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संवाद के द्वार खोलने का सुनहरा अवसर

नेपाल सरकार ने वैशाख २० गते भारत और चीन को राजनयिक नोट भेजकर लिपुलेक क्षेत्र में सीमा विवाद उठाया है। भारत ने लिपुलेकपास के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा को सन् १९५४ से चल रहा एक पुराना मार्ग होने का दावा किया है। नेपाल ने २०७७ में लिम्पियाधुरा सहित नया नक्शा जारी कर अपनी भूमि की दावेदारी स्पष्ट की है और वार्ता के लिए तैयार होने का संकल्प जताया है।

२१ वैशाख, काठमांडू। नेपाली भूमि लिपुलेक मार्ग से भारत द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा खोलने के बाद नेपाल सरकार ने बुधवार, वैशाख २० को दोनों पड़ोसी देशों को राजनयिक नोट भेजा। नोट भेजे जाने के तुरंत बाद भारत की प्रतिक्रिया आई। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जैसवाल ने कहा कि लिपुलेकपास से होकर जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा सन् १९५४ से लगातार चलती आ रही एक पुरानी यात्रा मार्ग है और यह कोई नया विषय नहीं है।

भारत और चीन के बीच १९५४ में हुए ‘सिनो-इंडियन एग्रीमेंट’ में तीर्थयात्रियों के आवागमन से संबंधित प्रावधान हैं। इस समझौते में तीर्थयात्री और व्यापारी लिपुलेकपास समेत अन्य मार्गों का उपयोग कर सकते हैं। भारत और चीन ने यह समझौता उस समय किया था जब नेपाल और चीन के द्विपक्षीय संबंध स्थापित नहीं हुए थे; दो देशों के औपचारिक संबंध सन् १९५५ अगस्त में शुरू हुए।

लेकिन नेपाल और भारत के सन् १८१६ में हुए सुगौली संधि के अनुसार न केवल लिपुलेकपास बल्कि लिम्पियाधुरासम्म भूमि नेपाल की ही है। सुगौली संधि में काली (महाकाली) नदी के पूर्व का पूरा क्षेत्र नेपाल के भूभाग के रूप में निर्धारित किया गया है। राजनयिक मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि नेपाली भूमि के मसले पर विस्तार से चर्चा करना आवश्यक है। पूर्व राजदूत नीलाम्बर आचार्य ने कहा, “नेपाली भूमि के उपयोग को लेकर किसी अन्य देश द्वारा पहले किये गए समझौतों का हवाला देना जरूरी नहीं है, महत्वपूर्ण तथ्य और प्रमाण हैं—यदि लिपुलेक नेपाल का है तो वह नेपाल का ही रहेगा।”

भारत के विदेश मंत्रालय की यह दलील कि उस समय तीर्थयात्री आवागमन करते थे, पर इससे नेपाली भूमि के अन्य देशों की न होने की पुष्टि होती है। इसके अलावा, बिना प्रवेश अनुमति के भारत से नेपाली क्षेत्र में आसानी से आने जाने की संभावना बनती है। कालापानी सहित अन्य भूभाग जहाँ भारतीय सुरक्षा बल तैनात हैं, वह नेपाल की भूमि होने का दावा नेपाल करता है। पूर्व राजदूत आचार्य ने कहा कि केवल उपयोग के आधार पर नेपाली भूमि को किसी अन्य देश की भूमि बनने नहीं दिया जा सकता।

सीमा विवाद में हर पक्ष का अपनी दलील रखना कोई नई बात नहीं है। नेपाल और भारत दोनों ने स्वीकार किया है कि दार्चुला के कालापानी एवं नवलपरासी के सुस्ता क्षेत्र में सीमांकन विवाद है। विवाद होने के कारण इसका समाधान खोजना आवश्यक है।

नेपाल ने रविवार को दोनों देशों को भेजे गए राजनयिक नोट और भारत के विदेश मंत्रालय के जवाब के बीच समाधान की दिशा में है या नहीं, यह समझने से पहले नेपाल द्वारा जारी चुच्चे नक्शे की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। नेपाल ने लिम्पियाधुरा सहित क्षेत्र को समाहित करते हुए सन् २०७७ में जो नक्शा जारी किया था, उसके आरंभकर्ता भारत ही रहा है।

