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पहले घासफूस का काम, अब पर्यटक स्वागत में व्यस्त – रामकोट की समृद्धि

२९वैशाख, तनहुँ। रोजाना घासफूस करना, हर गली-गली में पालतू जानवरों द्वारा किए गए मल-गंध और बिजली की अनुपस्थिति में जागरूकता का अभाव था। लगभग १० साल पहले तनहुँ के बन्दीपुर-३ के रामकोट गाँव और वहां के निवासियों की स्थिति ऐसी ही थी। लेकिन बीते एक दशक में रामकोट ने अपने भूलने लायक उन बीते कल से अलग होकर समृद्धि के मार्ग पर कदम बढ़ाया है।

मगर समुदाय की अधिक आबादी और पत्थरों से बनी हुई घरों वाला रामकोट, जहाँ २०७५ साल में होमस्टे की शुरुआत ने यहाँ की पहचान ही बदल दी है। होमस्टे से आय में वृद्धि के बाद स्थानीय लोग आत्मनिर्भर बनने लगे हैं।

उत्तर में दिखने वाले सुंदर हिमालय के निकट स्थित रामकोट चुली (डंकने डाँडा) स्थानीय लोगों द्वारा अनुभव किए गए कष्ट और जीवनशैली में हुए परिवर्तन का प्रत्यक्ष साक्षी बना है।

घास-दौरा और मेलापात जैसे कामों में व्यस्त यहाँ की महिलाएँ अब मगर परिधान में सुसज्जित होकर पर्यटकों का ‘‘झोर्ले’’ की आवाज़ में स्वागत करने और सत्कार में लगी हैं। रामकोट आने वाले पर्यटकों को ये महिलाएँ सफेद अक्षता लगाकर सम्मानित करती हैं।

गले में फूलों की माला और स्टील के गिलास में ‘‘सगुन’’ (स्थानीय शराब) परोसा जाता है। पर्यटक गुन्द्रुक के साथ ‘‘पलेटी’’ लगाकर इसका स्वाद लेते हैं। शाम होते ही झ्याउरे, कौरा और चुट्का गीत-संगीत का मज़ा शुरू होता है, जो नृत्य गान के साथ माहौल को और भी जीवंत बनाता है।

रामकोट गाँव

शाम को स्थानीय ऑर्गैनिक भोजन जैसे कोदो और फापर की ढिंढो, गुन्द्रुक का अचार, स्थानीय मुर्गी के मांस सहित आगंतुकों का स्वागत करने वाली महिला दिदीबहनों को पुरुष सहायता प्रदान करते हैं। पर्यटक एक साथ भोजन करते हैं लेकिन अलग-अलग घरों में सोने जाते हैं।

सुबह कोदो की सेलरोटी, सब्ज़ी, अचार और चाय का सेवन किया जाता है। विदा होते समय भी पर्यटकों को सफेद अक्षता और फूलों की माला दी जाती है।

रामकोट में प्रति दिन १० से १५ पर्यटक और छुट्टियों में समूहों में पर्यटक आते हैं। रोजाना ३ से ४ विदेशी पर्यटक भी आते हैं, जिनमें से कई सुबह आकर शाम को लौट जाते हैं।

९५ घरों में से ४८ घर होमस्टे के सदस्य हैं, लेकिन केवल १५ घरों में ही होमस्टे का संचालन होता है। यहां एक बार में ३० लोग रह सकते हैं, और एक रात का किराया प्रति व्यक्ति १२०० रुपये है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए अतिरिक्त ३००० रुपये लिए जाते हैं।

पर्यटकों के आगमन से गाँव में आय में वृद्धि हुई है। पहले घर चलाना मुश्किल होता था, पुरुषों की कमाई पर निर्भर महिलाएँ अब केवल पर्यटक स्वागत से खुश नहीं हैं, वे आय अर्जित कर आत्मनिर्भर भी बन गई हैं।

पर्यटकों के स्वागत में कतारबद्ध स्थानीय महिलाएँ

४४ वर्षीय कृष्णमाया थापा पहले की कठिनाइयां याद करती हैं और अब की सुविधाओं की प्रशंसा करती हैं। ‘‘पहले हम अच्छी तरह बोल भी नहीं पाते थे, नए लोगों से डरते थे, कठिन दिन थे,’’ थापा ने कहा, ‘‘अब हम आत्मनिर्भर हैं, जीवन उज्जवल लगने लगा है।’’

