
समाचार सारांश
- सन् २०२६ के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने २०६ सीटों के साथ दो-तिहाई बहुमत प्राप्त कर पहली बार सरकार बनाई है।
- शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर से ममता बनर्जी को १५,१०५ वोटों के बड़े अंतर से हराकर बंगाल के १५ वर्ष के तृणमूल शासन का अंत किया है।
- अधिकारी ने टीएमसी से इस्तीफा देकर भाजपा में प्रवेश किया और नंदीग्राम व भवानीपुर दोनों सीटों से सशक्त जीत हासिल की।
२२ वैशाख, काठमाडाैँ। सन् २०२६ के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने २०६ सीटों के साथ दो-तिहाई बहुमत पाकर पहली बार राज्य में सरकार बनाने का ऐतिहासिक जनादेश पाया है। इस अभूतपूर्व जीत के मुख्य नायक शुभेंदु अधिकारी बनें हैं।
शुभेंदु अधिकारी ने इस चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के परंपरागत गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर क्षेत्र से १५,१०५ वोटों के फराक से उन्हें हराया है।
वे केवल भवानीपुर में ही नहीं, बल्कि सन् २०२१ में जीते नंदीग्राम निर्वाचन क्षेत्र को भी बड़े अंतर से सुरक्षित रखने में सफल रहे हैं।
पहले ममता बनर्जी के विश्वसनीय शिष्य माने जाने वाले अधिकारी की विद्रोही यात्रा ने बंगाल में १५ वर्षों के तृणमूल शासन को समाप्त कर दिया है।
‘दीदी’ के किले को गिराने में सफल शुभेंदु अधिकारी राज्य की राजनीति में सबसे प्रभावशाली नायक के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
राजनीतिक विरासत और पारिवारिक पृष्ठभूमि
सन् १९७० में पूर्वी मेदिनीपुर के कारकुली में जन्मे शुभेंदु अधिकारी एक राजनीतिक रूप से मजबूत परिवार के उत्तराधिकारी हैं। उनके परिवार का राजनीतिक प्रभाव दशकों से पूर्वी मेदिनीपुर में व्याप्त है।
उनके पिता शिशिर अधिकारी इस क्षेत्र के प्रभावशाली नेता हैं। वे सन् २००९ में पहली बार लोकसभा सांसद चुने गए थे और २००९ से २०१२ तक तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में राज्यमंत्री के रूप में कार्यरत रहे। शुरुआत में वे कांग्रेस में थे, लेकिन बाद में ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस में जुड़े।
अधिकारी परिवार के अन्य सदस्यों ने भी राजनीति में सक्रियता दिखाई है। शुभेंदु के दो भाइयों में दिव्येंदु सांसद हैं जबकि अन्य भाई विधान स्थानीय स्तर की राजनीति में प्रभावशाली हैं।
साथ ही शुभेंदु ने कोलकाता विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र और इतिहास की पढ़ाई की है। वे छात्र राजनीति के जरिए ही अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर चुके थे और उस दौरान बंगाल की जटिल राजनीतिक संरचना को समझने में सफल रहे।
विद्यार्थी काल से ममता के प्रमुख सहयोगी
शुभेंदु का राजनीतिक सफर वामपंथी दबदबे वाले विद्यार्थी राजनीति के दौर से शुरू हुआ था। पश्चिम बंगाल के ३४ वर्षों के कम्युनिस्ट शासन में वामवादी छात्र संगठनों का प्रभुत्व था, लेकिन शुभेंदु ने अलग पहचान बनाई।
सन् १९९८ में ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की, तब शुभेंदु ने उनका समर्थन किया, हालांकि वे पार्टी के संस्थापक सदस्य नहीं थे।
टीएमसी के शुरुआती दौर में पूर्वी मेदिनीपुर में पार्टी की जड़ें मजबूत करने में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। उनकी संगठनात्मक क्षमता और基层 कार्यकर्ताओं के साथ संबंधों ने उन्हें ममता के विश्वसनीय सहयोगी और पार्टी का ‘दाहिना हाथ’ बना दिया।
उनका संसदीय सफर सन् २००६ में कोन्टाई दक्षिण से विधायक चुने जाने से शुरू हुआ। फिर सन् २००९ में तामलुक से लोकसभा सदस्य चुने गए। लगातार चुनावी सफलताएं और संगठनात्मक पकड़ से वे पार्टी में प्रभावशाली नेता बन गए।
ममता सरकार के प्रभावशाली मंत्री
सन् २०११ के ऐतिहासिक चुनाव में ३४ वर्षों के वामपंथी शासन का अंत कर ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी सरकार के मजबूत स्तंभ बने। नंदीग्राम से विधायक रहे उन्होंने ममता के मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
