
समाचार सारांश
- राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने संवैधानिक परिषद के संबंधित अध्यादेश पुनर्विचार के लिए सरकार को वापस भेजा है।
- राष्ट्रपति ने संवैधानिक परिषद में बहुमत की प्रणाली को टुटने न देने पर जोर देते हुए अध्यादेश की भावना और संविधान की रक्षा करने का आग्रह किया है।
- कानून विशेषज्ञ अध्यादेश वापस करने के संवैधानिक अधिकार पर विभिन्न मत रखते हैं।
20 वैशाख, काठमांडू। राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने सरकार द्वारा सिफारिश किए गए 8 में से 7 अध्यादेश जारी किए हैं, लेकिन संवैधानिक परिषद से सम्बंधित अध्यादेश को पुनर्विचार के लिए सरकार को वापस भेजा है।
राष्ट्रपति ने संवैधानिक परिषद में संविधान द्वारा कल्पित बहुमत प्रणाली टूटने न पाए इस विचार के साथ पिछली स्थिति को इस अध्यादेश में भी कायम रखा है।
6 सदस्यीय संवैधानिक परिषद में 3 सदस्य भी निर्णय ले सकते हैं, ऐसी व्यवस्था वाले अध्यादेश आने के बाद राष्ट्रपति ने पुनर्विचार के लिए सरकार को वापस भेजा है।
वे संविधान की मर्म और बहुमत प्रणाली को जीवित रखने के पक्षधर हैं और उसी अनुसार सरकार को पुनर्विचार के लिए भेजा है।
‘संवैधानिक परिषद की कुल संरचना में बहुमत का प्रतिनिधित्व स्पष्ट नहीं है, बहुमत प्रणाली बनाए रखने के लिए सर्वोच्च अदालत के पूर्ण न्यायपीठ के आदेश का भी ध्यान रखते हुए अध्यादेश के संबंध में पुनर्विचार के लिए इसे वापस भेजा गया है,’ राष्ट्रपति के संदेश में बताया गया है।
राष्ट्रपति ने अध्यादेश के प्रतिस्थापन विधेयक पास न होने या निष्क्रिय होने से कानूनी खामी आने की केंद्र सरकार के मंत्रियों और कुछ कानून विशेषज्ञों के तर्क का जिक्र किया है।
सर्वोच्च अदालत पहले इसके निष्क्रिय होने पर पुराने कानून को लागू करने का आदेश दे चुकी है। इसलिए संवैधानिक पदाधिकारियों की नियुक्ति व निर्णय के लिए संविधान में स्थापित कानून अभी भी लागू हो रहा है, राष्ट्रपति का मानना है।
राष्ट्रपति ने विधेयक वापस भेजने की प्रक्रिया क्यों अपनाई, इसका भी उल्लेख किया है।

‘प्रमाणीकरण के लिए प्रस्तुत विधेयक संविधान की धारा 284 की भावना और विश्वव्यापी लोकतांत्रिक अभ्यास के अनुकूल नहीं है, संवैधानिक परिषद की सर्वसम्मत सिफारिश और निर्णय आवश्यक है, सर्वसम्मति नहीं होने पर बहुमत के आधार पर निर्णय होना चाहिए,’ राष्ट्रपति ने संसद में वापस आए विधेयक को याद करते हुए कहा।
सुशीला कार्की नेतृत्व वाली सरकार ने भी इसी मुद्दे को अध्यादेश में रखा था लेकिन उस अनुसार अध्यादेश जारी नहीं किया गया। अब पुनः उसी प्रकार का अध्यादेश आया है, जिसे बहुमत व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व न करने वाला माना जा रहा है।
राष्ट्रपति ने संविधान की मर्म और बहुमत प्रणाली की रक्षा के लिए अध्यादेश वापस किया है, लेकिन संविधान में संघीय संसद से पारित विधेयक पुनर्विचार का स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद अध्यादेश के मामले में ऐसा कोई व्यवस्था नहीं है।
इस मामले में कानूनविदों के अलग-अलग विचार हैं।
सर्वोच्च के पूर्व न्यायाधीश पवनकुमार ओझा अपनी पूर्व निर्णय के आधार पर राष्ट्रपति के अध्यादेश वापस करने की अनुमति नहीं देने की राय रखते हैं।
संसद से पारित विधेयक को राष्ट्रपति वापस भेज सकते हैं, लेकिन अध्यादेश में ऐसा संवैधानिक प्रावधान नहीं है, ओझा ने कहा।
‘गत भदौ 24 के बाद सरकार द्वारा भेजे गए कोई भी अध्यादेश राष्ट्रपति द्वारा जारी करने से रोके गए हैं, लेकिन इससे संवैधानिक सवाल उठते हैं,’ उन्होंने कहा।

