Skip to main content

‘सड़क पर सामान भीगा, कपड़े बदलने और दवा लेने में असमर्थ’ – विस्थापितों की व्यथा

सरकार ने काठमाडौं की सुकुम्वासी बस्ती को ध्वस्त कर २१९ परिवारों को दशरथ रंगशाला के होल्डिंग सेंटर में स्थानांतरित किया है। बस्ती टूटने के बाद कई लोगों को दवा नहीं मिल पाई, खाने की कमी हुई और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, ऐसा स्वास्थ्यकर्मियों ने बताया है। स्वास्थ्य जांच में ४७ व्यक्तियों में कमजोरी और रक्तचाप की समस्या पाई गई, तथा एक वृद्ध मृगौला रोगी को वीर अस्पताल में रेफर किया गया है। १३ वैशाख, काठमाडौं।

त्रिपुरेश्वर स्थित दशरथ रंगशाला की होल्डिंग सेंटर में ६० वर्षीया सम्झना राई काँप रही हैं। भीड़ के बीच ज़मीन पर बैठी सम्झना का चेहरा फीका दिखता है। उनकी आँखें नम हैं। वे उच्च रक्तचाप की पुरानी मरीज हैं और नियमित दवाइयां लेती हैं। ‘शरीर लगातार थरथरा रहा है। दवा नहीं ले पाई हूँ। भूख लगी है। कल रात पूरी नींद नहीं आई,’ उन्होंने आंसू पोछते हुए परीक्षण कर रहे स्वास्थ्यकर्मी से कहा।

सम्झना की आवाज़ धीमी है। थोड़ी देर बोलने पर भी वे थक जाती हैं। ‘अब कुछ बचा नहीं है,’ आंसू पोछते हुए उन्होंने कहा। वे १४ वर्षों से मनोहरा किनारे के टहरे में रह रही थीं। रविवार सुबह सरकार ने डोजर चलाया और टहरा कुछ ही क्षणों में ध्वस्त हो गया। ‘हमें सामान निकालने का भी समय नहीं दिया गया,’ उन्होंने बताया। जल्दबाजी में सामान निकालते समय कई चीजें खो गईं। ‘दवाइयां कहाँ गयी पता नहीं, कपड़े बदलने को भी कुछ नहीं है,’ वे भावुक होती हुईं सुनाई दीं।

गोपाल सुनार, ४६ वर्ष के, जिनके चेहरे पर चिंता और थकान झलक रही है, की रक्तचाप मापन करते समय स्वास्थ्यकर्मी की मशीन ने १६०/१०० अंक दर्ज किया। ‘रक्तचाप बहुत ऊँचा है,’ स्वास्थ्यकर्मी इन्दिरा पोखरेल ने कहा। गोपाल ने बताया, ‘मैं दवा न लेने वाला मरीज हूँ। बहुत तनाव हुआ, शायद इसलिए बढ़ा होगा।’ सरकार द्वारा बनाए गए जड़ी-बूटी के छोटे टहरे को ध्वस्त करने के बाद उन्हें गहरा तनाव हुआ है। ‘अब मेरे बच्चों का भविष्य उज्जवल नहीं दिखता,’ गोपाल ने निराशा व्यक्त की।