
सबसे पहले कानून दिवस, २०८३ के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं देना चाहता हूँ। स्वतंत्र, निष्पक्ष और सक्षम न्यायपालिका तथा कानूनी राज्य की अवधारणा को संस्थागत करते हुए देश में सुशासन विकास, समृद्धि और सामाजिक न्याय की सुनिश्चितता करने एवं सहज पहुँच और जनआस्था पर आधारित न्याय प्रणाली के लिए आज का यह विशेष दिन हम सभी में नई ऊर्जा, उत्साह और प्रेरणा प्रदान करे, ऐसी हार्दिक कामना करता हूँ। नेपाल प्रधान न्यायालय २००८, विक्रम संवत २००९ वैशाख २६ से लागू होने के दिन की स्मृति में प्रत्येक वर्ष वैशाख २६ को कानून दिवस के रूप में मनाया जाता है।
शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के अनुसार राज्य के प्रमुख अंग—कार्यपालिका, विधायक सभा और न्यायपालिका के बीच राज्य शक्ति का विभाजन करते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विधि का शासन और आधुनिक न्याय प्रणाली की स्थापना के लिए इस क़ानून ने आधार प्रदान किया, जिससे आज की आधुनिक न्याय प्रणाली की यात्रा संभव हुई है। इस विशेष समारोह में सम्माननीय राष्ट्रपति की विशेष उपस्थिति से हमें अत्यंत गर्व का अनुभव हुआ। संविधान राज्य संचालन का केवल कानूनी दस्तावेज نہیں बल्कि नागरिकों के जीवन शैली का आधार होना चाहिए। इससे आम नागरिक को संवैधानिक शासन परिवर्तन की वास्तविक अनुभूति होती है।
इस विशेष दिन पर हम सभी तीनों राज्य अंग इस मूल्यमान्यता को आत्मसात कर उच्च समर्थन भाव से सक्रिय और योगदानशील रह सकें, यही कामना करता हूँ। न्यायिक इतिहास की बेहद जटिल और कठिन परिस्थितियों में भी स्वतंत्र न्यायपालिका की मूल्यमान्यता को अक्षुण्ण रखते हुए संविधान के सम्मान के आधार पर कार्यपालिका के स्वेच्छाचारी और अनुचित हस्तक्षेप से इस संस्था की रक्षा करने एवं न्यायिक मान्यता को कायम रखने वाले पूर्वप्रधान न्यायाधीश और सभी न्याय कर्मियों को नमन करता हूँ तथा उच्च सम्मान व्यक्त करता हूँ।
आज का दिन संविधान का ईमानदार पालन और विधि के शासन की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का दिन है। हम सभी लोकतंत्र और कानूनी राज्य के संचालक और संबंधित लोग संविधान, विधि के शासन, लोकतंत्र के सही संरक्षण और कार्यान्वयन के प्रयत्नों का आत्मावलोकन करने का अवसर भी पाएँ। अप्रत्याशित रूप से भदौ २३ और २४ को हुए घटनाक्रम के बाद हम कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे थे। न्यायपालिका पुनरुत्थान की दिशा में अग्रसर है। निश्चय ही संविधान, संविधानवाद और संवैधानिक नैतिकता से ऊपर कोई नहीं है और कोई भी नहीं हो सकता।
लेकिन कहीं अधिकार और विधि के प्रयोग के बहाने संवैधानिक सर्वोच्चता, स्वतंत्रता और न्याय की सार्वभौम सत्ता के मूल आधारों को कमजोर कर, आज्ञाकारी न्यायपालिका और कानूनी राज्य के असमान प्रयोग का प्रयास चल रहा है या नहीं, यह प्रश्न उठ रहा है। न्याय को अंतिम गंतव्य बनाने के बजाय अपने स्वार्थ की रक्षा के लिए छल तथा गलत प्रयास तो नहीं हो रहें, इस पर भी सवाल उठता है। आगामी दिनों में भी किसी भी स्थिति में न्याय में सौदा नहीं किया जा सकता, यह स्थापित करना आवश्यक है, और विभिन्न बहानों से शासन को कमजोर करने के प्रयासों को सहन करना चुनौतीपूर्ण होगा।