२०११ से २०२० तक वे यातायात, पर्यावरण, सिंचाई और जल संसाधन मंत्रालयों के मंत्री रहे। यातायात मंत्री के तौर पर उन्होंने बस सेवा विस्तार और सड़क परिवहन में सुधार कर जनप्रियता हासिल की।
वे ममता के सबसे भरोसेमंद सहयोगी माने जाते थे। पार्टी व सरकार में पकड़ मजबूत होने के कारण उन्हें ममता का दूसरा उत्तराधिकारी भी माना गया। लेकिन बढ़ते प्रभाव के कारण पार्टी नेतृत्व से टकराव भी हुआ।
टीएमसी छोड़ भाजपा में शामिल
सन् २०२० के अंत में शुभेंदु व टीएमसी के बीच गहरा मतभेद उभरा। ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में महत्वपूर्ण पद देते हुए अधिकारी को असंतुष्ट कर दिया। वे स्वयं को स्वाभाविक उत्तराधिकारी समझते थे, लेकिन परिवारवाद की राजनीति से खफा होकर विद्रोह का रास्ता चुना।
कुछ महीनों बाद दिसंबर २०२० में उन्होंने टीएमसी से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए।
पार्टी में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भव्य रैली में उनका स्वागत किया, जिसके बाद बंगाल में बड़ा ध्रुवीकरण शुरू हुआ। शुभेंदु के आने से कई विधायक और नेता भी भाजपा में शामिल हुए, जिसे कुछ ने राजनीतिक अवसरवाद और कुछ ने परिवारवाद के विरोध में विद्रोह बताया।
नंदीग्राम से भवानीपुर तक: कैसे टूटा ममता का किला?
सन् २०२१ के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु ने भाजपा से नंदीग्राम क्षेत्र से चुनाव लड़ा। ममता बनर्जी खुद वहां पहुंचीं लेकिन शुभेंदु ने अंत में बाजी पलटकर उन्हें १,९५६ वोटों से हराया।
तृणमूल ने राज्य में सरकार बनाई, लेकिन ममता की व्यक्तिगत हार ने शुभेंदु के राजनीतिक कद को बढ़ावा दिया।
सन् २०२६ के चुनाव में शुभेंदु ने नंदीग्राम के साथ-साथ ममता के गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर से भी चुनाव लड़ा और १५,१०५ वोटों से जीत हासिल की।
इसने ममता के १५ वर्षों के राजनीतिक दबदबे को समाप्त कर दिया। नंदीग्राम को सुरक्षित रखते हुए शुभेंदु ने बंगाल में भाजपा के लिए दो-तिहाई बहुमत सुनिश्चित किया और राज्य के सबसे शक्तिशाली नेता बने।

रणनीतिक चतुराई और संगठनात्मक पकड़
पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव में शुभेंदु अधिकारी की अभूतपूर्व सफलता के पीछे मुख्यतः चार रणनीतिक पहलू निर्णायक रहे हैं।
उन्होंने मतदान में हिंदू मतदाताओं की एकता को प्राथमिकता दी और खुलेआम ‘व्यापक हिंदू एकता’ का आह्वान किया।
छद्म धर्मनिरपेक्षता और नास्तिकता के खिलाफ सख्त रुख के कारण कई जगह कानूनी चुनौतियां आईं, लेकिन हिंदू बहुल इलाकों में भाजपा को बड़ा चुनावी लाभ मिला।
शुभेंदु ने मुस्लिम वोटों के विभाजन को भी भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण कारक बताया। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसी मुस्लिम बहुल जिलों में तृणमूल के वोट बंटने से भाजपा को फायदा हुआ।
उनका संगठन निर्माण कौशल उन्हें एक सुदृढ़ grassroots नेता बनाता है, जो गांव-गांव पार्टी का मजबूत नेटवर्क विकसित करते हैं।
उन्होंने टीएमसी की आंतरिक कलह और असंतोष को चुनावी मुद्दा बनाकर विपक्षी पार्टी को मजबूत किया।
विवादों में शुभेंदु: आपराधिक मामले से चुनावी टकराव तक
पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुभेंदु अधिकारी के उदय के साथ-साथ वे विवादों में भी आए हैं।
उन पर हत्या प्रयास का आरोप है। इसके अलावा नारदा स्टिंग ऑपरेशन और सारदा चिट फंड घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में भी वे जांच का सामना कर रहे हैं।
चुनावों से पहले ममता ने उन पर कोयला घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया था, जिस पर अधिकारी ने कानूनी नोटिस भेजकर सबूत मांगे थे।
पड़ोसी बांग्लादेश के संबंध में कही गई कुछ बातों को लेकर उन पर हेट स्पीच का भी आरोप लगा है।
