
समाचार सारांश
OK AI द्वारा सिर्जित। संपादकीय समीक्षा की गई।
- स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिवालय ने जले हुए वाहनों के नाम पर ईंधन के दुरुपयोग की जानकारी जारी की थी, लेकिन जांच समिति ने इस सूचना को गलत पाया है।
- मंत्रालय ने पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति प्रतिबद्धता जताई है और सोशल मीडिया पर आरोपित उप सचिव मित्रप्रसाद घिमिरे निर्दोष पाए गए हैं।
- स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता के एक महीने के अंदर विवादित प्रशासनिक फैसलों और नियुक्ति प्रक्रिया में कमियाँ सामने आई हैं।
२२ वैशाख, काठमांडू। स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता के सचिवालय के सदस्य निरज कटुवाल ने वैशाख १५ की सुबह करीब साढ़े दस बजे व्हाट्सएप समूह में ‘जले हुए वाहनों के नाम पर ईंधन के दुरुपयोग’ का एक सूचना प्रवाहित किया। इस सूचना में स्वास्थ्य मंत्रालय के कर्मचारी शामिल होने का आरोप लगाया गया था।
इसी आधार पर स्वास्थ्य तथा जनसंख्या मंत्रालय ने जांच समिति गठित की थी। एक सप्ताह की जांच के बाद समिति ने मंत्री के सचिवालय से आई सूचना को गलत पाया है।
मंत्री मेहता के सचिवालय के व्हाट्सएप समूह में उस समाचार में कहा गया था, ‘जले हुए वाहनों के नाम ईंधन दुरुपयोग : जांच कर कार्रवाई करने के लिए मंत्री मेहता का निर्देश।’
सचिवालय से आई सूचना विभिन्न मीडिया और सामाजिक मीडिया में तेज़ी से फैल गई और इससे मंत्रालय के अंदर सरकारी कर्मचारियों द्वारा बड़ी अनियमितता का संदेश गया।
सूचना के बाहर आने के बाद मंत्रालय की प्रशासन महाशाखा में कार्यरत उप सचिव मित्रप्रसाद घिमिरे इस आरोप का केंद्र बन गए। जले हुए वाहनों के नाम पर पेट्रोल के कूपन का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया में उन पर तीव्र हमले हुए।
लोकसेवा आयोग के तैयारी के लिए पाठ्य सामग्री लेखक और प्रशिक्षक के रूप में परिचित घिमिरे पर अचानक भ्रष्टाचार का आरोप लगा और सोशल मीडिया में उनकी आलोचना हुई। मंत्री के सचिवालय से आए बिना पुष्ट जानकारी के कारण वे विवाद के केंद्र में थे।

यह आरोप भदौ २३ और २४ को हुए जेएनडीजी आंदोलन से संबंधित था। आंदोलन के दौरान भदौ २४ की रात को काठमांडू के रामशाहपथ स्थित स्वास्थ्य तथा जनसंख्या मंत्रालय में अराजक समूह ने आगजनी की थी। इस दौरान मंत्रालय के १८ और इसके अधीन अन्य निकायों के ६, कुल मिलाकर २४ वाहन जल गए थे।
पूरी तरह नष्ट हुए वाहनों की सूची दिखाकर कर्मचारियों द्वारा ईंधन सुविधा लेने की चर्चा सचिवालय में थी।
देश भर में स्वास्थ्य कार्यक्रमों के समन्वय और निगरानी करने वाले मुख्य निकाय के भवन में आगजनी से भारी क्षति हुई।
विश्व प्रसिद्ध वास्तुकला से सुसज्जित मंत्रालय का भवन खंडहर जैसा हो गया था। परिसर में कई सरकारी वाहन जलकर नष्ट हो गए। तब से मंत्रालय का कार्य नेपाल स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद् के नए भवन से चल रहा है।
पिछले मंसिर में सिंहदरबार के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में नेपाली सेना के नरसिंह दल गण की खाली जमीन और भवन मिला। तब से सिंहदरबार में स्वास्थ्य मंत्रालय का कार्यालय चला रहा है। वर्तमान में टिन की ढक्कन वाली झोपड़ी से मंत्रालय चल रहा है और कुछ कार्य अभी भी परिषद से ही हो रहे हैं।
जांच ने आरोप खारिज किया
मंत्रालय के सह-प्रवक्ता डॉ. समीरकुमार अधिकारी के अनुसार, सत्यता पता लगाने के लिए १५ वैशाख को सहसचिव स्तर की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई थी।
समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि जले हुए वाहनों के नाम पर ईंधन निकासी का दावा गलत है।
डॉ. अधिकारी के अनुसार पुलिस रिपोर्ट, ईंधन निकासी अभिलेख (अर्धकट्टी), भुगतान विवरण आदि दस्तावेजों की समीक्षा के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला गया।
‘जले हुए वाहनों के नाम पर ईंधन का दुरुपयोग नहीं हुआ है,’ डॉ. अधिकारी ने कहा।
हालांकि मंत्री के सचिवालय से आए आरोप सार्वजनिक मामले पर मंत्रालय मौन है और मीडिया की तरफ दोषारोपण करने का प्रयास हो रहा है।

