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एमआरआर के युवा भजन-कीर्तन में मग्न

सुबह के ब्रह्म मुहूर्त में दादा-परदादा ‘ॐ जय जगदीश हरे’ गाते थे तो उन्हें सिरक की तरह सिमटते देखा जाता था। घंटी और शंख की ध्वनि तथा भजन की मधुर तान उन्हें न जागृत करती थी, न ही मोहित। वे तो कासेट प्लेयर पर ‘हो जा रंगीला रे’ बजाकर शरीर के अंगों को झूमाकर अपना दिन शुरू करते थे। सुबह की आरती में वे थाली नहीं घुमाते थे, पूजा-अर्चना नहीं करते थे, टीका-प्रसाद ग्रहण नहीं करते थे। अंततः भक्ति भजन के साथ शुरू होने वाली घर की दिनचर्या बदल गई। रविवार सुबह की पूजा-पाठ और शाम को सत्संग करने का पारंपरिक क्रम टूट गया। मिलेनियल्स और जेन-जेड के सम्मिलित इस पीढ़ी ने अचानक एक सौ अस्सी डिग्री का बदलाव किया। उन्होंने खैजड़ी उठाई, ढोलक बजाई, झ्याली पीटी। और भक्तिभाव से मगन होकर भजन-कीर्तन गाने लगे। आधुनिकता के रंग पहने, तकनीक की रफ्तार पकड़ चुके, विज्ञान के भरोसे चलने वाली यह पीढ़ी किस मानसिकता के साथ भजन-कीर्तन कर रही है? यह एक सुखद रहस्य है। इस रहस्य के पर्दा उठाने के लिए एमआरआर में प्रवेश करना पड़ा।

एमआरआर यानी मेन्स रूम रिलोडेड। लगभग 15 साल पहले किसी युवक ने अपनी इच्छा से फेसबुक पर एक पेज बनाया, जिसका नाम एमआरआर रखा। युवाओं का अपना एक समूह, जहां वे वर्चुअल चाय-गप कर सकें। 18 वर्ष से ऊपर, जुझारू और खुले विचारों वाले वैशालु के युवा इस पेज पर स्वागत पाते हैं। यहां वे अपना दिल खोलकर ‘ननवेज’ बातें कर अपनी असली पहचान दिखा सकते हैं। वे जो चाहे कह सकते हैं, अपनी सोच साझा कर सकते हैं। हल्के-फुलके गपशप, सामान्य समस्याएं और मनोरंजक जोक्स के साथ शुरू हुआ यह पेज एक अलग सत्ता बन गया। यह समूह पूरी दुनिया के समान विचारधारा वाले युवाओं को जोड़ता है। सामाजिक नेटवर्क पर युवा आवाज को एक सूत्र में बांधने की क्षमता इसी समूह में है। वे कभी चेतावनी देते हैं तो कभी साझा करते हैं। वे ‘स्वर्ण उम्र’ को मनमौजी खर्च के लिए नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी में योगदान करने की दिशा में लगाते हैं।

आखिरकार यह समूह बनभोज, भेंट, चर्चा में जुटा रहता है, कभी वृक्षारोपण के लिए एकजुट होता है, कभी सफाई अभियान में, कभी बचाव कार्यों में तथा स्वयंसेवा में। भौतिक योगदान के साथ अभूतपूर्व आध्यात्मिक जागृति की भी यह टोली शामिल होती है। सामूहिक भजन-कीर्तन इसी जागरण की एक कड़ी है। टिक टॉक, रील्स और इंस्टाग्राम पर व्यस्त युवा इससे भजन मंडली में जुड़ गए हैं। इसलिए विभिन्न स्थानों पर युवा मिलकर पूर्ण भक्तिभाव के साथ भजन-कीर्तन गा रहे हैं। वह वही पीढ़ी है जो धर्म-परंपरा से कुछ मोहभंग हुई थी, फिर उसी पीढ़ी ने भजन में स्वर मिलाकर स्वाभाविक रूप से टोल-मोहल्लों में इकट्ठा होना शुरू कर दिया है, और समाज यह बदलाव देख रहा है।

