
२३ वैशाख, काठमांडू। मनोहारा सुकुमवासी क्षेत्र पूरी तरह से खाली हो चुका है। अब वहां कोई मजबूत मकान, घर या झोपड़ी नहीं बची है। जो कुछ भी बचा था वह सब मलबे में तब्दील हो चुका है। अपने कुछ सामानों को मिलने की उम्मीद में पहले रहने वाले लोग कभी-कभार यहां आकर मलबे के ढेर को खंगालते रहते हैं।
हम जब पहुंचे तो मनोहारा के पूर्वी किनारे, बस्ती के मध्य भाग में चंद्रकुमारी मगर मिलीं। वह पहले अपने मकान की जगह पर थीं और डोजर द्वारा तोड़े गए दीवार के छोटे टुकड़ों पर हथौड़ा मार रही थीं। उनके साथ उनके पति रामबहादुर गुरुङ भी अन्य सामानों को इकट्ठा करने का काम कर रहे थे।
उनका उद्देश्य अधिक से अधिक मजबूत ईंटें निकालना था, जिससे दो अपेक्षाएं पूरी हो सकें — एक, नई जमीन पर झोपड़ी बनाने के लिए उन ईंटों का उपयोग करना,
और दूसरा, यदि योजना सफल नहीं हुई तो उन ईंटों को बेचकर कुछ धन जुटाना।

उन्होंने कुछ मजबूत ईंटें निकाल कर पास ही रखी थीं। अभी भी 60 वर्ष से अधिक आयु के बूढ़े हाथ मेहनत में लगे थे। हमसे बात करते हुए चंद्रकुमारी हथौड़ा मारती हुई आगे बढीं।
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चंद्रकुमारी ओखलढुंगा की हैं, लेकिन उन्हें अपने मायके की बहुत सी बातें याद नहीं हैं। उनके पिता बचपन में ही गुजर गए थे, माता की स्थिति पता नहीं। एक भाई था जो सोलुखुम्बु में काम के दौरान पेड़ से गिरकर निधन हो गया। वे अपने उम्र करीब 60 वर्ष बताती हैं, लेकिन सही उम्र पता नहीं। पति की उम्र की कोई जानकारी नहीं।
गांव में सहारा न मिलने के कारण जीविका चलाने शहर आना पड़ा। उन्हें काठमांडू में काम मिलने की उम्मीद थी। चंद्रकुमारी 24-25 वर्ष की उम्र में काठमांडू आईं।
काठमांडू आकर वे एक कालीन बुनाई कारखाने में काम करने लगीं। उसी दौरान रामबहादुर गुरुङ से उनकी मुलाकात हुई।
रामबहादुर भी पूर्व के रहने वाले हैं, लेकिन वे 6-7 साल की उम्र में काठमांडू आए थे, इसलिए अपना अतीत याद नहीं। गुजारा चलाने के लिए वे काठमांडू में मजदूरी करते थे। काम के दौरान चंद्रकुमारी और रामबहादुर के बीच प्रेम हुआ और उन्होंने विवाह किया।
विवाह के बाद कौशलटार में किराए के कमरे में रहने लगे। वहीं पहली संतान सपना गुरुङ का जन्म हुआ। आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई। किराया देने में मुश्किल होने लगी। गांव में खास कुछ भी शेष नहीं था।
उसी समय चंद्रकुमारी के परिचितों ने मनोहारा क्षेत्र में जमीन मिलने की बात कही। ‘जमीन भी मिलती है और घर भी बनाने की अनुमति है,’ ऐसी बातों ने उनका मन मोह लिया। वहां किराया नहीं देना पड़ता था। सभी हिसाब से अनुकूल लगा और पूरे परिवार के साथ सुकुमवासी बस्ती में रहने आ गए।
वहीं उनकी दो अन्य बेटियां, विपना और कल्पना भी जन्मीं। उन्होंने सरस्वती आधारभूत विद्यालय में कक्षा 8 तक पढ़ाई की, और वहां से एसएलसी भी उत्तीर्ण किया।
मनोहारा किनारे के बस्ती में आने के बाद भी चंद्रकुमारी और रामबहादुर ने मजदूरी का काम नहीं छोड़ा। अच्छी कमाई के लिए उन्हें कुछ और काम पता नहीं था। कमाई से अपने झोपड़ी को बेहतर बनाते गए।
ज्येष्ठ पुत्री विदेश गई और काम करने लगी, उनके भेजे गए पैसों से पक्का मकान बना।

