
समाचार सारांश
समीक्षा पश्चात तैयार किया गया।
- पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार २०६ सीटें जीत कर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है और ममता बनर्जी अपनी भवानीपुर सीट से हार गई हैं।
- ममता बनर्जी ने भाजपा पर मत चोरी का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बल की भूमिका को अनैतिक बताया है।
- एसआईआर प्रक्रिया ने टीएमसी को भारी नुकसान पहुँचाया और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण ने भाजपा की जीत में मुख्य भूमिका निभाई है, ऐसा विश्लेषकों का मानना है।
२२ वैशाख, काठमांडू। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहली बार राज्य की सत्ता में आ रही है और उसने दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल किया है। भाजपा ने २०६ सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को मात्र ८० सीटें हासिल करने तक सीमित कर दिया है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट से भाजपा के नेता शुभेंदु अधिकारी से १५ हजार से अधिक मतों से हार गई हैं। मतगणना के दौरान उन्होंने भाजपा पर वोट चोरी का आरोप लगाया था।
उन्होंने मीडिया से कहा, ‘भाजपा ने सौ से अधिक सीटें लूटी हैं। भाजपा की जीत अनैतिक है। चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ मिलकर जो किया, वह पूरी तरह से अनैतिक है।’
उन्होंने जबरदस्ती एसआईआर प्रक्रिया का आरोप लगाते हुए कहा, ‘उन्होंने अत्याचार किया। काउंटिंग एजेंटों को गिरफ्तार किया। हम पुनः वापसी करेंगे।’
पंद्रह साल तक लगातार सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस की इस चुनावी हार के पीछे क्या कारण हो सकते हैं, इस पर भारी चर्चा हो रही है।
अब तक उपलब्ध परिणामों और रुझानों के आधार पर इस हार के पीछे पांच मुख्य कारण माने जा रहे हैं:
१. महिला सुरक्षा का मुद्दा
पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक ममता बनर्जी की पार्टी का समर्थन करता आया था।
स्कूली छात्राओं को साइकल वितरण योजना समेत ‘लक्ष्मी भंडार’, ‘कन्याश्री’ और ‘सबुज साथी’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच तृणमूल सरकार को लोकप्रिय बनाया था।
लेकिन इस बार वह समर्थन कमजोर हुआ नजर आ रहा है। इसका मुख्य कारण पार्टी की महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों में कथित असफलता हो सकता है।
दो साल पहले हुए आर.जी. कर आंदोलन ने चुनाव पर प्रभाव डाला। इसका उदाहरण पानीहाटी है, जो पारंपरिक रूप से तृणमूल का गढ़ माना जाता था। वहां आर.जी. कर मामले की पीड़ित महिला की मां भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ीं और २८,८३६ मतों के अंतर से विजयी रहीं।
(आर.जी. कर भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के कोलकाता में स्थित एक प्रसिद्ध सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम है। अगस्त २०२४ में यहाँ रात में ड्यूटी पर तैनात एक प्रशिक्षु महिला डॉक्टर का अत्यंत क्रूरता से बलात्कार और हत्या कर दी गई थी। उनका नाम अभया रखा गया था। इस घटना के बाद कोलकाता और पूरे भारत में महिला सुरक्षा की मांग को लेकर डॉक्टरों सहित आम जनता ने लंबा आंदोलन किया था। आईपीएएन में ममता सरकार और पुलिस प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगा था।)
पश्चिम बंगाल की कुछ महिलाओं ने सुरक्षा मुद्दे उठाए थे। चुनाव प्रचार के दौरान एक महिला ने कहा था, ‘क्या अब हम सुरक्षित रह भी सकते हैं? ऐसा डर है। महिलाओं का अब कोई सम्मान बचने वाला नहीं है। वे हमें तोड़ देंगे। क्या राज्य की हालत इतनी खराब हो गई है?’
कोलकाता में एक महिला ने कहा, ‘आर.जी. कर घटना के बाद मैं हमेशा सुरक्षा उपाय साथ लेकर चलती हूँ।’
एक अन्य युवा महिला ने कहा, ‘कुछ जगहें असुरक्षित लगती हैं और रात ९-१० बजे के बाद और भी खतरनाक महसूस होता है।’
२. एसआईआर प्रक्रिया

