
२८ वैशाख, काठमाडौं। लगभग नौ वर्षों के बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति आधिकारिक राज्य दौरे पर चीन जाने वाले हैं। चीनी विदेश मंत्रालय की पुष्टि के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प १३ से १५ मई तक चीन में रहेंगे। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष, हर्मुज जलसन्धि से जुड़ा संकट और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की चिंता के बीच यह दौरा अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे पहले मार्च महीने में तय किए गए इस दौरे को मध्यपूर्व के तनाव के कारण स्थगित किया गया था। ट्रम्प के कार्यक्रम के बारे में व्हाइट हाउस की मुख्य उप-प्रेस सचिव अन्ना केली ने बताया कि ट्रम्प बुधवार (१३ मई) शाम को बीजिंग पहुंचेंगे। उनके स्वागत में गुरुवार को भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग से द्विपक्षीय वार्ता होगी। उसी दिन ट्रम्प ‘टेम्पल ऑफ हेवन’ का दौरा करेंगे और राजकीय भोज में भाग लेंगे। शुक्रवार को दोनों नेताओं के बीच चायपान सहित चर्चा और ‘वर्किंग लंच’ होगा। इस साल के अंत में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी अमेरिका दौरे की संभावना है।
चर्चा के मुख्य एजेंडे क्या हैं? ट्रम्प के दौरे में किसी महत्वपूर्ण चीनी निवेश की घोषणा की संभावना अमेरिकी अधिकारियों ने कम बताई है। हालांकि, एयरोस्पेस, कृषि और ऊर्जा क्षेत्रों में कुछ समझौतों के संकेत हैं। दौरे में ब्लैकस्टोन के स्टीफन स्वर्ज़मैन और सिटी ग्रुप की जेन फ्रेजर सहित शीर्ष अमेरिकी सीईओ ट्रम्प के साथ रहेंगे। दौरे से पहले व्यापारिक तनाव कम करने के लिए चीनी उपप्रधानमंत्री हे लिफेंग और अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बैसन्ट के बीच १२ और १३ मई को दक्षिण कोरिया में अंतिम चरण की वार्ता होगी। व्यापार और आर्थिक विषयों के साथ ही ईरान युद्ध भी इस दौरे का एक और एजेंडा होगा। क्योंकि ईरान के साथ संघर्ष इस दौरे की मुख्य पृष्ठभूमि बन रहा है। चीन पहले ही हर्मुज जलसंधि को विश्व का अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावसायिक मार्ग बताकर यहां नाकाबंदी को उचित नहीं माना है। इसके अतिरिक्त ताइवान मुद्दा और हथियार बिक्री भी दौरे के एजेंडे में शामिल होंगे। ट्रम्प और शी के बीच ताइवान मामले पर विशेष जोर होगा। अमेरिकी अधिकारियों ने ताइवान के प्रति अमेरिकी नीति में कोई बदलाव नहीं होने की स्पष्टता दी है। ट्रम्प प्रशासन ने ताइवान को हथियार की बिक्री जारी रखते हुए चीन के दबाव के बावजूद पीछे हटने के संकेत नहीं दिए हैं। इसी तरह, एआई तकनीक के विषय में दोनों देशों के बीच प्रारंभिक चर्चा होगी। इस क्षेत्र में दो देशों के बीच संचार के माध्यम स्थापित करने की संभावनाएं तलाश की जाएंगी। कूटनीतिक चुनौतियों और समझ के अभाव के कारण विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका और चीन दोनों पक्ष एक-दूसरे को पूरी तरह समझे बिना इस शिखर सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। चीन को अमेरिका के पतन की काफी आत्मविश्वास है। वहीं अमेरिकी अधिकारी चीन के दबाव सहने की क्षमता को गलत समझ रहे हैं और ‘उच्च स्तर की वार्ता के बाद चीन समझौता करेगा’ इस भ्रम में हैं, ऐसा विश्लेषकों ने बताया है। अमेरिका में चीन विशेषज्ञों की घटती संख्या वाशिंगटन की कूटनीतिक तैयारी कमजोर बना रही है, विश्लेषकों ने यह भी माना है। (एजेंसी सहयोग से)





