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प्रधानमंत्री बालेन बनने के बाद सुकुमवासी बस्ती खाली करने की प्रक्रिया शुरू

१० वैशाख, काठमांडू । ९ भाद्र ०७९ को दिन तत्कालीन काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन शाह और राष्ट्रीय भूमि आयोग के अध्यक्ष केशव निरौला के बीच भूमिहीन दलित, भूमिहीन सुकुमवासी और असंगठित बसोबासियों की पहचान, लागत संग्रह और प्रमाणीकरण करने का समझौता हुआ था। लेकिन, इस समझौते को लागू करने में देरी हुई और २०७९ मंसिर १२ को काठमांडू महानगरपालिका ने थापाथली क्षेत्र में डोजर चलाया था। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों और स्थानीय लोगों के बीच झड़प हुई थी। यह विवाद अदालत तक पहुंचा है। भूमिहीनों ने महानगरपालिका पर समझौते को लागू न करके धोखा देने की शिकायत की है। काठमांडू महानगरपालिका की भूमि समस्या समाधान आयोग में आवेदन करने वालों की संख्या अत्यंत कम है, जहां अब तक केवल ५६ लोगों के आवेदन प्राप्त हुए हैं। बागमती सभ्यता एकीकृत विकास समिति द्वारा तीन वर्ष पहले तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, काठमांडू महानगरपालिका में भूमिहीन दलित, भूमिहीन सुकुमवासी और असंगठित बसोबासी की संख्या २,२४५ थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन ने पृथक भूमिहीन दलित, भूमिहीन सुकुमवासी और असंगठित बसोबासी की समस्याओं पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है। मंत्रिपरिषद की बैठक में देश भर के इन वर्गों के लिए ६० दिनों के भीतर एकीकृत डिजिटल लागत संग्रह और प्रमाणीकरण करने का निर्णय लिया गया है। सरकार ने १००० दिनों के भीतर वास्तविक भूमिहीनों को भूमि उपलब्ध कराने या एकीकृत आवास के माध्यम से पुनर्वास कराने की व्यवस्था करने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री बालेन ने गृह मंत्रालय संभालने के दिन से ही भूमिहीन और असंगठित बसोबासियों के बस्तियों में डोजर चलाने का निर्देश दिया था। संयुक्त राष्ट्रीय सुकुमवासी मोर्चा के उपाध्यक्ष पवन गुरुङ ने कहा, “हम संवाद के माध्यम से शान्तिपूर्ण तरीके से कानूनी समाधान के पक्ष में हैं, लेकिन सरकार बार-बार समझौता कर धोखा दे रही है।” भूमि संबंधी समस्या समाधान के इस निर्णय को संबंधित पक्षों ने स्वागत किया है। नेपाली महिला एकता समाज ने कहा है कि “भूमिहीन, सुकुमवासी तथा असंगठित बसोबासियों के प्रबंधन की पहल सकारात्मक है।” लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की इस अपेक्षा असंभव है। उच्च अदालत पाटन ने २०८० साउन में छह महीने के भीतर योजना बनाने का निर्देश दिया था और लागत संग्रह एवं प्रमाणीकरण का आदेश भी दिया था। जवाबदेही निगरानी समिति ने कहा है, “प्रधानमंत्री के कड़े आदेश के आधार पर सुरक्षा बलों को तैनात कर जबरन बस्ती खाली करवाना न केवल सरकारी कार्यसूची संख्या ९१ का उल्लंघन होगा, बल्कि भूमिहीन और सुकुमवासी लोगों के संवैधानिक, कानूनी और मानवाधिकारों का भी कठोर उल्लंघन होगा।” सरकार ने भूमिहीन दलित, भूमिहीन सुकुमवासी को भूमि उपलब्ध कराने और असंगठित बसोबासियों का प्रबंधन करने के उद्देश्य से भूमिसंबंधी अधिनियम के तहत भूमि समस्या समाधान आयोग का गठन किया है। आयोग में अब तक १२ लाख ९ हजार ५९ लोगों ने आवेदन किया है। वरिष्ठ अधिवक्ता राजुप्रसाद चापागाईं ने कहा, “संरक्षण और सौंदर्यीकरण के नाम पर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन नहीं होना चाहिए।” काठमांडू महानगरपालिका के प्रवक्ता नवीन मानन्धर ने बताया कि बस्ती खाली करने के विषय में प्रमुख जिला अधिकारी से चर्चा कर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।