाता है, अहंकार का महल गिर जाता है। हे बिखरे लाल बूंदों, अब एकीकृत हो जाओ। वर्ग बदल चुके हैं, संघर्ष के स्वरूप को बदला है। “रक्त की नदी” नहीं, “विकास और सृजन” की जड़ बनो। हे वामपंथी, अब सुधर जाओ और संकल्प करो! ठंडी होती क्रांति की लौ में विश्वास का तेल डालो। तुम अब इतिहास के कठघरे में खड़े हो। साम्राज्यवादी और फासिस्ट प्रभुत्व जमाए हुए हैं। परीक्षा दो और जनता से माफी मांगो। समाजवाद की सुबह लाने के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ो।