बस्ती लगातार बढ़ रही थी। नए लोग आकर मकान बना रहे थे। किराना, नास्ता एवं मांस की दुकानें खुल रही थीं। मकानों के तल्ले भी बनने लगे। मनोहारा बस्ती विस्तार के दौरान स्थानीय और संघीय सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिससे कोई भी इस स्थिति से अनजान था।
उन्होंने कभी नहीं जाना कि उनकी बस्ती सार्वजनिक जमीन पर थी। बस्ती बड़ी होने के बाद भी काठमांडू की अन्य बस्तियों जैसी ही स्थिति में थी, यह विश्वास था। वे खुद को सुकुमवासी मानते थे इसलिए उनका अधिकार था ऐसी सोच थी।
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काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बने बालेन शाह के बाद सुकुमवासी मुद्दा सतह पर आया। बार-बार सुकुमवासी झोपड़ी पर डोजर चलाने की कोशिश हुई। लेकिन बालेन के कार्यकाल में वह अधूरा रहा और उन्हें अपनी बस्ती खाली होने का डर लगने लगा।
हालांकि बस्ती के सैकड़ों निवासियों के विरोध व नेताओं के सुकुमवासी पक्ष में बोलने से बालेन की कोशिश असफल हुई, जिससे चंद्रकुमारी के परिवार को उठिबास नहीं होने का भरोसा मिला।
हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में चंद्रकुमारी के परिवार ने बालेन शाह की पार्टी को वोट दिया। वहीं रास्वपाका अध्यक्ष रवि लामिछाने ने सुकुमवासी पक्ष में आवाज उठाने का वादा किया और बालेन ने झापा जाकर लालपुर्जा वितरण का आश्वासन दिया। उन्होंने इन बातों पर विश्वास किया।
चुनाव के दिन लोकन्थली स्कूल में घंटी निशान पर वोट डालने का अनुभव चंद्रकुमारी ने सुनाया।
लेकिन अब उन्हें अपना दिया गया वोट व्यर्थ नहीं लगता। उन्होंने वोट दी पार्टी के नेताओं की आलोचना करने में कोई समस्या नहीं देखी। उन्होंने कहा, ‘रवि लामिछाने कहते थे कि सुकुमवासी बस्ती में डोजर चलाएगा तो छाती ठोकूंगा। मैंने घंटी पर वोट डाला,’ वे बताती हैं, ‘लेकिन अब मेरा घर डोजर से ध्वस्त हो चुका है, कौन छाती ठोकने आए?’

महानगरपालिका होते हुए भी सुकुमवासी बस्ती में डोजर भेजने वालों पर किसे भरोसा करें? उन्होंने कहा, ‘हमारे पास बुद्धि है। पहले मेयर होने पर बालेन ने दिखाया था। वोट डालने जाते हुए भूल गए – घंटी, घंटी कहकर।’
उनके अनुसार अपने उठिबास की स्थिति ऐसी होगी, यह कल्पना नहीं की थी। २५ वर्षों से रहने वाली बस्ती और कड़ी मेहनत से जमा धन से बनाए घर को तोड़ा जाना उनके मन को दुखी करता है। लेकिन उससे ज्यादा सरकार का व्यवहार और अपनी उम्मीदों पर धोखा देने वाली बात ने उन्हें पीड़ा दी है।
घर तोड़ने से पहले सरकार ने 3-4 दिन ही सामान निकालने की अनुमति दी होती तो आज की अपेक्षा कम पीड़ा होती।
अभी भी बाहर कई अफवाहें थीं, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत तौर पर बस्ती हटने की सूचना देर से मिली। सरकार की ओर से पर्याप्त सूचना भी नहीं मिली। उन्हें ‘बस्ती हटाई जाएगी’ की खबर 11 वैशाख शुक्रवार को ही पता चली थी। वह भी अफवाह के रूप में सुनी थी।

