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राष्ट्रपति कार्यालय में प्रस्तुत संवैधानिक परिषद् से संबंधित अध्यादेश में क्या है?

समाचार सारांश

संक्षेप में तैयार किया गया और संपादकीय समीक्षा पर आधारित।

  • सरकार ने तीन पदाधिकारियों से निर्णय लेने की व्यवस्था सहित संवैधानिक परिषद् से संबंधित अध्यादेश राष्ट्रपति कार्यालय में प्रस्तुत किया है।
  • अध्यादेश के अनुसार संवैधानिक परिषद के निर्णय में प्रधानमंत्री समेत तीन पदाधिकारियों की राय निर्णायक होगी।
  • राष्ट्रपति ने अल्पमत में निर्णय लेने की व्यवस्था को संविधान के अनुरूप न मानते हुए उक्त विधेयक वापस भेज दिया था।

16 वैशाख, Kathmandu। सरकार ने तीन पदाधिकारियों के निर्णय लेने की व्यवस्था सहित संवैधानिक परिषद (कार्य, कर्तव्य, अधिकार) से संबंधित अध्यादेश राष्ट्रपति कार्यालय में प्रस्तुत किया है।

प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिपरिषद् कार्यालय से जुड़ी जानकारी के अनुसार, अध्यादेश में संख्या पूर्णता और निर्णय के लिए आवश्यक सदस्य संख्या को संशोधित किया गया है।

नेपाल के संविधान की धारा 284 के अनुसार, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में संवैधानिक परिषद गठित होती है, जिसमें प्रधान न्यायाधीश, सभामुख, राष्ट्रिय सभाध्यक्ष, विपक्षी दल के नेता और उपसभामुख सदस्य होते हैं। प्रधान न्यायाधीश के पद रिक्त होने पर कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश की बजाय कानून मंत्री सदस्य के रूप में शामिल होंगे।

उक्त धारा में यह भी कहा गया है कि “संवैधानिक परिषद के अन्य कार्य, कर्तव्य और अधिकार तथा प्रधान न्यायाधीश या संवैधानिक निकाय के प्रमुख अथवा पदाधिकारी की नियुक्ति संबंधी कार्यविधि संघीय कानून के अनुसार होगी”।

पूर्व में छ सदस्यों वाली परिषद् में प्रधानमंत्री समेत चार सदस्य को संख्या पूर्णता माना जाता था। उस समय सर्वसम्मति से निर्णय, न होने पर दूसरी बैठक में सहमति से निर्णय लेने की व्यवस्था थी।

यदि दूसरी बैठक में सहमति न हो तो “परिषद के सभी सदस्यों की बहुमत से निर्णय होगा”। ओली सरकार के दौरान बार-बार संशोधन के लिए अध्यादेश जारी किए गए, लेकिन संसद से पारित न होने पर कानूनी अंतराल रह गया था।

अभी सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से प्रधानमंत्री समेत तीन पदाधिकारियों की राय को निर्णायक मानने का प्रस्ताव दिया है, जबकि पूर्व कानून में पूरी परिषद् (छ सदस्य) की बहुमत यानी चार सदस्य के निर्णय को मान्यता दी गई थी।

संवैधानिक परिषद की वर्तमान संरचना में प्रधानमंत्री बालेन शाह और सभामुख डोलप्रसाद अर्याल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी से जुड़े हैं। राष्ट्रिय सभाध्यक्ष नारायणप्रसाद दाहाल माओवादी पृष्ठभूमि के हैं।

दो दिन पहले ही विपक्षी दल के नेता भीष्मराज आङदाम्बे नेपाली कांग्रेस से हैं और उपसभामुख रूबी कुमारी श्रम संस्कृति पार्टी की निर्वाचित सांसद हैं। इस पार्टी के अध्यक्ष हर्क साङपाङ सरकार के कामकाज पर कड़ी आलोचना करते हैं।

परिषद के कुल छह सदस्यों में दाहाल, आङदाम्बे और रूबी कुमारी विपक्षी सदस्य हैं। परिषद में उपस्थित प्रधान न्यायाधीश के तटस्थ रहने का अनुमान है, जिससे प्रधानमंत्री के प्रस्ताव पर अल्पमत हो सकता है। प्रधान न्यायाधीश के समर्थन के बावजूद दोनों पक्षों के मत बराबर हो सकते हैं। अध्यादेश संबंधित सूत्रों के अनुसार, “इसी मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए संख्या पूर्णता की कार्यविधि संशोधित करने के लिए अध्यादेश जारी किया गया है।”

संघीय संसद ने फागुन 2079 में भी संवैधानिक परिषद से सम्बंधित विधेयक पास कर राष्ट्रपति को प्रमाणिकरण के लिए भेजा था। लेकिन राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने अल्पमत में निर्णय करने की व्यवस्था को संविधान के अनुरूप न मानते हुए पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था। तब से कोई प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।

संवैधानिक परिषद में सर्वसम्मति से निर्णय लेने में फिलहाल कोई कानूनी बाधा नहीं है, लेकिन किसी सदस्य के अलग मत आने पर किस अनुपात को निर्णायक माना जाए, इस पर कानूनी अस्पष्टता है। कानून बना कर बैठक बुलाने में देरी होने के निष्कर्ष के कारण सरकार अध्यादेश के जरिए आगे बढ़ने की योजना बना रही है।