समाचार सारांश
संपादकीय रूप से समीक्षा किया गया।
- विकास निर्माण परियोजनाओं के समय पर पूरा न होने से समस्या बढ़ी है, जिसे सरकार ने सार्वजनिक खरिद कानून के अध्यादेश से संशोधित किया है।
- संशोधित कानून में 30 प्रतिशत से कम मूल्य की बोली को ‘एबनॉर्मल’ मानने का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य कम दाम की बोली को रोकना है।
- विवाद रहित ठेका वितरण और गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित करने के लिए औसत बोली विधि लागू करने का सुझाव दिया गया है।
विकास निर्माण के छोटे-बड़े परियोजनाएं समय पर पूरी न होने की वजह से आम जनता परेशान है। गत फागुन 21 को हुए चुनाव में यह विषय एक प्रमुख चुनावी एजेंडा के रूप में उभरा। चुनाव में भाग लेने वाले उम्मीदवारों ने इस समस्या को उजागर करते हुए विभिन्न मत व्यक्त किए।
विशेषकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गगनकुमार थापा और रास्वपाका वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह ने इस मुद्दे पर काफी ध्यान आकर्षित किया। समय पर परियोजनाएं पूरी न होने से संबंधित पक्षों द्वारा कुछ गलत नियत के कारण कानूनी अड़चनें भी आईं, इसलिए कानून में संशोधन की आवश्यकता बताई गई। गगन थापा ने इसे बताया। वहीं बालेन्द्र शाह ने कहा, ’20 वर्ष से बंद पड़े रास्ते जो 2 वर्ष में बनने थे, उन्हें तुरंत बनाना चाहिए। चाहे पेड़ से बांध कर हो, रास्ते पर सोने से हो या खोर में रखकर, रास्ता बनना चाहिए।’
मतदाता ने रास्वपा को मजबूत जनमत दिया और बालेन्द्र शाह लगभग दो तिहाई बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने। इस मजबूत नेतृत्व ने विकास निर्माण को गति देने के उद्देश्य से सार्वजनिक खरिद कानून के अध्यादेश से संशोधन किया।
यह एक सकारात्मक पहल है, पर सवाल यह है कि क्या यह समस्या का पूर्ण समाधान कर पाई है? इस विषय का विस्तार से विश्लेषण यहाँ प्रस्तुत है।
नेपाल की ठेका प्रणाली में कुछ मौलिक बाधाएं हैं: न्यूनतम मूल्य बोली लगाना, निर्माण व्यवसायियों के पास पूंजी का अभाव, समय पर डिजाइन या ड्रॉइंग की मंजूरी न मिलना,और बजट सुनिश्चित न होने पर ठेका समझौता करना।
यदि इन समस्याओं का आंशिक समाधान किया जाए तो निर्माण कार्य के समय पर पूरा न होने की समस्या कम हो सकती है। हाल ही में संशोधित सार्वजनिक खरिद कानून ने निर्माण क्षेत्र में लंबी देरी और कम दाम की बोली (लो प्राइस बिडिंग) को खत्म करने का प्रयास किया है।
अगर निर्माण का काम समय पर न हो तो सरकार और ईमानदार व्यवसायी दोनों की आलोचना होती है।
निर्माण शुरू करने के लिए बजट सुनिश्चितता, स्थल की पूरी सफाई एवं उपलब्धता, मुआवजा वितरण और पर्यावरण अनुमोदन के बाद ही ठेका खोलने की व्यवस्था हुई है, जिससे कार्य की रुकावट कम होगी। यह व्यवस्था पहले भी थी और वर्तमान में भी समान बनी हुई है।
ठेका सूचना अवधि कम करने और स्थानीय सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देना संभव है, लेकिन केवल इन्हीं से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा।
नई व्यवस्था में 30 प्रतिशत से कम कीमत वाली बोली को ‘एबनॉर्मल’ कहा जाएगा। पूरी तरह से बोली रद्द नहीं भी की जाए, तो व्यवसायी को तकनीकी और वित्तीय स्पष्टीकरण देना होगा, और मूल्यांकन समिति को संतोषजनक न मिलने पर बोली रद्द करने का अधिकार होगा। क्या यह पर्याप्त होगा?