इसी बीच बस्ती के अंदर ‘नहीं हटाएंगे’ की खबर भी फैल रही थी। कुछ लोग सामान निकाल रहे थे तो कुछ निश्चिंत होकर बैठे थे। चंद्रकुमारी बताती हैं कि उन्हें सही सूचना पता करना मुश्किल हो गया था। उनके साथ सरकार से सही और गंभीर सूचना न मिलने का आरोप है।
चंद्रकुमारी शुक्रवार शाम अपनी छोटी बेटी के कमरे में गईं। दोपहर में कोई जानकारी नहीं मिलने पर उन्होंने बताया कि वे बस्ती के बाहर गई थीं। छोटी बेटी बस्ती से थोड़ा दूर किराए के कमरे में रहती हैं। उस दिन वे थोड़ी थकी हुई थीं इसलिए बेटी के घर गई थीं।
उन्हें विश्वास था कि बस्ती तुरंत हटाई नहीं जाएगी और हटाई भी गई तो सामान निकालने का समय मिलेगा।
लेकिन अगले दिन रविवार सुबह डोजर ने बड़े तेजी से बस्ती उजाड़ दिया। जब डोजर मकान तोड़ रहा था, तब उनके पति रामबहादुर ने कुछ सामान निकाल लिए लेकिन ज्यादातर सामान घर के साथ मलबे में दब गया।
सामान के साथ आवश्यक दवाइयां भी दब गईं। वे दोनों उच्च रक्तचाप और मधुमेह के मरीज हैं और नियमित दवा लेते हैं। शाम को बारिश की वजह से दवा लेने नहीं जा सके।
सामान याद करते हुए चंद्रकुमारी ने बताया कि डोजर ने सात चरेस के थाले खो दिया, बेटी ने कतार से भेजे गए 10 कपड़े खो दिए, साथ ही रोजाना उपयोग के कपड़े जैसे लुंगी, चोली और ओढ़ने के कपड़े भी खो गए।
अब उनके पास बहुत कम कपड़े बचे हैं। पुलिस ने सामान निकालने में मदद का वादा किया लेकिन कोई सहायता नहीं मिली। रामबहादुर निकाले जाने वाले सामान पर निर्भर हैं।
सोमवार दोपहर तक मलबे से कुछ सामान निकालने की उम्मीद भी टूट चुकी थी। कुछ सामान वहां नहीं थे, सब कबाड़ वालों ने ले लिए थे।
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कम मेहनत से जीता जीवन फिर से मुश्किल में पड़ गया है। पहले वे स्वस्थ थे, लेकिन इस बार शरीर ने भी साथ नहीं दिया। दवा न खाने पर स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका है।

सबसे ज्यादा पीड़ा घर टूटने की है। उससे भी ज्यादा भविष्य को लेकर चिंता है। दो बेटियों की शादी करानी बाकी है। मुख्य चिंता अब कहा रहना है और कहां जाना है।
‘बेटियां तो शादी बाद जाएंगी। कतार में रह रही बेटी की तीन महीने से वेतन नहीं आ रही, युद्ध के कारण,’ चंद्रकुमारी बताती हैं, ‘ऐसे में हम किस पर भरोसा करें? इस बुढ़ापे में बालेन ने बर्बाद कर दिया।’
लेकिन जो भी हुआ वे अब सरकार के होल्डिंग सेंटर जाने का विचार नहीं कर रही हैं। अपनी गरीबी के साथ राज्य की मिली अपमान और आत्मसम्मान की रक्षा उनके लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए वे जितना जी सकें अपनी मेहनत से जीने के विचार में हैं। यदि नई जमीन मिली तो किराए पर लेकर नई झोपड़ी बनाएंगी, नहीं तो कमरे लेकर रहने की सोच हैं।
‘बेटियां कुछ कर सकती हैं तो चलेगी, हम बूढ़े बूढ़ी जितना जीते हैं, झेल लेंगे। लेकिन हम उन अमीरों के शौचालय जैसे भी नहीं लिए कमरे में कैसे दब सकते हैं?’ उन्होंने कहा, ‘हमारे पास कुछ नहीं है इसलिए शायद हमें नीचा दिखाया गया होगा।’