संध्याकाल का समय है। हल्की लालिमा लिए सूर्य अस्त हो रहा है। किसी मंदिर परिसर का सात्विक वातावरण है। जीन्स और टी-शर्ट पहने युवा आमने-सामने बैठे हैं। सिर पर ढाका टोपी, गले में रुद्राक्ष और रामनामी लिए। खैजड़ी, ढोलक और झ्याली की ताल पर वे एकसाथ गाना शुरू करते हैं— ‘लीला हो रही है…हा, राम तुम्हारे मंदिर में’। कोई धीरे-धीरे अर्धवृत्ताकार घूमते हुए नाचता है, कोई सुरों में तब्दीलियां करता है। माहौल ऐसा मादक होता है, मानो ये कोई हिप्पी युग के युवा हों जो ‘हरे राम हरे कृष्ण’ गा रहे हों—गिटार की धुन पर। ‘अभी अभी चलना शुरू हुआ जीवन आधा वृंदावन में… कृष्ण के साथ, राधा का धर्म आधा-आधा होता है या नहीं हे राधा…अहै….’ संध्या भजन की यह लहर धीरे-धीरे बढ़ती है। युवाओं का समूह बढ़ता जाता है। देखते ही देखते यह एक नदी के प्रवाह की तरह विशाल तरंग बन जाती है। अंत में यह लहर काठमाडौं के किसी मंदिर को पार कर चितवन, बुटवल, भैरहवा, हेटौंडा, पोखरा तक फैलती है। और इसकी गूंज दुबई, क़तर, मलेशिया से होती हुई जापान और फिनलैंड तक पहुँच जाती है। ‘एमआरआर भजन मंडली’ के बैनर के साथ युवा गर्व के साथ स्टेटस लिखते हैं, ‘एमआरआर भजन अब फलाने स्थान पर भी’। भक्ति, संगीत और आराधना के इस युवा समूह ने स्वयं एक अभियान जैसी शक्ल ले ली है। ‘एमआरआर भजन’ शीर्षक के तहत विभिन्न दिनांक, स्थान और समय पर नियमित भजन-कीर्तन का सिलसिला चलता है।

लगभग एक वर्ष पूर्व की बात है। एमआरआर समूह के युवक भृकुटीमंडप में मिलते, बातचीत करते, चाय पीते और फुटसल खेलते थे। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, ‘क्या भजन-कीर्तन किया जाए?’ यह बात यहीं से शुरू हुई। एमआरआर के संस्थापक संतोषकुमार थापा बताते हैं, ‘उसके बाद हमने काठमाडौं में एक शाम भजन-कीर्तन का आयोजन किया।’ उस वक्त कुछ युवा इकट्ठा हुए। शहर की मादक शाम में घूमते हुए वे किसी मंदिर में ‘हरे राम हरे कृष्ण’ के भजन गा रहे थे। यहीं से भजन-कीर्तन की यह श्रृंखला शुरू हुई और धीरे-धीरे युवा इसमें जुड़ते गए। ‘शुरुआत में हम सीमित स्थानों पर भजन-कीर्तन करते थे’ संतोष बताते हैं, ‘बाद में बुटवल, पोखरा, हेटौंडा आदि में एमआरआर के साथी भी इसे शुरू करने लगे। अब यह न केवल नेपाल में, विदेश में भी फैला हुआ है।’ इस क्रेज का स्तर इतना बढ़ चुका है कि साप्ताहिक भजन अब एक बड़ा उत्सव बन गया है। जहां जहां युवा भजन-कीर्तन के लिए बैठते हैं, वहां स्थानीय लोग भी सात्विक भीड़ में शामिल होते हैं। वे उमंग से हिस्सा लेते हैं, भक्तिभाव से नाचते और गाते हैं। ‘आज कुछ मठ-मंदिरों ने हमें आमंत्रित करना शुरू कर दिया है’ संतोष कहते हैं, ‘खुशी की बात यह है कि नव वर्ष की पूर्व संध्या पर हमें पशुपतिनाथ से भजन के लिए बुलावा मिला।’ जब युवा एकजुट होकर उल्लासपूर्ण वातावरण में भजन-कीर्तन करने लगते हैं तो कई पूछते हैं, ‘कितना खर्च होगा, हम भी यहां भजन कार्यक्रम करना चाहते हैं।’ ‘लेकिन हम पैसा लेकर भजन-कीर्तन नहीं करते’ संतोष कहते हैं, ‘यह पूरी तरह निशुल्क है। इसमें कोई तैयारी नहीं करती, बस स्वाभाविक रूप से जुटती है।’ ‘फलाने जगह, फलाने तिथि को भजन होगा।’ फेसबुक पर होने वाले इन सार्वजनिक सूचनाओं को देखकर युवा मानो आज्ञाकारी हो जाते हैं और निर्धारित जगह व समय पर पहुंचकर भक्तिपूर्ण वातावरण में भजन-कीर्तन में भाग लेते हैं। केवल विशेष मौके या फुर्सत में नहीं, बल्कि नियमित रूप से वे भजन-कीर्तन में शामिल हो रहे हैं। काठमाडौं समेत अन्य क्षेत्रों में साप्ताहिक भजन होते रहते हैं। डिस्को से लेकर शराबखानों तक मस्ती करने वाली युवा लहर अब सौम्य, शांत और आध्यात्मिक चेतना से प्रफुल्लित हुई है। संतोष कहते हैं, ‘यह एक जागरण की लहर है। हमारे पूर्वजों ने जो उपहार दिया था, वह युवाओं को आध्यात्मिक शुद्धि की ओर ले जा रहा है।’