पहले भी अतिरिक्त गारंटी देने की व्यवस्था थी। कम बोली लगाने वाले व्यवसायी को केवल स्पष्टीकरण ही नहीं, अतिरिक्त गारंटी भी देनी पड़ती थी, जिससे लागत बढ़ती थी। ठेका रद्द करने पर सरकार समय पर काम पूरा नहीं कर पाती और समय पर पूर्ण न होने वाले कार्यों से मिलने वाले अपेक्षित लाभ नहीं होते, इसलिए लो प्राइस बिडिंग रोकने यह तरीका प्रभावी नहीं हो पाता। तो अब क्या किया जा सकता है? आइए इस पर चर्चा करें।
लो प्राइस बिडिंग को रोकने के कुछ उपाय
1. औसत बोली विधि (एवरेज बिड मेथड): इस प्रणाली में सबसे कम बोली लगाने वाले को ठेका देने की बजाय सभी बोली और लागत अनुमान के औसत के करीब प्रस्ताव देने वाले व्यवसायी को ठेका दिया जाता है। इससे ‘सुसाइड बोली’ का प्रोत्साहन कम होता है। यदि कोई अत्यधिक कम बोली देता है, तो वह औसत से दूर हो जाता है, जिससे ठेका मिलने की संभावना घट जाती है।
इसका प्रयोग ताइवान, पेरू, फ्लोरिडा में होता है और इतिहास में इटली के कुछ हिस्सों में भी देखा गया है।
अन्य अंतरराष्ट्रीय अभ्यासों में यूरोपीय संघ के ‘मस्ट इकनोमिकल एडवांटेज टेंडर’ (MEAT) विधि भी है, जहां सबसे कम कीमत पर नहीं बल्कि ‘सर्वोत्तम मूल्य’ पर ठेका दिया जाता है, जिसमें वित्तीय, तकनीकी योग्यता, विधि, पर्यावरणीय प्रभाव और परियोजना के जीवनकाल खर्च शामिल होते हैं।
सरकार ने सार्वजनिक खरिद कानून संशोधन के माध्यम से विकास निर्माण में गति देने का प्रयास किया है, लेकिन सुधार और आवश्यक है।
2. डायनेमिक एबनॉर्मली लो टेंडर (ALT) सीमा: स्थिर 30 प्रतिशत के बजाय कुछ देशों में सांख्यिकीय विधि प्रयोग की जाती है। सभी बोली का माध्य और एक मानक विचलन के नीचे आने वाली बोली को स्वतः चिन्हित कर कड़ी जांच या अस्वीकृति की जाती है।
3. गुणवत्ता और लागत-आधारित चयन (QCBS)/टू-लिफाफा प्रणाली: बोलीदाता दो बंद लिफाफे जमा करता है – एक तकनीकी और दूसरा आर्थिक। तकनीकी प्रस्ताव का मूल्यांकन होने के बाद योग्य व्यवसायी के आर्थिक लिफाफे खोले जाते हैं और अंतिम निर्णय संयुक्त स्कोर पर आधारित होता है। इससे न केवल लागत बल्कि गुणवत्ता भी सुनिश्चित होती है। यह विधि विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक की कुछ परियोजनाओं में नेपाल में भी लागू होती है।
नेपाल में परियोजना प्रबंधन के संदर्भ में औसत बोली विधि अधिक उपयुक्त प्रतीत होती है। अन्य विधियों में तकनीकी मूल्यांकन जटिल तथा मानवीय प्रभाव अधिक होता है, जिससे गड़बड़ी की संभावना बढ़ जाती है।
उदाहरण के लिए, यदि लागत अनुमान 2000 रुपए हो और चार व्यवसायी 1800, 1600, 1950, और 1400 रुपए की बोली लगाते हैं, तो वर्तमान प्रणाली के अनुसार 1400 की बोली के लिए अतिरिक्त गारंटी मांगी जाती है, जिससे लागत बढ़ती है और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
औसत बोली विधि में औसत 1750 रुपए होता है, इसलिए 1600 रुपए प्रस्ताव देने वाले व्यवसायी को ठेका मिलता है जिससे अपेक्षाकृत गुणवत्ता बेहतर होती है और विवाद कम होते हैं।
विकास परियोजना सरकार, व्यवसायी और जनता सभी की साझा जिम्मेदारी है।
नेपाल में समस्या केवल कम बोली की नहीं, बल्कि सरकारी निर्णय, जैसे भेरियेशन आदेश से भी जुड़ी है। भेरियेशन भी औसत मूल्य के भीतर करना होगा, संबंधित इंजीनियर या कार्यालय प्रमुख को समय पर निर्णय लेना होगा, और निर्माणकर्ता को 10 दिनों के भीतर लिखित सूचना देनी होगी। ऐसा नियम जोड़ा जाए तो अध्यादेश पूर्ण होगा।
2000 से अधिक के भेरियेशन को मंत्रिपरिषद द्वारा निर्णय लेना होगा, लेकिन राष्ट्रीय सतर्कता केंद्र द्वारा जिम्मेदार तकनीकी ऑडिटर के जरिए अनिवार्य ऑडिट के बाद ही लागू किया जाएगा ताकि पारदर्शिता, त्वरित निर्णय और अनियमितता रोकी जा सके।
निर्माण व्यवसायी को एक और समस्या है- संचालन पूंजी का अभाव। काम चल रहा हो तब भी व्यवसायी काम नहीं कर पाते, संचालन बाधित होता है, बिल नहीं बनता, भुगतान में देरी होती है और परियोजना अधर में लटकी रहती है।
सरकार यदि बैंक गारंटी के आधार पर पूर्व बिल का 70 प्रतिशत रकम उस परियोजना पर काम करने के लिए व्यवसायी को पहले ही दे दे तो समस्या हल हो सकती है।
परियोजना सरकार, व्यवसायी और जनता की है। जब तक सभी ईमानदार और जवाबदेह नहीं होंगे, परियोजनाएं समय पर समाप्त नहीं होंगी। सरकार को व्यवसायियों को सुविधा प्रदान करनी होगी, व्यवसायी को ईमानदारी से काम करना होगा, और जनता को काम में बाधा नहीं डालनी चाहिए तभी परियोजनाएं सफल होंगी और देश का विकास होगा।
(लेखक: इंजीनियर रोहित पौडेल, ऊर्जा, निर्माण एवं शिक्षा क्षेत्र में सक्रिय)




