
११ वैशाख, काठमांडू। ८ अप्रैल २०२६ को ‘ट्रुथ सोशल’ पर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पश्चिमी एशिया के लगभग ९ करोड़ ३० लाख लोगों के भविष्य को अनिश्चितता में डालने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा, ‘एक पूरी सभ्यता आज रात मर जाएगी, जो कभी वापस नहीं आएगी।’
तेहरान की एक युवा शिक्षिका ने यह संदेश पढ़ा और अचानक डर गईं। राष्ट्रपति के कठोर शब्दों ने उन्हें एक भयानक वास्तविकता का सामना कराया। उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया को कहा, ‘अगर हमारे पास इंटरनेट, बिजली, पानी और गैस कुछ भी बचा नहीं, तो हम सचमुच पत्थर युग में लौट जाएंगे।’
ट्रम्प ने अपनी योजना का विनाशकारी खाका भी सार्वजनिक किया। इरान के सभी पुल टूट जाएंगे और हर विद्युत केंद्र को कभी पुनर्निर्माण न हो सके इस तरह से नष्ट कर दिया जाएगा। इस संदेश ने करोड़ों नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक पूर्वाधार जैसे तापमान नियंत्रण प्रणाली, जल शोधन केंद्र, अस्पताल और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह प्रभावित करने की व्यापक घोषणा की। इस विनाश से पूरी सभ्यता अंधकार में डूब जाएगी, यह निश्चित था।
इसके जवाब में कुछ डेमोक्रेटिक सिनेटरों ने अपनी पार्टी के अंदर एक स्वर में कहा, ‘हम आज राष्ट्रपति ट्रम्प की सभ्यता नष्ट करने की धमकी की कड़ी निंदा करते हैं। लाखों आम लोगों के जीवन से जुड़े बुनियादी पूर्वाधार को जानबूझकर नष्ट करना जेनेवा कन्वेंशन का सीधा उल्लंघन और एक अक्षम्य युद्ध अपराध होगा।’
केवल डेमोक्रेटिक नेताओं ही नहीं, ट्रम्प के एक पूर्व कट्टर समर्थक सांसद मार्जोरी टेलर ग्रीन ने भी इस पोस्ट को ‘दुष्टता और पागलपन’ बताया और राष्ट्रपति की अक्षमता के कारण पच्चीसवें संशोधन को लागू करने की मांग की।
पोप फ्रांसिस ने इसे ‘सर्वशक्तिमान बनने का भ्रम’ बताते हुए ट्रम्प के नैतिक पतन और मानवीय मर्यादा के अपहरण पर कटु सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह अधिकार कि किसका जीवन मूल्यवान है और किसका नहीं, अंतिम निर्णय केवल अमेरिका के पास होना अमेरिकी विश्वास और मूल्यों के खिलाफ है।
२८ फरवरी २०२६ को अमेरिका और इज़राइल ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और ‘रॉरिंग लायन’ नाम के सैन्य अभियानों के तहत संयुक्त हमले शुरू किए। हमले से दो दिन पहले ही ओमान के मध्यस्थों ने २६ फरवरी की बातचीत को ‘राजनयिक प्रगति’ बताया था, लेकिन ४८ घंटे भी न बीते थे कि ट्रम्प ने दावा किया कि इरान से अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा को सीधा खतरा है और आक्रमण का आदेश दिया।
२८ फरवरी से ८ अप्रैल तक चले इस भयंकर युद्ध में इज़राइल ने सैकड़ों हवाई हमले किए और हजारों बम गिराए। स्रोतों के अनुसार अमेरिका ने १०० घंटों के भीतर २,००० से अधिक लक्ष्यों पर हमले किए। इन हमलों का निशाना इरान के परमाणु केंद्र, बैलिस्टिक मिसाइल पूर्वाधार, वायु रक्षा प्रणाली और उच्च सैन्य नेतृत्व थे। इस विनाश ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झौंक दिया।
