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भारतीय वामपंथियों की पराजय, नेपाली वाम की व्यथा

समाचार सारांश समीक्षात्मक रूप में तैयार किया गया है। भारत के पश्चिम बंगाल और केरल में सम्पन्न विधानसभा चुनावों में वामपंथियों को भारी पराजय का सामना करना पड़ा है। नेपाल में हाल ही में हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव में कम्युनिष्ट पार्टी सीमित होकर केवल ४२ सीटों पर सिमटी हैं और पाँच वर्षों तक सत्ता में न आने की संभावना है। नेकपा अध्यक्ष प्रचण्ड ने पार्टी पुनर्गठन और वाम एकता के प्रयास करने का निर्णय ले लिया है, फिर भी नेताओं के बीच मतभेद बरकरार हैं। २३ वैशाख, काठमांडू। पड़ोसी भारत के दक्षिण के राज्यों में हुए चुनाव परिणाम को नेपाल के राजनीतिक क्षेत्र गंभीरता से देख रहा है। पश्चिम बंगाल, केरल जैसे वामपंथी प्रभावशाली राज्यों में आयोजित चुनाव ने Nepal के राजनीतिक नेताओं और आम जनता दोनों का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन इस बार विशेष ध्यान इस बात का है कि लगभग पाँच दशक के बाद भारत में किसी भी सरकार को वामपंथी पार्टियों ने विजय न दिला पाई। एक दशक से अधिक समय तक वाम शासन चलाने वाला पश्चिम बंगाल, जो कि २०११ के बाद गैरवाम सरकार का अधीन है, इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तृणमूल कांग्रेस को पराजित कर बहुमत प्राप्त किया है। २९४ सीटों के चुनाव में वामपंथी केवल २ सीटें ही जीत पाए।

दशकों तक वाम शासन वाला दूसरा राज्य केरल भी इस बार कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन के बहुमत में रहने से वामपंथी ३५ सीटों तक सिमट गए। यहाँ १४० सीटों में से कांग्रेस ६३, इंडियन मुस्लिम लीग २२ और अन्य सहयोगी दल १७ सीटें जीत गए। केरल में कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन सरकार ने भी कोई बड़ा बदलाव नहीं किया। पश्चिम बंगाल में वाम सत्ता के पतन से त्रिपुरा पर भी असर पड़ा है, जहाँ हाल ही गैरवाम सरकार स्थापित हुई है। २० वर्षों तक वामपंथी शासन वाले त्रिपुरा में २०१८ से सत्ता परिवर्तन हुआ। वाम विचारक हरि रोक ने कहा, विश्व में दक्षिणपंथी लोकप्रियतावाद के बढ़ते प्रभाव ने नेपाल और भारत को भी प्रभावित किया है। परंतु यह प्रभाव वामपंथियों की कमजोरी पर आधारित है। ‘पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के वामपंथियों ने अपने एजेंडा से दूरी बनाई, जिससे जनता में दूरी बढ़ी,’ उन्होंने कहा, ‘नेपाल में भी ऐसी ही स्थिति है और इसके परिणाम अब दिख रहे हैं।’

भारतीय वामपंथी की पराजय नेपाली वामपंथियों के लिए चिंता का विषय है। हालिया फागुन में संपन्न प्रतिनिधि सभा चुनाव में भी नेपाली वाम शक्तियां कमजोर हुई हैं। नेपाल में २० वर्षों बाद पहली बार गैरवाम सरकार सत्ता में आई है। २०४८ साल में स्थापित नेकपा एमाले केवल २५ सीटों तक सिमटी है, जिसमें ९ सीटें प्रत्यक्ष चुनाव से और १६ समानुपातिक हैं। २०६३ साल से सत्ता में रही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी सम्मिलित) ने १७ सीटें हासिल की हैं। कुल सीटें ४२ ही रह गई हैं। आठ साल पहले ०७४ साल के चुनाव में कम्युनिस्ट लगभग पूरे देश पर शासन कर रहे थे और सात प्रदेशों में से छह में लगभग दो-तिहाई बहुमत था। लेकिन हाल के चुनाव में रास्वपा ने १८२ सीटें जीतकर अगले पाँच वर्षों तक कम्युनिस्ट नेतृत्व की संभावना कम कर दी है। समानुपातिक मतों में भी वामपंथियों की स्थिति कमजोर रही। एमाले ने १४,५५,८८५ (१३.४३%) और नेकपाने ८,११,५७७ (७.४९%) वोट प्राप्त किए। अन्य छोटे वाम दल थ्रेशोल्ड पार नहीं कर पाए। २०१५ के बाद वामपंथी कभी इतने कमजोर नहीं रहे। इस कमजोर नतीजे ने नेपाली वामपंथियों को और दुख दिया है।