रामकोट की गलियाँ पत्थर से बनी और साफ हैं। घरों के आँगनों में लगे मकई के सूखे तनों और पत्थर गाँव को सुंदर बनाते हैं। होमस्टे के साथ कुखुरों, बकरियों और सुअरों का पालन होता है, सब्जियां भी उगाई जाती हैं और स्थानीय शराब बनाकर भी आय हो रही है।

नियमित आय से छोटी-छोटी आर्थिक समस्याओं का समाधान होना आसान हो गया है, स्थानीय महिलाएं बताती हैं।

होमस्टे ने महिलाओं में बचत की आदत भी विकसित की है। मगर संस्कृति के संरक्षण के साथ स्थानीय आय बढ़ाने के उद्देश्य में सफलता देखकर सभी आश्चर्यचकित हैं।

गाँव में ही भविष्य देख रहे युवा

विदेश जाने वाले युवा अब गाँव में रहकर भविष्य बनाने का सोच रहे हैं। ऐसे युवाओं में रामकोट सामुदायिक होमस्टे के अध्यक्ष निरकाजी आले भी हैं।

मलेशिया से लौटे आले होमस्टे के विकास, प्रचार-प्रसार, अभिमुखीकरण और जनजागरूकता फैलाने में सक्रिय हैं। ‘‘कुछ युवा सोचते हैं कि गाँव में कुछ किया जा सकता है। होमस्टे न होने पर रामकोट को अन्य गाँवों जैसी कठिनाइयाँ झेलनी पड़तीं,’’ वे कहते हैं।

पहले ग्रामीण पर्यटन न होने के कारण अधिकांश युवा विदेश जाते थे, अब अधिकांश युवा गाँव में ही हैं।

रामकोट में पर्यटकों का स्वागत करते स्थानीय लोग

होमस्टे सचिव सावित्री थापा बताती हैं कि परंपरागत कृषि और घासफूस में लगे महिलाएं आज आय अर्जन और कौशल आधारित प्रशिक्षणों के माध्यम से अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। घर चलाने से जीवन शैली में बड़ा बदलाव आया है और स्वरोजगार भी बढ़ रहा है।

रामकोट कैसे पहुंचें?

बंदीपुर बाजार से ८ किलोमीटर पश्चिम स्थित यह गाँव मगर समुदाय का सांस्कृतिक केंद्र है। समुद्र तल से लगभग १००० मीटर ऊंचा होने के कारण यहाँ से हिमश्रृंखला देखी जा सकती है जो पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण है।

विशाल सुकौराफाँट और सदियों पुराने मगर गाँव पर्यटकों का आकर्षण बन रहे हैं।

घुमाएँ घर

रामकोट में लगभग एक शताब्दी पुराना ‘‘घुमाएँ घर’’ अभी भी सुरक्षित है।

बंदीपुर से मुछुक होते हुए ५.५ किलोमीटर, बन्दीपुर से सेराटार होते हुए ८ किलोमीटर और पृथ्वीराजमार्ग के छिर्का से ७ किलोमीटर पार करके रामकोट पहुँच सकते हैं।

रामकोट सामुदायिक होमस्टे के अध्यक्ष निरकाजी आले ने स्थानीय और विदेशी पर्यटकों को स्थानीय आतिथ्य के कारण यहाँ आकर्षित होने की बात कही है।

रामकोट सामुदायिक होमस्टे के अध्यक्ष निरकाजी आले

बंदीपुर में शुरू हुए विलेज सफारी ने भी रामकोट में पर्यटकों की संख्या बढ़ाई है। वसन्त पौडेल ने माघ से शुरू हुए इस सफारी द्वारा गाँव-गाँव की पहचान कराई है।

चितवन भरतपुर के सुजन पोखरेल ने पहली बार जाकर रामकोट की सत्कार, सम्मान और खानपान से खूब आनंदित होने की बात कही। विज्ञान पौडेल ने मगर जाति की कला, संस्कृति और सामूहिकता के अध्ययन के लिए रामकोट फिर आने की सलाह दी।