निर्वाचन प्रक्रिया में मतगणना से पहले चुनाव अधिकारियों के गुप्त दस्तावेज सार्वजनिक होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने सुरक्षा और निष्पक्षता पर सवाल उठाए। भवानीपुर में ‘जय बंगला’ नारे के बीच उन पर हमले की बात कही और केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने की मांग की।
मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शुभेंदु: प्राथमिक दावेदार
सन् २०२६ के चुनावों के बाद भाजपा में चर्चा है कि पश्चिम बंगाल के पहले मुख्यमंत्री कौन होंगे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने बताया कि ९ मई को शपथ ग्रहण समारोह होगा।
ममता के गढ़ों में दो बार जीत के कारण पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की संभावना को मजबूत मान रही है।

शुभेंदु ने भवानीपुर और नंदीग्राम से शानदार जीत दर्ज की, और ममता को १५,१०५ वोटों से हराया। उन्हें कुशल grassroots नेता और संगठनकर्ता माना जाता है। कई लोग उनके उदय की तुलना असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा से करते हैं।
पूर्वी मेदिनीपुर से शुरू हुई उनकी राजनीतिक पकड़ अब पूरे राज्य में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय है। टीएमसी की आंतरिक कमजोरियों को समझना उनकी ताकत है। पार्टी के अंदर मौजूद कई शक्तिकेंद्रों के बारे में उन्हें गहरी जानकारी है, जिस वजह से वे विपक्ष के कई नेताओं को भाजपा में लाने में सफल हुए हैं।
मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदार और चुनौतियां
भाजपा को बहुमत मिलने के बावजूद शुभेंदु अधिकारी के लिए मुख्यमंत्री का रास्ता आसान नहीं है।
भाजपा के भीतर कई अन्य प्रभावशाली नेता भी मुख्यमंत्री पद के प्रतियोगी हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष चर्चा में हैं। समिक भट्टाचार्य, अग्निमित्रा पाल और रूपा गांगुली को भी दावेदार माना जाता है।
सबसे बड़ा चुनौती अधिकारी पर दर्ज २५ आपराधिक मामलों का है। न कभी देखे गए मामलों का बोझ लेकर प्रदेश के सर्वोच्च पद पर पहुंचना पार्टी की राष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकता है।
क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने का दबाव भी है। अधिकारी पूर्वी मेदिनीपुर से हैं। यदि केंद्र नेतृत्व उत्तर बंगाल या पश्चिमी भाग को प्राथमिकता देगा तो मुख्यमंत्री का विकल्प बदलने की संभावना है।
अंतिम निर्णय दिल्ली स्थित भाजपा केंद्रीय नेतृत्व, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के हाथ में है। स्वच्छ छवि प्रधानता मिले तो अधिकारी की दावेदारी जोखिम में आ सकती है।
लेकिन ममता को उनके गढ़ में दो बार हराने की ऐतिहासिक जीत के कारण पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद का ‘इनाम’ देने की संभावना को प्रबल मानती है।
गुरु को हराने वाला विद्रोही शिष्य
शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा छात्रों द्वारा अपने गुरु को हराने का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने ममता को दो बार चुनावी मैदान में पराजित कर इतिहास रचा है।
यह केवल दो नेताओं की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी है।
तीन दशक से अधिक लंबे वामपंथी शासन को समाप्त करने वाली ममता के नेतृत्व वाली टीएमसी अब पुरानी व्यवस्था और यथास्थिति की प्रतीक बनती जा रही है।
सन् २०११ में ममता ने ‘परिवर्तन’ का नारा देकर जनता का दिल जीता था, आज वही परिवर्तन की भूख शुभेंदु ने भाजपा के झंडे तले लेकर आए हैं। गुरु द्वारा स्थापित विरासत को चुनौती देकर अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में नया मोड़ दिया है।
फिर भी उनके सामने अनेक चुनौतियां और बाधाएं हैं। मुख्यमंत्री बने तो पार्टी के विभिन्न गुटों का संतुलन बनाए रखने और राज्य के जटिल प्रशासनिक चुनौतियों से निपटना होगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलना या न मिलना भविष्य बताएगा। फिलहाल वे राज्य के सबसे प्रभावशाली नेता हैं।
(एजेंसियों की सहायता से)