१६ कार्तिक २०७६ को सर्भे ऑफ़ इंडिया ने सुगौली संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए भारत का आठवां राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें लिपुलेक, कालापानी, लिम्पियाधुरा तथा महाकाली नदी के पूर्वोत्तर नेपाली भूभाग को भारत का हिस्सा दिखाया गया था। नेपाल सरकार के परराष्ट्र मंत्रालय ने २०७६ कार्तिक २० को एकपक्षीय नक्शा अस्वीकार करते हुए विज्ञप्ति जारी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर लिम्पियाधुरा की उत्पत्ति वाली नदी को सुगौली संधि की काली (महाकाली) नदी माना।

सर्वदलीय बैठक के बाद २५ कार्तिक को संसद के राज्य व्यवस्था तथा सुशासन समिति ने लिम्पियाधुरा सहित नक्शा जारी करने का निर्देश दिया। प्रधानमंत्री ओली द्विपक्षीय सहमति प्रयास में थे, लेकिन नक्शा जारी होना जरूरी हो गया। कार्तिक २०७६ के भीतर नेपाल ने तीन बार राजनयिक नोट भेजे। विशेष दूत भेजकर संवाद प्रयास हुए, पर भारतीय पक्ष के सहयोग न करने के कारण सफलता नहीं मिली।

इसी बीच भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नेपाली भूमि पर अवैध कब्जा कर बनाई गई कैलाश मानसरोवर जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया। इसके विरोध में काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के बाहर घेराव हुआ। नेपाल ने बार-बार वार्ता व संवाद के प्रयास किए, पर भारत ने कोविड-१९ महामारी का हवाला देते हुए उपेक्षा की।

विरोधों के बावजूद संसद ने दबाव में नक्शा जारी कर दिया। भारतीय सेना प्रमुख द्वारा नेपाल में हो रहे विरोधों को ‘चीनी उकसावे’ कहना स्थिति को जटिल बना गया। २०७७ जेठ २ पर सत्तारूढ़ नेकपा की सचिवालय बैठक ने नक्शा जारी करने का निर्णय लिया। इसके बाद राष्ट्रपति ने संसद में सरकार की नीति तथा कार्यक्रम में नक्शे का विषय शामिल किया। सरकार ने सुगौली संधि समेत ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर नक्शा जारी किया। संसद ने भी सरकार के निशान छाप के लिए संविधान संशोधन किया।

लिपुलेक को व्यापार और तीर्थयात्रियों के आवागमन का केंद्र बनाने का विषय २०१५ में भारत और चीन के बीच सहमति में था। कोविड-१९ महामारी से बंद हुआ नाका पुनः खोलने पर दोनों देशों ने २०२४ में सहमति जताई। पिछले अगस्त में भी दोनों देशों ने लिपुलेक मार्ग की तीर्थयात्राओं के पुनरारंभ की घोषणा की।

हालांकि नेपाल ने संवाद से समस्या समाधान की कोशिश की, दोनों देशों ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी। लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय के जवाब में सकारात्मक संकेत भी हैं। प्रवक्ता जैसवाल के प्रेस नोट में एकतरफा दावा नहीं, बल्कि भारत बातचीत के लिए तैयार होने की बात कही गई है। उन्होंने सीमा विवाद समाधान और द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के लिए भारत के नेपाल के साथ संवाद और राजनयिक माध्यमों से रूचि जताई।

अंदर से भारत संवाद की ओर बढ़ रहा प्रतीत होता है, जो एक सकारात्मक संकेत है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल, भारत और चीन को इस विषय को राजनयिक संवाद के जरिए सुलझाने का अवसर बनाना चाहिए। पूर्व राजदूत नीलाम्बर आचार्य ने नेपाल सरकार की ठोस स्थिति की सराहना करते हुए इसे संवाद का अवसर बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “हम पड़ोसियों के साथ मित्रवत संबंध रखते हैं, नेपाल के पत्राचार को संवाद से समस्या समाधान का अवसर बनाया जा सकता है।”

राजनयिक जयराज आचार्य के अनुसार, चुच्चे नक्शा जारी होने के बाद भारत की ओर से जवाब देना संवाद के संदर्भ में उपयोगी हो सकता है। उन्होंने कहा, “यह विषय उठ चुका है, इसे सकारात्मक दृष्टि से लेकर संवाद के माध्यम से समाधान का मौका बनाना चाहिए।”