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झपट रावल ने कहा: प्रधानमंत्री का संसद आना ऐच्छिक नहीं संवैधानिक दायित्व है

समाचार सारांश

समीक्षा पश्चात तैयार।

  • पूर्वसांसद झपट रावल ने संसद में कहा कि प्रधानमंत्री का जाना ऐच्छिक नहीं बल्कि संवैधानिक दायित्व है।
  • रावल ने संविधान की धारा ७६(१०) के अनुसार प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद प्रतिनिधिसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते हैं, यह बताया।
  • उन्होंने संसद को सरकार से सवाल करने, समीक्षा करने और जवाबदेही बनाए रखने वाला सर्वोच्च जनप्रतिनिधि संस्थान बताया।

३० वैशाख, काठमांडू। पूर्वसांसद झपट रावल ने संसद में प्रधानमंत्री के जाना ऐच्छिक विषय नहीं होने की बात कही है।

उनके अनुसार नेपाल के संविधान ने प्रधानमंत्री को केवल सरकार चलाने वाला व्यक्ति नहीं माना है, बल्कि उन्हें प्रतिनिधिसभा के प्रति पूर्ण रूप से उत्तरदायी कार्यकारी नेतृत्व के रूप में स्थापित किया है।

सामाजिक मीडिया पर रावल लिखते हैं, ‘संविधान की धारा ७६(१०) के अनुसार प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद प्रतिनिधिसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायी होते हैं। इसका मतलब है कि राज्य सत्ता किसी व्यक्ति की इच्छा या पद के अहंकार से नहीं, बल्कि जनता द्वारा निर्वाचित संसद के माध्यम से संचालित होती है।’

उनके नजरिए में लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं है, बल्कि सरकार को सवाल करने, समीक्षा करने, नियंत्रण करने और आवश्यकतानुसार संशोधन करने वाला सर्वोच्च जनप्रतिनिधि संस्था है।

वे लिखते हैं, ‘इसलिए संसद में उपस्थित होना, उठाए गए सवालों का जवाब देना, नीति और कार्यक्रम का बचाव करना और आलोचना का सामना करना प्रधानमंत्री की इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।’

प्रतिनिधिसभा संचालन नियमावली की धारा ३८ और ५६ का मर्म भी यही बताया उन्होंने।

‘संसद में उठे मुद्दों पर प्रधानमंत्री या संबंधित मंत्री को स्पष्ट उत्तर देना लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का आधार है,’ उन्होंने आगे कहा, ‘संसद को औपचारिकता मानना या नजरअंदाज करना अंततः जनमत और संवैधानिक संस्कार को कमजोर करना है।’

बहुमत और शक्ति के सहारे जवाबदेही से बचने की छूट संविधान और कानून किसी को नहीं देते, साथ ही उन्होंने कहा, ‘राज्य के कोई भी संस्थान कानून से ऊपर नहीं हो सकते और न ही होना चाहिए।’

कानून की सर्वोच्चता लोकतांत्रिक राज्य का आधार है और इसी संवैधानिक एवं कानूनी व्यवस्था के तहत वर्तमान संसद बना है, इस ओर उन्होंने सरकार का ध्यान आकृष्ट किया।

वे लिखते हैं, ‘प्रधानमंत्री शक्ति के केंद्र हो सकते हैं, लेकिन संविधान से ऊपर नहीं हो सकते। लोकतंत्र में पद से बड़ी जवाबदेही होती है। संसद के प्रति सम्मान ही संविधान के प्रति सम्मान है और संविधान के बिना लोकतंत्र संरचनात्मक रूप से तो बन सकता है, पर व्यवहार में कमजोर होगा।’