ऐसे समय में एक मूलभूत सवाल उठता है, क्या यह ‘अचानक हमला’ लोकतांत्रिक मूल्य और मान्यताओं के अनुकूल है? पारदर्शिता, जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान जैसे मूलभूत सिद्धांतों को ट्रम्प के एकल निर्णय ने बेरहमी से ठेस पहुंचाई।
हालांकि अमेरिकी संविधान में युद्ध की घोषणा करने का अधिकार कांग्रेस को दिया गया है, ट्रम्प ने इस संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार कर शक्ति का दुरुपयोग किया।
शक्ति का यथार्थवाद: मियर्सहाइमर के आइने में अमेरिका
शिकागो विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध राजनीतिक वैज्ञानिक जॉन मियर्सहाइमर दशकों से यह स्पष्ट करते आए हैं कि राज्य आदर्शों या नैतिकता से नहीं, बल्कि शक्ति के कठोर तर्क से संचालित होते हैं।
उनका ‘अफेंसिव रियलिज्म’ सिद्धांत, जिसे उन्होंने २००१ की पुस्तक ‘द ट्रेजडी ऑफ ग्रेट पावर पोलिटिक्स’ में विस्तार से बताया है, वैश्विक राजनीतिक अराजकता में राज्य सुरक्षा से संतुष्ट नहीं रहते और हमेशा अपनी शक्ति अधिकतम करने का प्रयास करते हैं।
उनके मुताबिक संयुक्त राज्य अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध का एकमात्र क्षेत्रीय प्रभुत्वशाली राष्ट्र है। इस स्थिति को पाने के बाद ऐसे राष्ट्र अपने प्रतिस्पर्धियों के उदय को रोकने में सक्रिय होते हैं।
अमेरिका का पश्चिमी एशिया में हस्तक्षेप, पूर्वी एशिया में सैन्य उपस्थिति और यूरोप में नाटो के माध्यम से भूमिका निभाना ‘लोकतंत्र का प्रसार’ या ‘मानवाधिकार की रक्षा’ के नाम पर हो, लेकिन असल में इन सभी का मूल चालक राज्य स्वार्थ का गणित होता है।
ट्रम्प प्रशासन की कार्यशैली इस यथार्थ की पुष्टि करती है। व्हाइट हाउस के सलाहकार स्टीवन मिलर ने कहा, ‘हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ शक्ति और बल से राज होता है’, और २०२५ की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति ने ‘फ्लेक्सिबल रियलिज्म’ अवधारणा को बढ़ावा देकर ‘जिसकी शक्ति, उसकी ही सही’ की धारणा को नए रूप में पुनर्जीवित किया।
मियर्सहाइमर के अनुसार अधिकतम शक्ति ही अंतिम सुरक्षा है, यह धारणा पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई, क्योंकि कोई भी राष्ट्र बिना अन्य शक्तियों के हस्तक्षेप के पूर्ण अधिपत्य हासिल नहीं कर पाया है।
इरान के खिलाफ युद्ध के दौरान होर्मुज जलमार्ग पर तेल की आपूर्ति में व्यवधान से वैश्विक बाजारों में बड़े उतार-चढ़ाव आए, जिससे अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ा।
फिर भी मियर्सहाइमर के सिद्धांत में कुछ कमजोरियां हैं। आलोचक कहते हैं कि सभी महाशक्तियां एक जैसी व्यवहार नहीं करतीं, और लोकतांत्रिक और तानाशाही राज्यों के बीच बड़ा फर्क होता है। इतिहास बताता है कि जवाबदेह संस्थाओं वाले देशों में युद्ध निर्णय कम तानाशाही और विनाशकारी होते हैं। इसलिए मियर्सहाइमर का सिद्धांत अमेरिकी व्यवहार को समझाता जरूर है, लेकिन नैतिक वैधता नहीं देता।
जेफ्री साक्स और ‘अमेरिका फर्स्ट’ के अंदरूनी कारण
विश्व बैंक और आईएमएफ के वरिष्ठ सूत्रधार रह चुके तथा बाद में आलोचक बने जेफ्री साक्स अमेरिकी विदेश नीति की प्रमुख समस्या को गहरे विरोधाभास में देखते हैं।