डॉ. अधिकारी के बयान में मीडिया से अपुष्ट और भ्रम फैलाने वाली सामग्री न प्रकाशित करने और न प्रसारित करने का अनुरोध किया गया है। ऐसे विषय सोशल मीडिया और मीडिया में न फैलाने की गुहार सभी संबंधित पक्षों से की गई है।
मंत्रालय ने पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन के प्रति प्रतिबद्धता जताई है।
लगातार एक सप्ताह तक सोशल मीडिया पर आरोप और आलोचना झेलने वाले घिमिरे ने सोशल मीडिया पर विस्तृत प्रतिक्रिया दी है।
घिमिरे ने कहा कि आरोपों की वजह से वे और उनका परिवार गहरे दर्द से गुजरे हैं। ‘कभी-कभी जीवन ऐसा मोड़ ले आता है जहाँ सत्य होने पर भी खुद को साबित करना पड़ता है,’ उन्होंने लिखा, ‘निराशा, दर्द और कई सवालों के बीच मैंने सत्य के प्रति विश्वास कभी खोया नहीं।’
जांच के बाद निर्दोष साबित होने पर घिमिरे ने अपने मन की हल्कापन व्यक्त करते हुए और मजबूती के साथ ईमानदारी, पारदर्शिता और सेवा में आगे बढ़ने का संकल्प जताया है।
मंत्री मेहता के कार्यों पर सवाल
मंत्री बनने के एक महीने के भीतर मेहता कई बार विवादों में घिरी हैं। स्वास्थ्य बीमा बोर्ड की सदस्य जुनू श्रेष्ठ को पुनः नियुक्त किया। विवाद बढ़ने पर नियुक्ति पत्र भी खो गया। इस मामले में श्रम, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा मंत्री दीपक कुमार साह १४ दिनों में पदमुक्त हुए।
तत्कालीन श्रम मंत्री साह ने अपनी पद शक्ति का दुरुपयोग करते हुए अपनी पत्नी जुनू श्रेष्ठ को नियम विरुद्ध स्वास्थ्य बीमा बोर्ड में नियुक्त किया था।राष्ट्र स्वास्थ्य सेवा आयोग ने साह पर दुरुपयोग का आरोप लगाकर मंत्री पद से हटा दिया और मंत्रालय के अधीन निकाय के गंभीर विषय पर मेहता को चेतावनी भी दी।
मंत्रालय का नेतृत्व संभालने के बाद मंत्री मेहता ने स्वास्थ्य प्रणाली सुधार के दीर्घकालीन कार्यों के बजाय छोटे प्रशासनिक फैसलों में अधिक समय लगाया है, ऐसा मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया है।
मंत्री मेहता के पहले महीने के कामकाज में जल्दी निर्णय लेने और कुछ ही समय बाद उन निर्णयों को बदलने की प्रवृत्ति देखी गई है। स्वास्थ्य कर्मचारियों को दो दिन की छुट्टी देने से लेकर काज परिवर्तन जैसे फैसलों में पुनर्विचार करने पर उन पर आरोप लगे हैं।

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में सप्ताह में दो दिन छुट्टी का निर्णय लिया था, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने रविवार को सेवाएं संचालित करने का निर्णय लिया। मंत्री मेहता इस निर्णय पर अडिग नहीं रह सकीं। चिकित्सक संघ और अन्य स्वास्थ्यकर्मी संगठनों के दबाव में उन्होंने यह सेवा रविवार को बंद कर दी। इससे वीर, शिक्षण सहित केंद्रीय अस्पतालों की सेवाएं बहुत अव्यवस्थित हुईं।
दवाओं के प्रबंधन से जुड़ी फैसलों पर भी सवाल उठे हैं। औषधि व्यवस्था विभाग के महानिदेशक नारायण ढकाल पर ५० दवाओं की कीमतों को अस्वाभाविक रूप से बढ़ाने का आरोप था और उन्हें मंत्रालय तान लिया गया। लेकिन जांच समिति बनाते वक्त प्रक्रियागत कमियों के कारण समिति प्रभावी काम नहीं कर सकी।
परामर्श और विशेषज्ञता के अभाव में समिति बनाई गई, कुछ विशेषज्ञ सदस्य बनने से इनकार करने पर दूसरी समिति बनाई गई, जो अब तक प्रभावी नहीं है।
ढकाल के महानिदेशक रहते ११वीं श्रेणी के कर्मचारी भरत भट्टराई राष्ट्रीय औषधि प्रयोगशाला के निदेशक थे। मंत्री मेहता ने विभाग और प्रयोगशाला की संरचना न समझकर प्रयोगशाला को विभाग के समानांतर एक निकाय मानते हुए १०वीं श्रेणी की कर्मचारी शिवानी खड्गी को न interim निदेशक नियुक्त किया।
इस फैसले से प्रशासनिक मर्यादा और पदानुक्रम पर गंभीर सवाल उठे। ११वीं श्रेणी के वरिष्ठ कर्मचारी को १०वीं श्रेणी के कनिष्ठ कर्मचारी के निर्देश मानने की स्थिति बन गई, जिससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ा। विवाद बढ़ने पर मंत्री ने वास्तविकता जानकर भट्टराई को जल्दी से मंत्रालय बुलाया था।