राष्ट्रपति की संवैधानिक सीमा और भूमिका पर और बहस की आवश्यकता बताई है पूर्व महान्यायविवक्ता समेत रहे ओझा ने। ‘संविधान के पालन और संरक्षण के लिए राष्ट्रपति को अपने कर्तव्य को समझना होगा,’ उन्होंने कहा।
दो दिन पहले वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. चंद्रकांत ज्ञवाली ने कहा कि राष्ट्रपति के पास अध्यादेश पर वीटो करने का अधिकार नहीं है।
‘सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश को रोकना देश की कार्यकारी ক্ষমता का हस्तांतरण जैसा होगा, यदि राष्ट्रपति ऐसा अधिकार प्रयोग करते हैं तो यह संविधान का उल्लंघन है,’ ज्ञवाली ने कहा था।
नेपाल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और कानून शिक्षक डॉ. विजय मिश्र ने कहा कि संविधान में स्पष्ट नहीं होने के बावजूद राष्ट्रपति पिछली प्रथा के अनुसार अध्यादेश वापस भेज सकते हैं।
‘अध्यादेश को स्वीकृत करने पर राष्ट्रपति को चुनौती मिल रही है। संविधान की मर्म और भावना भी अध्यादेश में समाहित नहीं है,’ मिश्र ने कहा, ‘हर प्रधानमंत्री ने अपनी इच्छा अनुसार संवैधानिक परिषद के नियम बदलने की कोशिश की है, इसलिए राष्ट्रपति ने इसे वापस भेजा है।’
संविधान में क्या कहा गया है?
संविधान के धारा 113 में विधेयक प्रमाणीकरण की व्यवस्था है। उपधारा 3 के अनुसार दोनों सदनों से पारित विधेयक को राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिए 15 दिन के भीतर संदेश सहित वापस भेज सकते हैं। लेकिन अर्थ विधेयकों पर यह प्राविधान लागू नहीं होता।
धारा 113 में विधेयक प्रमाणीकरण संबंधी प्रावधान:
113. विधेयक प्रमाणीकरणः (1) धारा 111 के अनुसार प्रमाणीकरण के लिए राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत विधेयक उत्पत्ति सदन के सभापति द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए। अर्थ विधेयकों के लिए यह प्रमाण सभापति देते हैं।
(2) राष्ट्रपति समक्ष प्रस्तुत विधेयक का प्रमाणीकरण कर 15 दिनों के अंतर्गत सूचना दोनों सदनों को देनी होती है।
(3) यदि प्रमाणीकरण संभव नहीं हो, तो राष्ट्रपति 15 दिनों के भीतर संदेश सहित विधेयक वापस भेज सकते हैं।
(4) वापस भेजे गए विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पुनर्विचार के बाद प्रस्तुत किया जाए, तो राष्ट्रपति को 15 दिनों के भीतर प्रमाणीकरण करना होगा।
(5) प्रमाणीकरण के बाद विधेयक कानून बन जाता है।
संविधान ने विधेयक को वापस भेजने की व्यवस्था की है, लेकिन अध्यादेश के संदर्भ में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
धारा 114 में केवल अध्यादेश जारी करने का प्रावधान है, पुनर्विचार के लिए अध्यादेश वापस करने का कोई प्रावधान नहीं है।
धारा 114 में अध्यादेश संबंधी प्रावधान:
114. अध्यादेशः (1) संघीय संसद के दोनों सदनों के अधिवेशन न होने पर मंत्रिपरिषद की सिफारिश पर राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकते हैं।
(2) अध्यादेश कानून के समान होता है, पर
(क) यदि संसद इसे स्वीकार नहीं करता तो स्वतः निष्क्रिय हो जाता है,
(ख) राष्ट्रपति इसे किसी भी समय निरस्त कर सकते हैं,
(ग) यदि इसे निरस्त या निष्क्रिय नहीं किया गया तो 60 दिन में स्वतः निष्क्रिय हो जाता है।
स्पष्टीकरणः ‘संघीय संसद के दोनों सदनों की बैठक के दिन’ का अर्थ दोनों सदनों के अधिवेशन या बैठक के शुरू होने वाले दिन से है।
राष्ट्रपति संविधान के संरक्षक
धारा 61(4) में राष्ट्रपति का प्रधान दायित्व संविधान का पालन और संरक्षण करना बताया गया है।
इस की धारा का प्रयोग करके राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने जेएनजी आंदोलन के बाद संक्रमणकालीन स्थिति को प्रबंधित किया था और पूर्व प्रधानन्यायाधीश सुषिला कार्की को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।
उस समय प्रधानन्यायाधीश को प्रधानमंत्री बनाने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं था, लेकिन उस समय राष्ट्रपति ने संविधान के संरक्षक के तौर पर यह धारा लागू की थी।
वर्तमान में संवैधानिक परिषद के अध्यादेश वापस करने की स्थिति वैसी संवैधानिक संकट नहीं है, पर राष्ट्रपति ने विधेयक वापस करते समय संविधान की मर्म की बात कही है।

संविधान ने संवैधानिक परिषद को निष्पक्ष बनाने के लिए कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के प्रतिनिधि मिलाकर 6 सदस्यीय परिषद बनाई है।
लोकतंत्र में बहुमत को निर्णय का आधार माना जाता है, इसलिए 6 सदस्यों में बहुमत के लिए कम से कम 4 सदस्य आवश्यक होते हैं।
लेकिन पूर्व प्रस्तुत विधेयकों में 3 सदस्य भी निर्णय लाने की व्यवस्था की गई थी।
सुषिला कार्की सरकार में भी यहीं प्रावधान रखा गया था, तब राष्ट्रपति ने अध्यादेश को रोका, जारी नहीं किया और वापस भी नहीं भेजा।
इस बार पुनर्विचार के लिए वापस भेजा है और पुरानी स्थिति याद दिलाई है। इस प्रक्रिया में संवैधानिक परिषद के निर्णय में कोई कानूनी बाधा नहीं है, इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को हवाला देते हुए सरकार को संदेश दिया गया है।
अब आगे क्या होगा?
राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश वापस किए जाने के बाद सरकार राष्ट्रपति के संदेश के अनुसार अध्यादेश संशोधित कर पुनः भेज सकती है या जारी न करने का विकल्प चुन सकती है। लेकिन यदि सरकार संदेश की अवहेलना कर वर्तमान अध्यादेश ही सिफारिश करती है तो क्या होगा?
नेपाल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं कानून शिक्षक डॉ. विजय मिश्र कहते हैं: ‘यदि सरकार पुनः अध्यादेश भेजती है तो राष्ट्रपति उसे अस्वीकार नहीं कर सकते, उन्हें जारी करना होगा।’





