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२५ वर्षों से सारंगी संगीत के माध्यम से जीवन यापन कर रहे हैं गंधर्व समुदाय के लोग

२३ वैशाख, धरान (सुनसरी)। सुवास गंधर्व सारंगी बजाते हुए और गीत मधुर स्वर में प्रस्तुत करते हुए २५ वर्षों से इस पेशे में सक्रिय हैं। उनके साथी सुजन गंधर्व भी आठ वर्षों से सारंगी के मधुर ताल पर गीत गाते आ रहे हैं। ये दोनों रोजाना धरान स्थित श्रम संस्कृति पार्क में सुबह १० बजे से शाम ५ बजे तक सारंगी और मादल की संगत में गीत प्रस्तुत करते हैं। एक व्यक्ति मादल बजाता है तो दूसरा सारंगी में संगीत करते हुए गीत गाता है, जो उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। सारंगी की मधुर धुनों से पार्क आने वाले सर्वसाधारणों को मनोरंजन प्रदान करते हुए ये लोग इस कार्य से अपना जीवन यापन करते हैं। दर्शक और पर्यटक अपनी इच्छा अनुसार आर्थिक सहयोग भी करते हैं।

सुवास गंधर्व कहते हैं, ‘बाबूआमाजी से इस पेशे में जुड़कर परिवार का पालन-पोषण कर रहा हूँ। मेरे पिता ने सारंगी बजाते हुए हमें पाला, और मैंने इस परंपरा को जारी रखा है।’ उन्होंने आगे बताया, ‘पहले गांवों में यातायात सुविधाएं कम थीं, दूर-दूर दौड़-भाग करके गीत गाने का रिवाज था। अब सवारी साधन सुविधाजनक हो गए हैं।’ उन्होंने नेपाल के पूर्व से पश्चिम तक के प्रमुख शहरों और भारत के सिक्किम व दार्जिलिंग में भी गीत गाने का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि सड़क और सार्वजनिक स्थानों पर गाना और स्वतःस्फूर्त मिलने वाला सहयोग उनकी मुख्य आमदनी का स्रोत है।

सुवास गंधर्व के अनुसार, वे ‘वॉयस ऑफ नेपाल’ कार्यक्रम में भाग लेकर बैटल चरण तक पहुंचे थे और ‘इन्द्रेणी’ कार्यक्रम में भी गीत गाने का मौका मिला था। लेकिन वहां से अपेक्षित आमदनी न होने पर वे फिर से सारंगी बजाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे काठमाडौं, पोखरा सहित विभिन्न शहरों की गलियों में सारंगी बजाकर अपने अनुभव संजो चुके हैं। सुजन गंधर्व ने भारत के दार्जिलिंग में लंबे समय नौकरी के बाद गांव लौटकर आठ वर्षों से सारंगी बजाकर और गीत गाकर जीवन यापन कर रहे हैं। वे इस पारंपरिक पेशे को संजोने और बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।

‘सारंगी बजाकर गीत गाना गंधर्व समुदाय की पीढ़ियों से चली आ रही प्रथा है, यह हमारी संस्कृति और पहचान है’, सुजन ने कहा, ‘लेकिन अब नई पीढ़ी अन्य व्यवसायों की ओर आकर्षित हो रही है जिससे यह मौलिक कला संकट में है।’ उन्होंने बताया कि आधुनिक प्रौद्योगिकी के विकास और मनोरंजन के बदलते माध्यमों के कारण गंधर्वों के पारंपरिक पेशे को बचाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। वे आशा व्यक्त करते हैं कि स्वास्थ्य साथ देता रहेगा तो वे यह पेशा जारी रखेंगे। नेपाल में लुप्तप्राय जाति के रूप में गंधर्व जाति मुख्यतः भोजपुर, कास्की, तनहुँ, लमजुङ, गोरखा, चितवन, बाग्लुङ, पाल्पा, दैलेख, सुर्खेत सहित कई जिलों में बसती है। नेपाली लोकसंगीत और रंगमंच के क्षेत्र में पुरानी परंपरा और संरक्षण, संवर्धन के वाहक गंधर्व जाति और उनके वाद्य यंत्र सारंगी-मादल भी हैं। आज गंधर्व लोकगीतों को स्थिरता देते हुए इसे अपना पेशा मान रहे हैं।