मतदाता सूची में व्यापक संशोधन अर्थात् एसआईआर प्रक्रिया में ९० लाख से अधिक नाम हटाए गए और सबसे अधिक नुकसान टीएमसी को हुआ है।
सच यह है कि कई वैध मतदाताओं के नाम भी हटाए गए, लेकिन कई नकली या मृत मतदाताओं के नाम भी हटाए गए।
भाजपा हमेशा दावा करती रही है कि ऐसी अनियमितताओं का फायदा टीएमसी वर्षों से उठा रही थी और अब वह कम होगा।
कोलकाता के प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान शिक्षक ज़ैद मैनहूड ने कहा, ‘टीएमसी ने भ्रष्टाचार और सिंडिकेट संस्कृति को हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बना दिया था। लेकिन भाजपा ने दिखाया कि ३० प्रतिशत आबादी को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखकर भी जीत संभव है।’
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी एसआईआर को चुनावी बदलाव का मुख्य कारण माना है। उन्होंने कहा, ‘भले ही भाजपा की सीटें अधिक दिखीं, मतभेद केवल ३ प्रतिशत का है। अगर ४.३ प्रतिशत लोग मतदान करते, जिनमें कई मुस्लिम थे और ज्यादातर गैरमुस्लिम टीएमसी समर्थक थे, तो क्या यही नतीजा होता? निश्चित ही नहीं।’
३. प्रशासनिक कमजोरी

भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन, दैनिक जीवन में कमीशन, सिंडिकेट संस्कृति के बढ़ाव और टीएमसी के १५ वर्ष शासन के दौरान प्रशासनिक कमजोरी पश्चिम बंगाल की राजनीति के इतिहास में महत्वपूर्ण आरोप के रूप में ली गई है।
२०१६ और २०२१ में पार्टी ने बंगाली पहचान, महिला कल्याणकारी योजना और धर्मनिरपेक्षता जैसे विषयों को लेकर आलोचना झेली थी।
इस बार ममता बनर्जी ने एसआईआर को लोगों के कष्ट का राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता के आरोपों के कारण यह सफल नहीं रहा।
४. हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी की लंबी जीत का बड़ा कारण मुस्लिम समुदाय का लगभग एकमत समर्थन था। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की जनसंख्या ३० प्रतिशत है और ८५ से ९० प्रतिशत वोट टीएमसी को मिलते थे।
लेकिन इस बार हिंदू वोटों के ‘उल्टे ध्रुवीकरण’ का साफ़ संकेत मिला, जिसका फायदा भाजपा को हुआ। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में भी भाजपा की बढ़त देखी गई।
मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों में ममता बनर्जी ने कई हिंदू मंदिरों का निर्माण और मरम्मत सरकारी खर्च से कराया था। यह हिंदुत्व का नरम स्वरूप दिखाने का प्रयास था।
लेकिन यह रणनीति प्रभावी नहीं हुई और कई हिंदू मतदाता भाजपा की आक्रामक राजनीतिक सोच की ओर आकर्षित हुए।
कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक सुकांत सरकार कहते हैं, ‘इस बार हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की स्पष्टता बहुत अधिक देखी गई।’
शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराने के बाद कहा, ‘यह हिंदुत्व की जीत है। यह बंगाल की जीत है। यह नरेंद्र मोदी जी की जीत है।’
उन्होंने बताया, ‘सीपीएम समर्थकों ने भी मुझे वोट दिया। भवानीपुर में १३ हजार सीपीएम वोट थे, जिनमें से कम से कम १० हजार वोट मेरे पक्ष में आए। सभी बंगाली हिंदू खुले तौर पर मतदान किए।’
५. केन्द्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती

समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मतगणना में केंद्रीय सुरक्षा बलों के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव के समय परंपरागत रूप से सत्ता पार्टी को कुछ लाभ प्राप्त होता रहा है।
लेकिन इस बार तृणमूल कांग्रेस को वह लाभ लगभग नहीं मिला। चुनाव आयोग ने राज्य प्रशासन पर कड़ी निगरानी रखी और जिलों के अधिकारियों व पुलिस निरीक्षकों का बड़ा पैमाने पर परिवर्तन किया।
मतदान से पहले ही राज्य में २ लाख ४० हजार से अधिक केंद्रीय सुरक्षा कर्मी तैनात किए गए, जो अभूतपूर्व था।
कई विश्लेषक कहते हैं कि इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था ने चुनाव को शांतिपूर्ण बनाया और मतदाता भयमुक्त होकर बहादुरी से मतदान कर सके।
पिछले कुछ महीनों से टीएमसी ने चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। अब पीछे मुड़कर देखने पर उन शिकायतों के कारण और स्पष्ट होते दिखते हैं।
इस चुनाव में चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ देखी गई है।
ममता बनर्जी ने २९ अप्रैल को आरोप लगाया था कि केंद्र की शक्तियां और सरकारी तंत्र टीएमसी को हराने में लगे हुए हैं।
कोलकाता एयरपोर्ट जाते वक्त केंद्रीय बलों ने उनकी कार की जांच करने की कोशिश करने का भी उन्होंने आरोप लगाया था।
टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों द्वारा आतंक फैलाने का आरोप लगाया था।
(यह सामग्री शुभज्योति घोष द्वारा संपादित है)





