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केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की हार, 49 वर्षों बाद भारत में वामपंथी सरकार का अभाव

केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूडीएफ ने 140 में से 90 से अधिक सीटें जीतकर 10 वर्षों बाद पुनः सत्ता संभालने जा रही है। इस हार के बाद 49 वर्षों के बाद भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी नेतृत्व वाली सरकार नहीं रहेगी। 1957 में केरल में विश्व की पहली निर्वाचित लोकतांत्रिक वामपंथी सरकार बनी थी, जो अब समाप्त हो रही है।

21 वैशाख, काठमांडू। केरल विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम गठबंधन एलडीएफ को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूडीएफ ने 140 में से 90 से अधिक सीटों पर जीत हासिल कर 10 वर्षों बाद पुनः सत्ता संभालने का रास्ता बनाया है। केरल में इस हार के साथ ही 49 वर्षों बाद पहली बार भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार की अगुवाई नहीं होगी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने 1947 में भारत की स्वतंत्रता को ‘सच्ची स्वतंत्रता’ नहीं माना और इसे अधूरी तथा समझौते पर आधारित ‘झूठी स्वतंत्रता’ कहा था। लगभग पांच वर्षों बाद सीपीआई ने इस स्वतंत्रता को स्वीकार करना शुरू किया।

भारत में कम्युनिस्ट राजनीति की शुरुआत कैसे हुई? मार्च 1948 में पार्टी में बड़ा बदलाव आया। पी.सी. जोशी के स्थान पर बी.टी. रणदीवे को नया महासचिव नियुक्त किया गया और ‘रणदीवे लाइन’ नामक कट्टर नीति लागू की गई। इसी सोच के तहत जनवरी 1950 में संविधान लागू होने से पहले ही सीपीआई ने इसका विरोध किया और कांग्रेस के नेताओं पर नागरिकों को गुलामी में रखने वाला संविधान लाने का आरोप लगाया। वामपंथी पार्टी ने नेहरू सरकार को हिंसात्मक क्रांति से हटाने का आह्वान किया, लेकिन 1948 और 1949 में यह नीति असफल रही। इसके बाद मई-जून 1950 में बी.टी. रणदीवे को पद से हटाया गया। 9 मार्च 1949 को पार्टी ने अनावश्यक देशव्यापी हड़ताल और विद्रोह के आह्वान को गलत माना और 6 वर्षों बाद सीपीआई ने कट्टर विचारधारा से दूरी बनाकर स्वतंत्रता की सच्चाई स्वीकार करने के लिए बाध्य हुई।