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अन्टार्कटिका में जलवायु परिवर्तन का सिल जीवनचक्र पर प्रभाव

अन्टार्कटिका में जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ जल्दी पिघलने से सिलों के १० दिन की माँ-बच्चा साथ रहने का समय घट गया है, जिससे बच्चों की मृत्यु का खतरा बढ़ गया है। नेपाल में जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालय की ग्लेशियरें तेजी से पिघल रही हैं, जिससे बाढ़, भूस्खलन और सूखा बढ़ा है, और २०२४ में २४९ लोगों की मौत तथा हजारों का विस्थापन हुआ है। जलवायु परिवर्तन ने नेपाल में डेंगू, मलेरिया और जलजनित बीमारियों के प्रसार के साथ-साथ कृषि उत्पादन और पशुपालन पर गंभीर प्रभाव डाला है।

अन्टार्कटिका में रहने वाले सिलों का जीवनचक्र प्रकृति के अत्यंत संवेदनशील और कठोर उदाहरणों में से एक है। वहाँ की कई प्रजातियाँ बर्फ में ही बच्चे जन्म देती हैं। जन्म के बाद माँ और बच्चे के बीच केवल लगभग १० दिन का समय साथ रहने का होता है। इसी छोटे से कालखंड में माँ को बच्चे को दूध पिलाना, उसका वजन बढ़ाना, ठंडे वातावरण में जीवित रहने योग्य बनाना और पानी में तैरना सिखाना जैसे आवश्यक कौशल सिखाने होते हैं। लेकिन, जलवायु परिवर्तन तथा ग्लोबल वार्मिंग के कारण अन्टार्कटिका की बर्फ पहले से तेज़ी से पिघल रही है, जिससे यह महत्वपूर्ण १० दिन का समय भी कम होता जा रहा है।

अभी जलवायु परिवर्तन के कारण अन्टार्कटिका में सिलों के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। अनेक मामलों में मां को समय से पहले छोड़कर जाना पड़ता है और पूरी तरह सक्षम नहीं हुए बच्चे बर्फ पिघलने से पानी में गिरने या डूबने के खतरे में होते हैं। यह समस्या केवल सिलों के जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अन्टार्कटिका में होने वाले छोटे-छोटे बदलाव विश्वव्यापी मौसमी प्रणालियों को प्रभावित करते हैं, जैसे कि वर्षा चक्र में अनियमितता, असमय बारिश, बर्फबारी, सूखा आदि। नेपाल में भी हर साल कई घटनाएँ इसी कारण से होती हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण नेपाल में देखे गए ये समस्याएं विश्व के अत्यंत जलवायु-संवेदनशील देशों में से एक होने की पुष्टि करती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ भुषण तुलाधर के अनुसार, हिमालय क्षेत्र में गर्मी की तीव्र वृद्धि हो रही है, जिससे बर्फ पिघलने, बाढ़, भूस्खलन, सूखा और स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।