उनके अनुसार अमेरिकी विदेश नीति का अंतर्निहित उद्देश्य एक अमेरिका नियंत्रित विश्व व्यवस्था स्थापित करना है, जहां अमेरिका व्यापार, वित्तीय नियमों, प्रौद्योगिकी नियंत्रण और सैन्य सर्वोच्चता कायम करने के साथ प्रतिद्वंदी देशों को नियंत्रित करता है।
अगर यह नीति बहुध्रुवीय विश्व के यथार्थ को स्वीकार नहीं करती, तो यह अधिक विनाशकारी युद्धों को जन्म दे सकती है और संभवतः तीसरे विश्व युद्ध तक ले जा सकती है।
यह विरोधाभास संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में साफ नजर आता है, जहां सभी सदस्य राष्ट्र बिना किसी एक राष्ट्र के वर्चस्व के साझा संस्थाओं पर आधारित विश्व व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध थे।
साक्स का सबसे तीखा आरोप अमेरिकी नेतृत्व वाली ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (रूल-बेस्ड इंटरनेशनल ऑर्डर) पर है। उनके अनुसार अधिकतर देशों ने बहुपक्षीय नियमों को मानने की इच्छा जताई है, लेकिन अमेरिका और उसके कुछ मित्र देश इन नियमों को केवल अपने फायदे के लिए बनाकर विश्व पर थोपते हैं। इसलिए असली नियम-आधारित व्यवस्था और अमेरिका-परिभाषित व्यवस्था के बीच एक गहरा अंतर है।
साक्स ने अप्रैल २०२५ में लिखा कि ग्रैम्सी के प्रसिद्ध कथन को याद करते हुए, ‘समस्या यह है कि पुराना मर रहा है और नया जन्म नहीं ले पा रहा है, इसी संक्रमण काल में कई अस्वस्थ लक्षण उभरते हैं।’
उनके अनुसार अमेरिका नेतृत्व वाली पुरानी व्यवस्था समाप्त हो चुकी है, लेकिन बहुध्रुवीय विश्व अभी जन्म नहीं ले पाया। इस संक्रमण काल के सबसे स्पष्ट अस्वस्थ लक्षण ट्रम्प का पर्सियन सभ्यता पर दिया गया विनाशकारी धमकी है।
इतिहास में देखें तो १५०० में एशिया विश्व उत्पादन का ६५% हिस्सा था, जो यूरोपीय उपनिवेशवाद के कारण १९५० तक गिरकर सिर्फ १९% रह गया।
साक्स के अनुसार आज यह चक्र उलटा हो रहा है और जी-७ देशों का कुल उत्पादन ‘ब्रिक्स’ देशों से कम हो चुका है। यह केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि शक्ति और वैधता में ऐतिहासिक परिवर्तन का संकेत भी है।
साक्स希望 करते हैं कि अमेरिकी विदेश नीति सैन्य शक्ति और ‘अपनी पसंद के युद्ध’ से हटकर सतत विकास के साझा उद्देश्य पर केन्द्रित हो। उनका मानना है कि श्रेष्ठता की खोज ने अमेरिका को विवेकहीन और असफल युद्धों में फंसा दिया। उनका निष्कर्ष मार्मिक है: ‘अमेरिका को लगता है कि वह दुनिया चला रहा है, लेकिन वास्तव में विश्व की ९६% आबादी को नियंत्रित करने की आर्थिक, सैन्य, तकनीकी शक्ति और इसके लिए आवश्यक कानूनी व नैतिक आधार अब अमेरिका के पास नहीं हैं।’
पश्चिमी उदारवाद का अंत: डुगिन और बहुध्रुवीयता की भविष्यवाणी
रूसी दार्शनिक अलेक्जेंडर डुगिन (जिन्हें अक्सर पुतिन का मस्तिष्क कहा जाता है और जिन्होंने अपनी बेटी दार्या डुगिन को कार बम विस्फोट में खोया) पश्चिमी प्रभुत्व का अंत दार्शनिक और सभ्यतावादी दृष्टिकोण से समझाते हैं।
उनका ‘चौथा राजनीतिक सिद्धांत’ आधुनिकता के तीन मुख्य खंभों — उदारवाद, साम्यवाद और फासीवाद — को अपर्याप्त बताते हुए एक नए बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की कल्पना करता है।
डुगिन के अनुसार उदारवाद का वैश्विक आधिपत्य अब इतिहास बन रहा है और दुनिया को अब विविध सभ्यताओं पर आधारित शक्ति केंद्रों के उदय को स्वीकार करना होगा।