नेकपा प्रवक्ता प्रकाश ज्वाल ने कहा, ‘श्रीलंका को छोड़कर दक्षिण एशिया में वामपंथियों को ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा है। भारत की हालिया पराजय चिंता बढ़ाती है।’ इस पराजय के कारण भारतीय चुनावी परिणाम से उत्पन्न घाव का नेपाली वामपंथी पूरी तरह समीक्षा नहीं कर पाए हैं। खासकर एमाले संकट में है और समीक्षा प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई। फिर भी नेताओं ने स्वीकार किया है कि पराजय के कारणों की खोज कर सुधार अपरिहार्य है। उपाध्यक्ष गोकर्ण विष्ट के अनुसार, ‘जनता की बदलती इच्छा को समझने में विफलता, हमारी बात और काम में कमी क्या थी? पार्टी की रक्षा के लिए गंभीर समीक्षा आवश्यक है।’ वाम विश्लेषक हरि रोक ने कहा कि नेपाली वामपंथियों ने जनता की मांगों को भूलकर कुछ कॉर्पोरेटों का पक्ष लिया, जिससे आम जनता के एजेंडे से दूरी बनी और पॉपुलिज्म बढ़ा।

१० वर्षों के सशस्त्र विद्रोह के बाद ०६४ साल में सम्पन्न पहले संविधान सभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करने वाले पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ अपनी पार्टी के पुनर्गठन की तैयारी में हैं। चैत १९ से वैशाख १४ तक चलने वाली केन्द्रीय कार्यसमिति बैठक के बाद आगामी मंसिर में एकता महाधिवेशन का आयोजन किया जाएगा। इससे नेतृत्व पुनर्गठन की उम्मीद है। प्रचण्ड ने वाम एकता का निर्णय लिया और वक्तव्य जारी किया है, जो कुछ नेताओं को असहज करता दिख रहा है। प्रवक्ता प्रकाश ज्वाल ने १९ वैशाख को जारी बयान में कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता का उल्लेख भी किया। ‘पार्टी पुनर्गठन के साथ समग्र कम्युनिस्ट आंदोलन के पुनर्गठन और एकीकृत पार्टी निर्माण के लिए विशेष पहल होगी,’ बयान में कहा गया है।

प्रचण्ड ने कम्युनिस्ट पार्टी स्थापना दिवस पर भी वाम एकता की आवश्यकता पर जोर दिया। ‘समाजवाद और साम्यवाद के लक्ष्य रखने वाले सभी वामपंथियों के बीच एकता आज की जरूरत है,’ उन्होंने ९ वैशाख को कहा। वहीं, एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के समर्थक नेताओं ने भी कम्युनिस्ट एकता की पहल शुरू की, जो विवादों को जन्म दे रही है। एक एमाले नेता ने कहा, ‘केपी ओली और प्रचण्ड को नेताओं मानकर हमने एकता की कोशिश की, लेकिन वह पहले ही असफल रही।’ नेकपा नेता और पूर्व अर्थ मंत्री वर्षमान पुन ने कहा कि तत्काल पार्टी एकता संभव नहीं है। ‘समस्याओं को एक साथ रखकर हल नहीं किया जा सकता, पहले अलग-अलग पार्टी का पुनर्गठन जरूरी है, तब बातचीत संभव है।’ इतने शर्मनाक पराजय के बावजूद नेपाली वामपंथी स्पष्ट दिशा नहीं दे पा रहे हैं। ओली और प्रचण्ड के साथ जाने या नया नेतृत्व चयन कर पुनर्गठन की राह अपनाने को लेकर मतभेद है। इसी वजह से एमाले समीक्षा बैठक भी नहीं बुलाई जा रही। कई वाम नेता और विश्लेषक मानते हैं कि नेतृत्व पुनर्गठन के बिना नेपाली वाम शक्तियां पुनर्निर्मित नहीं हो सकतीं। ‘पॉपुलिज्म से आई सत्ता देश की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती, इसलिए वाम शक्तियां फिर उठ सकती हैं, मगर इसके लिए नेतृत्व पुनर्गठन जरूरी है,’ रोक ने कहा।

नेकपा संयुक्त के कार्यवाहक अध्यक्ष घनश्याम भूसाल ने भी वामपंथी पराजय का मुख्य कारण कमजोर नेतृत्व को बताया। ‘नेपाल की लोकतंत्र और राष्ट्रीय पहचान कम्युनिष्टों ने बनाई, लेकिन प्रभावी नेतृत्व न होने से हम पराजित हुए,’ भूसाल ने कहा। उनके अनुसार, ओली और प्रचण्ड ने आंदोलन को केवल सत्ता का खेल बनाया, जिससे जनता वाम आंदोलन की सही भावना नहीं समझ पाई।