‘नेपाल में खपत पूरी होने पर ही बची हुई विद्युत् अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचें’

समाचार संक्षेप सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय विद्युत् व्यापार करते समय स्वदेशी खपत में कटौती न करने के लिए सरकार को कड़ा निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने नेपाल और भारत के बीच हुए दीर्घकालिक विद्युत् खरीद-बिक्री समझौते को प्राकृतिक संसाधन वितरण न होने के कारण संघीय संसद की मंजूरी अनिवार्य नहीं बताई है। अदालत ने कहा है कि समझौते के कार्यान्वयन के दौरान स्वदेशी खपत पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े, इसके लिए ही विद्युत् की बिक्री होनी चाहिए और सभी समझौतों को सरकारी राजपत्र में प्रकाशित किया जाना चाहिए। २७ वैशाख, काठमाडौं। सर्वोच्च अदालत ने अंतरराष्ट्रीय विद्युत् व्यापार में नेपाल की खपत में कटौती न करने का स्पष्ट आदेश दिया है। नेपाल और भारत के बीच दो साल पहले हुए विद्युत् खरीद-बिक्री समझौते के विरुद्ध दायर मामले पर बुधवार को फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि नेपाल में पर्याप्त खपत बाद ही अप्रयुक्त विद्युत् अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिक्री की जा सकती है। २० कार्तिक २०८१ के इस फैसले में सर्वोच्च ने कहा, ‘स्वदेशी खपत में कोई कटौती या नकारात्मक असर न हो, ऐसे ही विद्युत् की बिक्री करें।’
नेपाल और भारत के इस विद्युत् खरीद समझौते को प्राकृतिक संसाधन वितरण से संबंधित नहीं माना गया है, इसलिए इसे संघीय संसद के दो-तिहाई मत से पारित करने की आवश्यकता नहीं है। इस विवाद में सूर्यनाथ उपाध्याय समेत अन्य लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज करते हुए सरकार को कुछ निर्देशात्मक आदेश जारी किए हैं। आदेशों में कहा गया है कि पहले नेपाल में विद्युत् की मांग पूरी होनी चाहिए उसके बाद ही अतिरिक्त विद्युत् की बिक्री की अनुमति दी जाए।
१९ पुस २०८० को हुए दीर्घकालिक विद्युत् खरीद-बिक्री समझौते ने प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल के नेतृत्व में नेपाल और भारत के बीच विद्युत् के व्यापार को संभव बनाया था। हालांकि जलाशय आधारित परियोजनाएं संचालन में हों, नेपाल को कोई प्रत्यक्ष लाभ न होने और ट्रांसमिशन पूर्वाधार भारत के नियंत्रण में रहे इस व्यवस्था के विरोध में याचिका दायर की गई थी। इस समझौते को अस्थायी बताया गया और इसे नेपाल के हित के खिलाफ मानते हुए संसद की मंजूरी आवश्यक होने का दावा किया गया था। नेपाल की आर्थिक उन्नति के लिए विद्युत् खपत २० वर्षों में ५० हजार मेगावॉट तक पहुंचने की संभावना को उजागर करते हुए इस समझौते की आलोचना की गई थी।
विद्युत् खरीद-बिक्री समझौते में संविधान की धारा २७९ के तहत मंजूरी की आवश्यकता है या नहीं, इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया है। प्रधान न्यायाधीश प्रकाशमान सिंह राउत, न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल और महेश शर्मा पौडेल की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। धारा २७९ के तहत शांति, मैत्री, सुरक्षा, सामरिक संबंध, सीमा एवं प्राकृतिक संसाधन वितरण से जुड़े समझौतों के लिए संघीय संसद की दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। हालांकि अदालत ने कहा, ‘यह समझौता जल संसाधन वितरण से संबंधित नहीं है, केवल जलविद्युत् व्यापार से जुड़ा है, इसलिए इसे प्राकृतिक संसाधन वितरण का समझौता नहीं माना जा सकता।’
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, विद्युत् खरीद-बिक्री समझौता प्राकृतिक संसाधन वितरण से जोड़ना गलत होगा। यह समझौता दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक विद्युत् व्यापार को बढ़ावा देने के लिए है। अदालत ने बताया कि यह व्यापार जलविद्युत् विकास और उपयोग के आधार पर किया जाता है। ‘विद्युत् पानी से बनती है लेकिन यह प्राकृतिक संसाधन नहीं है,’ अदालत ने कहा, ‘यदि विद्युत् को प्राकृतिक संसाधन माना गया तो भू-आधारित अन्न भी प्राकृतिक संसाधन होगा और उसके निर्यात पर प्रतिबंध लगना पड़ेगा।’ इसलिए, इस समझौते के लिए संघीय संसद की मंजूरी आवश्यक नहीं है। सरकार ने ऊर्जा सचिव को यह समझौता करने के लिए अधिकार दिया था।
समझौते में विद्युत् व्यापार, पूर्वाधार विकास और निवेश प्रोत्साहन शामिल है। अदालत ने कहा, ‘नेपाल में खपत पूरी हो जाने के बाद अतिरिक्त विद्युत् भारत को १० हजार मेगावॉट तक बेची जा सकती है।’ अदालत ने याचिका खारिज करते हुए सरकार को निर्देश दिया है कि स्वीकृत समझौतों की जानकारी संघीय संसद को उपलब्ध कराई जाएं और उन्हें सरकारी राजपत्र में प्रकाशित किया जाए।
विद्युत् व्यापार, ग्रिड कनेक्शन और प्रसारण पूर्वाधार के विस्तार में राष्ट्रीय हित और स्वदेशी खपत को नकारात्मक प्रभाव से बचाने के लिए भी सर्वोच्च ने अंतरराष्ट्रीय समन्वय की आवश्यकता बताई है। निर्देशात्मक आदेश में कहा गया है, ‘यदि समझौते के क्रियान्वयन में प्राकृतिक संसाधन वितरण संबंधी स्थिति उत्पन्न होती है तो संविधान के अनुसार संसद की मंजूरी जरूरी होगी।’