वे विश्व के राष्ट्रों को विभिन्न श्रेणियों में बांटते हैं। चीन, रूस, इरान और भारत जैसे राष्ट्र अमेरिकी प्रभुत्व से निर्भरता छोड़े हुए अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि वे सीधे संघर्ष से बचते हैं।
दूसरी ओर इरान, वेनेजुएला और उत्तर कोरिया जैसे देश पश्चिमी मूल्यों और अमेरिकी प्रभुत्व को सीधे चुनौती दे रहे हैं।
२०२५ की शुरुआत में मास्को में दिए भाषण में उन्होंने कहा कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तीन तरह की अनिश्चितताओं से गुजर रही है: एकध्रुवीय और बहुध्रुवीय विश्व के बीच संक्रमण, बहुध्रुवीयता का अस्पष्ट सैद्धान्तिक स्वरूप, और ट्रम्पवाद की अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय अभिव्यक्ति।
डुगिन का मुख्य तर्क है कि छोटे देशों को भले ही सार्वभौमिकता का भ्रम हो, वास्तविक शक्ति सैन्य और राजनीतिक रूप से संगठित ‘सभ्यतावादी केंद्रों’ में केंद्रित है।
उन्होंने फ्रांसीसी बुद्धिजीवी बर्नार्ड-हेनरी लेवी से बहस में कहा कि अगर अमेरिका का पतन नहीं रुका तो यह कई सभ्यतावादी साम्राज्यों के युग की शुरुआत होगी, जिससे राष्ट्र-राज्य अवधारणा कमजोर होगा और बड़े क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभुत्व बढ़ेगा।
डुगिन का दर्शन विवादास्पद है। कई पश्चिमी विद्वान उन्हें तानाशाही साम्राज्यवाद का समर्थक मानते हैं, खासकर यूक्रेन पर रूसी आक्रमण को दार्शनिक रूप से सही ठहराने के कारण।
लैटिन अमेरिकी आलोचक कहते हैं कि डुगिन अमेरिकी साम्राज्यवाद की निंदा करते हैं, लेकिन रूसी साम्राज्यवाद को उत्साह से समर्थन देते हैं, जो उपनिवेशवाद का दूसरा रूप मात्र है। हालांकि उनकी एक भविष्यवाणी — कि उदारवादी लोकतंत्र का वैश्विक प्रभुत्व कमजोर हो रहा है और वैकल्पिक शक्ति केंद्र उभर रहे हैं — वर्तमान विश्व राजनीति द्वारा हर दिन प्रमाणित हो रही है।
संस्थागत असफलता: नाटो और संयुक्त राष्ट्र की अक्षमता
अमेरिकी प्रभुत्व और एकलौता व्यवहार को कौन रोक सकता है? सैद्धांतिक रूप से नाटो और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं शक्ति संतुलन बनाए रखने और संघर्ष रोकने के लिए बनाई गई हैं, लेकिन व्यवहार में ये संस्थाएं अपनी संरचनात्मक सीमाएं स्पष्ट करती हैं।
नाटो की आंतरिक संरचना में अमेरिकी प्रभुत्व गहराई से जड़ें जमा चुका है और यह स्वतंत्र काम करने में असमर्थ हो चुका है।
ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने नाटो के संयुक्त बजट में योगदान आधे से घटाकर २०२५ के मध्य तक १६ प्रतिशत कर दिया, जिससे गठबंधन के प्रति वाशिंगटन की नजर लेन-देनात्मक हो गई।
नाटो के भीतर सामरिक एकता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि सदस्य देशों के सुरक्षा विचार और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। यूरोपीय देशों ने सुरक्षा बजट बढ़ाया है, लेकिन इससे अधिकतर अमेरिकी हथियार निर्माता लाभान्वित होते हैं।
इसी कारण यूरोप अमेरिकी रक्षा प्रणाली पर और अधिक निर्भर हो गया है बजाए अपनी स्वायत्तता हासिल करने के।
जब ट्रम्प ने नाटो को ‘कागजी बाघ’ कहा और रक्षा सचिव हगसेथ ने अमेरिका की प्राथमिकता केवल यूरोप की सुरक्षा नहीं होने की घोषणा की, तब नाटो एक अनोखे मोड़ पर पहुंच गया। इस अमेरिकी नेतृत्व वाले संगठन को अब अमेरिका खुद बोझ समझने लगा है।