चुनौतियाँ और आवश्यकताएँ अब भी मौजूद

रामकोट में अभी भी पानी की पर्याप्त मात्रा नहीं है। गाँव के आठ स्रोत सामूहिक रूप से उपयोग में हैं, लेकिन घर-परिवारों तक पहुँचाने का कार्य चल रहा है।

पानी की कमी के कारण कृषि उत्पादन अपेक्षा अनुसार नहीं हो पाया है और पशुपालन में भी जल संकट सामने आया है।

बंदीपुर से रामकोट तक सड़क कच्ची होने के कारण पर्यटकों की आवाजाही में मुश्किलें हैं, इसका दुख अध्यक्ष आले व्यकत करते हैं। सड़क पक्की होने पर पर्यटकों की संख्या में वृद्धि की उम्मीद है।

सांस्कृतिक भवन और संग्रहालय स्थापना की आवश्यकता भी है। होमस्टे संचालनों में आर्थिक संकट के कारण सभी घर संचालन नहीं कर पा रहे हैं। उत्पादक गतिविधियों में शामिल करने की पहल की जा रही है। कूड़ा प्रबंधन के लिए भी अधोसंरचना आवश्यक है, उन्होंने बताया।

रामकोट में पर्यटक

अध्यक्ष आले ने बताया कि अगले एक वर्ष के भीतर २०० व्यक्तियों के एक साथ रुकने के लिए पूर्वाधार निर्माण की योजना है। युवाओं को जागरूक कर गाँव की ठेठ भाषा और मारुनी नृत्य के संरक्षण का प्रयास किया जाएगा।

उन्होंने कहा, ‘‘यहाँ बसाई-सराई कम है और अधिकांश लोग यहीं रहते हैं। गाँव में आय अर्जित करने से छोड़कर जाने की स्थिति ना बने, इस उद्देश्य से कार्यरत हूँ।’’

होमस्टे न होता तो लोग गाँव छोड़ देते, लेकिन अब यह स्थान जितना सुंदर है, सोशल मीडिया के माध्यम से देश-विदेश तक इसकी पहचान करने का कार्य बाकी है।

विदेश में कमाई को गाँव में निवेश करने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए भी चर्चा हो रही है, अध्यक्ष आले ने बताया।

पृथ्वी राजमार्ग के छिर्का से रामकोट होते हुए बन्दीपुर और वहाँ से रामकोट होते हुए छिर्का मार्ग निर्धारण का भी प्रयास चल रहा है। सड़क पूर्वाधार होने से बाहरी पर्यटकों को लाना आसान होगा।

पूर्वाधार का विकास हो रहा है

गण्डकी प्रदेश सरकार और बन्दीपुर गाउँपालिका होमस्टे संचालन के साथ पूर्वाधार विकास में भी रामकोट के लिए सहयोग कर रही हैं। आवश्यक प्रशिक्षण, पत्थर लगाना, पेयजल और बिजली की सुविधा में भी सुधार लाया गया है।

चुली डाँडा की गोद में रामकोट गाँव

बन्दीपुर गाउँपालिकाके अध्यक्ष सुरेन्द्रबहादुर थापा ने बताया कि २०८१ साल में गलियों में पत्थर लगाने का कार्य पूरा हो चुका है और सभी घरों में पत्थर लगाने एवं पानी की निकासी का काम जारी है। मेट्रेस, चादर और तकिये जैसी सामग्री भी खरीदी गई है और वितरण में है।

होमस्टे के लिए बन्दीपुर और ब्यास नगरपालिका के स्थानों को होमस्टे सर्किट में जोड़कर रामकोट में एक रात के ठहरने की योजना बनाई जा रही है, उन्होंने बताया।

गाउँपालिका प्रचार-प्रसार, वीडियोग्राफी निर्माण और साइकिल यात्रा जैसे कार्यक्रमों में भी सहयोग कर रही है। सेराटार मार्ग का इस वर्ष ७ सौ मीटर सडक पक्की किया जाएगा और बाकी के लिए प्रदेश एवं केंद्र सरकार से अनुरोध किया गया है।