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हर्क साम्पाङ बोल रहे थे, तो बाकी कहां थे?

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा सहित समेटा गया।

  • हर्क साम्पाङ ने सुकुमवासी बस्तियों को हटाने की सरकारी कार्यशैली की आलोचना करते हुए व्यवस्थित योजना की आवश्यकता बताई है।
  • उन्होंने कहा कि सरकार संसद के दरवाजे बंद करके अध्यादेश के जरिए काम कर रही है और बहुमत के दबाव में किसी की नहीं सुन रही।
  • प्रतिपक्षी दल कांग्रेस और एमाले की सुकुमवासी समस्या समाधान में सक्रिय भूमिका न निभाने पर हर्क ने सवाल खड़े किए हैं।

हर्कवाद के औचित्य पर कभी अलग चर्चा होगी, लेकिन वर्तमान में हर्क साम्पाङ की प्रासंगिकता राष्ट्रीय राजनीति में स्पष्ट हो आई है। यह सब जानते हैं कि वे बेहद प्रतिबद्ध नेता हैं। उनके शुरू किए श्रम संस्कृति ने अपनी पार्टी में स्थायी पहचान नहीं बनाया है। जहां वे जाते हैं, पार्टी भी वहीं जाती है। वे जो निर्णय लेते हैं, वह पार्टी का निर्णय होता है। हर्क की इस कार्यशैली को श्रम संस्कृति कहा जाता है।

२३ वैशाख को ललितपुर के नखिपोट में जब हमारी टीम उनसे मिली, वह पुराने फिल्म कलाकार राजकुमार राई का पार्टी में स्वागत कर रहे थे। फिल्म द कमांडो से मशहूर राजकुमार ने लंबा समय पर्दे के पीछे बिताया। उनके साथ आरेन राई, सुदीप राई, प्रितम साँवा जैसे युवा भी थे। वहां भीड़ तो थी ही, साथ ही नई पार्टी के प्रति उत्साह भी नजर आ रहा था।

अभी संसद में मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस है, साथ ही एमाले भी प्रतिपक्ष में है। नेकपा और राप्रपा जैसे अन्य दल भी अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। फिर भी हर्क साम्पाङ और उनकी पार्टी के सांसद क्यों ज्यादा चर्चा में हैं, इसका कारण है।

विस्तृत बहुमत वाली सरकार तेजी से निर्णय करा रही है। सुकुमवासी बस्तियों में डोजर चलाया जा चुका है। सरकार दावा करती है कि होल्डिंग सेंटरों में बेहतरीन सुविधाएं हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय की योजनाबद्ध यात्राओं में पुलिस सुरक्षा के बीच सुकुमवासी कहते हैं कि ‘हमें यहाँ सुविधाएं मिल रही हैं। पहले हमें श्रम करके खाना पड़ता था, अब सरकार मुफ्त सुविधा दे रही है।’

लेकिन संवाददाताओं से बात करते हुए सुकुमवासियों ने व्यवस्थित योजना के तहत बस्ती हटाने की मांग की है। राष्ट्रीय समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने भी सरकार को इसी तरह सलाह दे रहे हैं। नीति सही हो, पर क्रियान्वयन कठिन है। इसी बीच सत्तारूढ़ पार्टी के भी अंदर विरोध की आवाजें उठ रही हैं और हर्क साम्पाङ सरकार के इस तरीके का विरोध कर रहे हैं।

ध्वस्त हुई सुकुमवासी बस्ती में हर्क साम्पाङ

ललितपुर के नखिपोट में हमसे मिलने पर हर्क लोकतंत्र में नागरिकों को सम्मान और गरिमा के साथ जीने और चलने का अधिकार क्यों होना चाहिए, यह बात अक्सर नेपाली और कभी-कभी अंग्रेजी में कहते थे। उनका कहना था, ‘काम करने वाले का भी अधिकार होता है। गरीबों की भी इज्जत होती है। झोपड़ियों में भरे हुए कापी-पुस्तकों से बच्चों की आंखों में आंसू आते हैं। सुकुमवासी बस्तियों में प्रेमी युगल थे, जो शादी की तैयारी कर रहे थे, उनकी इज्जत पर चोट लग रही है। सरकार ऐसा कर रही है।’