संयुक्त राष्ट्र की स्थिति और भी दयनीय है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों को दिया गया ‘वेटो’ अधिकार कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को रोक देता है। इन सदस्यों ने वेटो का उपयोग अत्यधिक बढ़ा दिया है, जिससे परिषद की क्षमता और निष्पक्षता पर सवाल उठता है।
जेफ्री साक्स के अनुसार सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना १९४५ के विश्व का प्रतिबिंब है, लेकिन २०२६ की वास्तविकताओं को नहीं। लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के लिए कोई स्थायी सदस्यता नहीं है, जबकि एशिया में केवल एक स्थायी सीट है।
साथ ही संयुक्त राष्ट्र के कुल बजट का लगभग २२ प्रतिशत और शांति सेना का करीब २७ प्रतिशत एक अकेले अमेरिका खर्च करता है, जिससे इस संस्थान की निष्पक्षता हमेशा संदिग्ध बनी रहती है।
क्यों कोई रोक नहीं सकता?
अमेरिकी प्रभुत्व और एकलौता व्यवहार को तुरंत रोकना मुश्किल है इसके तीन मुख्य कारण हैं: पहला, डॉलर की वित्तीय प्रभुत्व; दूसरा, विश्वभर सैनिक उपस्थिति; और तीसरा, अंतरराष्ट्रीय कानून का चयनात्मक पालन।
डलर की वैश्विक प्रभुत्व अमेरिकी शक्ति का सबसे प्रभावशाली आधार है। यह केवल सैन्य शक्ति से गहरा है क्योंकि यह हर देश की आर्थिक गतिविधियों में अमेरिका की उपस्थिति सुनिश्चित करता है।
१९७४ में हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ ऐसा समझौता किया जिसने पेट्रोडॉलर व्यवस्था की नींव डाली, जिसके तहत सऊदी ने अपनी तेल बिक्री केवल डॉलर में करने पर सहमति दी और अमेरिका ने उनकी सैन्य सुरक्षा और आधुनिक हथियार की गारंटी दी।
इसने ऐसा चक्र बना दिया जहां हर देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत होती थी और तेल निर्यातक देश अपने डॉलर को अमेरिकी वित्तीय बाज़ार में निवेश करते थे।
इतिहास बताता है कि इस आर्थिक संरचना को चुनौती देने वालों को महंगा भू-राजनीतिक दाम चुकाना पड़ा है। वेनेजुएला ने चीन के युआन में तेल बेचने का फैसला किया तो उसे संकट का सामना करना पड़ा, जिसे विश्लेषक आकस्मिक नहीं मानते।
लेकिन आज इरान जोखिम भरे नए परीक्षण कर रहा है। इरान ने होर्मुज जलमार्ग के पारगमन और अमेरिकी-इजरायली सैन्य कार्रवाइयों का समर्थन बंद करने की मांग की है, साथ ही तेल लेनदेन डॉलर की जगह युआन में करने की शर्त रखी है।

ड्यूच बैंक के विश्लेषक इसे ‘पेट्रोडॉलर’ प्रभुत्व के कमजोर होने और ‘पेट्रोयुआन’ के उभरने की संभावित अवस्था के रूप में देख रहे हैं। २०२५ तक विश्व रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी ५७.८ प्रतिशत तक गिर गई है, जो इसके ऐतिहासिक निरपेक्षता के समाप्त होने का संकेत है।
सैनिक क्षेत्र में भी अमेरिकी वैश्विक उपस्थिति अब भी अतुलनीय है। यूरोप में ८० हजार सैनिक तैनात हैं और हिंद-प्रशांत से मध्य पूर्व तक सैकड़ों सैन्य ठिकाने हैं।
२०२५ तक अमेरिका नाटो की कुल सैन्य क्षमता का अकेले ४४ प्रतिशत संभालता है। यह अमेरिकी कूटनीति को हमेशा प्राथमिकता देता रहा है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून का ‘चयनात्मक पालन’ इस शक्ति का सबसे विवादित पहलू है। अमेरिका अपनी सुविधा के अनुसार कानून का पालन करता या नजरअंदाज करता रहा है।