यदि ऐसी प्रवृत्ति को संवैधानिक और प्रशासनिक संरचनात्मक प्रक्रिया में स्वीकार कर लिया गया तो तत्काल की शक्ति उत्साह में उसे सहन या पुष्टि करने की कोशिश से अनिश्चितता स्पष्ट होगी। एक को खाने वाला बाघ दूसरे को नहीं छोड़ सकता। संविधान को यथास्थिति में रख कर उसके विरुद्ध किया गया कार्य क्रांति या परिवर्तन नहीं हो सकता। संविधान उल्लंघन करने वालों को संविधान के खिलाफ जिम्मेदार नहीं ठहराया गया तो संविधान के प्रति वफादार कार्यान्वयन भी सम्भव नहीं होगा।
संरचना को तोड़कर परिवर्तन करने के बहाने परिप्रेक्ष्य की श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास करने वालों की सत्ता के लिए लालसा खत्म हो सकती है, लेकिन विधि और वैधानिक परंपरा की उम्मीद रखने वालों का सपना टूटा निश्चित है। विधि और वैधानिक परंपरा की हत्या करके किए गए स्वार्थपरक कार्य निरंकुशता का संकेत देते हैं। औचित्य के नाम पर विधि में छेड़छाड़ करना स्वेच्छाचारिता हो सकती है, लेकिन विधि के शासन पर भरोसा रखने वालों के लिए यह स्वीकार्य नहीं है। यदि ऐसे विषयों को नजरअंदाज किया गया तो राज्य की संवैधानिक प्रणाली, लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्यायपूर्ण समाज की कल्पना सुरक्षित रहना दुर्लभ हो जाएगा।
सम्माननीय सभामुख जी ने कहा था कि अगर न्यायपालिका भी सरकार की भावना के अनुसार चले तो मैं कहता हूँ न्यायपालिका संविधान की भावना के अनुसार चलनी चाहिए। जब सरकार की गति और संविधान की भावना एक समान होती है तब न्यायपालिका समन्वय कर सकती है। न्यायपालिका तब सशक्त होती है जब उसे शासन द्वारा संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। मैं सभी न्यायाधीशों से कहता हूँ, डर और प्रभाव में न्याय संभव नहीं। चाहे वह दो तिहाई सरकार का डर हो या महाभियोग का भय। डर और भय से मुक्त होकर अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ने का मैं सभी न्याय कर्मियों से आग्रह करता हूँ।
मैं स्वयं जीवनभर भेदभाव और अन्याय के खिलाफ संघर्ष करता रहा हूँ, एक कानून व्यवसायी के रूप में। लड़ाई अभी बाकी है। सक्षम, पारदर्शी और न्यायपूर्ण न्याय के लिए प्रतिबद्ध होकर काम करने के लिए आज का दिन नई प्रेरणा दे। इस गंभीर समय में संविधानवाद, विधि का शासन, नागरिक अधिकार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सभी आम नागरिकों, नेपाल बार एसोसिएशन, मीडिया, नागरिक समाज और संबंधित सभी से हार्दिक अपील करता हूँ। सम्माननीय राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति को इस कार्यक्रम में अभिभावकत्व देने के लिए हार्दिक धन्यवाद। कानून दिवस के इस विशेष गरिमामय अवसर पर राज्य के सभी अंगों की पुनर्मिलन की सुखद और प्रेरणादायी परंपरा निरंतर जारी है। आज भी इस परंपरा का जीवंत साक्षी बनने पर हम अत्यंत हर्षित और गौरवान्वित हैं। अंत में इस विशेष समारोह में सम्माननीय राष्ट्रपति जी की गरिमामय उपस्थिति हमारे लिए गर्व का विषय है। उनका हार्दिक आभार और कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। साथ ही कार्यक्रम में उपस्थित सभी विशिष्ट अतिथियों का भी हार्दिक धन्यवाद करता हूँ और कानून दिवस के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएं देता हूँ। धन्यवाद एवं नमस्कार। (शनिवार कानून दिवस के अवसर पर प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल द्वारा व्यक्त विचारों के संपादित अंश यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं।)