हर्क काम करते हुए कभी आंकड़े बढ़ा देते हैं, कभी घटा देते हैं, पर सभी नेता संवेदनशीलता में माहिर होते हैं।

हालांकि कुछ सुकुमवासियों को डोजर चलाया गया है और अव्यवस्थित बस्तियों व सरकारी जमीन पर पहले से ही कार्रवाई का इंतजार है। उनमें से एक हर्क साम्पाङ हैं।

कई नेता होल्डिंग सेंटर जैसे डिटेंशन सेन्टर तक नहीं पहुंच पाए हैं। कुछ को राजनीतिक छलांग लगाते-लगाते यात्रा ही रोकनी पड़ी। गरीबों के कष्ट किसी के लिए मनोरंजन नहीं होना चाहिए। सही रूप में राजनीति और जन समस्याओं का सामना हर्क वहां जाकर कर रहे हैं और स्थिति जनता के साथ साझा कर रहे हैं।

इस बीच कांग्रेस और एमाले क्या कर रहे हैं? वे हर्क से बड़े पदों वाले नेता हैं। मैंने दोनों के वरिष्ठ नेताओं से फोन पर बात की। एक वरिष्ठ एमाले नेता ने कहा, ‘इतने सारे लोग एक साथ बेघर हो गए, आप लोग क्या कर रहे हैं?’ मैंने पूछा, ‘हम रिपोर्टिंग और चर्चा कर रहे हैं, आप क्या कर रहे हैं?’ वे कुछ कह न सके और अपनी पार्टी की शीर्ष नेतृत्व से सामग्री बनाने को कहा।

‘सरकार संसद के दरवाजे बंद करके शीशा तोड़ते हुए अध्यादेशों से काम कर रही है। बहुमत के दबाव में किसी की नहीं सुनी जा रही।’

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता से मैंने कहा, ‘आप लोग न तो सरकार चला पाए और न ही विपक्ष का प्रभावी संचालन कर पाने का खतरा है।’ उन्होंने जो जवाब दिया, उसे मैं यहां उद्धृत करने में असमर्थ हूं।

नेकपा की बात करें तो वहां अध्यक्ष प्रचंड फिर से वाम एकता के प्रयास में हैं। राष्ट्रीय जीवन के गंभीर मसले सड़क और बस्तियों में अनदेखे पड़े हैं। वे मुद्दों से हटकर वाम एकता को प्राथमिकता दे रहे हैं।

ऐसे दौर में हर्क साम्पाङ, चाहे अपने तरीके से हों, सरकार तक जनता की समस्याएं पहुंचा रहे हैं। नखिपोट में उन्होंने कहा, ‘सरकार संसद के दरवाजे बंद करके शीशा तोड़ते हुए अध्यादेश से काम कर रही है। बहुमत के दबाव में किसी की नहीं सुनी जा रही।’

हर्क द्वारा उठाए गए सवाल सभी सही नहीं हो सकते, लेकिन लोकप्रिय सरकार के लिए जनता की आवाज़ सुनने वाला संगठन जरूरी है। संसदीय समितियों में मंत्रियों की उपस्थिति और अहंकार देखकर कड़ी आलोचना आवश्यक है।

कई संसदीय समितियों में सरकार के प्रतिनिधि नहीं आते। यह सरकार अब तक की सभी प्रवृत्तियों से सवाल कर रही है। सवाल दबाने के बजाय उन्हें बार-बार उठाया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में हर्क साम्पाङ के सवाल प्रासंगिक हैं। वे खुद धरान के महापौर रह चुके हैं, जहां कई बार सवालों की अनदेखी या मनमानी शासन भी हुई है।

अब प्रतिपक्ष को भी हर्क की तरह सक्रिय भूमिका निभानी होगी। सिर्फ फेसबुक पर छवि दिखाने तक सीमित नहीं रहना होगा। सुकुमवासी बस्तियों के बीच मंत्री व सांसदों के कपड़े, आभूषण और थैले जैसे वीडियो बनाना अभद्रता और अविवेकपूर्ण मज़ाक जैसा है। विवेकपूर्ण और तथ्यपरक सवाल किए जाएं तो सरकार को फायदा होगा।

क्या यह सही नहीं है, राष्ट्रीय समाजवादी पार्टी के नेता? प्रतिपक्ष को एक बार इस बारे में सोचना चाहिए।