जब ट्रम्प ने कहा कि इरान में नागरिक पूर्वाधार को नष्ट करना युद्ध अपराध है, तो उन्होंने खुद परमाणु हथियारों को बहुत बड़ा अपराध बताया। अमेरिका ने संसद की मंजूरी के बिना खुद को कानूनी दायरे से ऊपर रखा है।
ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन के अनुसार ट्रम्प की २०२५ सुरक्षा रणनीति ने ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ को छोड़ कर ‘शक्तिशाली राष्ट्र के नियम’ की अन्तरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा दी है।
एकध्रुवीय प्रभुत्व की रक्षा
पूर्व राजदूत और राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर लोकराज बराल के मुताबिक अमेरिका के मौजूदा कृत्य मानवता के लिए नहीं, बल्कि अपनी शक्ति और एकध्रुवीय प्रभुत्व को कायम रखने के स्वार्थ से प्रेरित हैं। उन्होंने कहा, ‘अमेरिका का उद्देश्य दुनिया में किसी अन्य को खड़ा न होने देना है। चीन को रोकने की कोशिश स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।’
इरान के परमाणु हथियार बनाने से मध्य पूर्वी देशों को खतरा होगा, यह अमेरिकी तर्क केवल अपने नेतृत्व को बचाने का बहाना है, वे कहते हैं।
इतिहास बताता है कि बड़े साम्राज्य जब अत्यधिक विस्तार करते हैं तो वे जल्दी पतन के रास्ते पर चले जाते हैं। अमेरिका बहुध्रुवीय विश्व को स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि चीन, रूस, भारत और यूरोप जैसी शक्तियां उसके एकध्रुवीय प्रभुत्व को कमजोर कर रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय अदालत द्वारा इजरायली प्रधानमंत्री को युद्ध अपराधी घोषित करने के बावजूद कुछ भी ठोस न कर पाना वर्तमान विश्व व्यवस्था की अक्षमता दिखाता है।
इराक और लिबिया जैसे देशों में सरकारों को आसानी से बदल पाने की अमेरिकी सोच इरान में विफल साबित हुई है। वे वियतनाम और अफगान युद्धों की असफलताओं का हवाला देते हुए कहते हैं, ‘बड़ी शक्ति का होना हमेशा जीतना नहीं होता।’
इरान मसले पर ट्रम्प अपने सहयोगी देशों और नाटो से अलग हो गए हैं। उन्होंने नाटो को ‘कागजी बाघ’ कहा और भारतीय नेतृत्व को भी अपमानित किया, जो उनकी हताशा और बेचैनी का परिचायक है। ‘इरान में कदम रखने से पहले स्पष्ट उद्देश्य तय नहीं किया गया था और न ही बाहर निकलने की योजना बनाई गई थी। अब वे गंभीर मुसीबत में फंसे हैं,’ बराल कहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी युद्ध शुरू करने से पहले सुरक्षित निकास योजना न होने के कारण अमेरिका को भारी कीमत चुकानी पड़ी है, ऐसा प्रोफेसर बराल का निष्कर्ष है।
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजदूत जयराज आचार्य का कहना है कि अमेरिका ने अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं छोड़ी है। लोकतांत्रिक प्रणाली में नेतृत्व या नीति में अस्थिरताएं समय-समय पर होती रहती हैं जिन्हें सुधारा जा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘व्यावहारिक रूप से इन समस्याओं का समाधान करना कठिन है, लेकिन वहां के मीडिया और नागरिक राज्य के अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, जो दर्शाता है कि लोकतंत्र अभी भी जीवित है।’





