
२ जेठ, तेह्रथुम। प्रकृति की पूजा करने और पत्थर को ऐतिहासिक प्रतीक मानने वाली लिम्बु सभ्यता। यहाँ की मौलिकता, संस्कृति और इतिहास को नई पीढ़ी तक संरक्षित करने के उद्देश्य से तेह्रथुम के लालीगुराँस नगरपालिका द्वारा निर्मित ‘चो?लुङ पार्क’ आज पूर्वी नेपाल की एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक और पर्यटक स्थल बन चुका है। पत्थर से बने इस पार्क को अब केवल एक घुमने की जगह ही नहीं बल्कि लिम्बु समुदाय के इतिहास, जीवनशैली और सभ्यता का जीवंत संग्रहालय के रूप में स्थापित किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर पार्क की तस्वीरें और वीडियो वायरल होने के बाद यहाँ प्रतिदिन सैकड़ों आंतरिक एवं बाहरी पर्यटक आने लगे हैं। पार्क में आने वाले पर्यटकों की बढ़ती संख्या ने इसे नगरपालिका की महत्वपूर्ण आमदनी का स्रोत भी बना दिया है।
लिम्बु समुदाय प्रकृति पूजक संस्कृति के लोगों के रूप में परिचित हैं। जंगल, नदी, मिट्टी और पत्थर उनके जीवन से गहरे जुड़े हैं। विशेष रूप से ‘लुङ’ अर्थात् पत्थर लिम्बु सभ्यता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों में पत्थर लगाने की परंपरा लिम्बु समाज में प्राचीन काल से मौजूद है। नवजात शिशु के जन्म, विवाह, कुल पूजा, न्याय–न्यायालय और अंतिम संस्कार में पत्थर का उपयोग होता है। इसी मौलिक सभ्यता को संरक्षित करते हुए नई पीढ़ी को परिचित कराने के उद्देश्य से चो?लुङ पार्क का निर्माण किया गया है। ‘चो?लुङ’ लिम्बुभाषा का शब्द है; ‘चो’ का अर्थ लक्ष्य और ‘लुङ’ का अर्थ पत्थर। इसका मतलब ‘चो?लुङ’ है लक्ष्य प्राप्ति का प्रतीकात्मक पत्थर।
पार्क में प्रवेश करते ही विभिन्न आकारों के ऊंचे-ऊंचे पत्थर के स्तंभ आगंतुकों का स्वागत करते हैं। ये पत्थर केवल सजावट का हिस्सा नहीं बल्कि लिम्बु सभ्यता का मौन इतिहास हैं। पार्क के विभिन्न हिस्सों में लगे पत्थर के स्तंभ प्राचीन लिम्बु समाज की सामाजिक संरचना, न्याय प्रणाली और सांस्कृतिक प्रथाओं को दर्शाते हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार कभी-कभी गांव में विवाद निपटाने, सामाजिक निर्णय लेने या समझौता करने पर पत्थर लगाने की परंपरा थी। अर्जुन माबोहाङ के अनुसार, लिम्बु समुदाय की ऐतिहासिक पहचान खत्म होती जा रही थी, इसलिए पार्क निर्माण की अवधारणा सामने आई। उन्होंने कहा, ‘आज के जीवनशैली, न्याय–न्यायालय और सामाजिक व्यवस्था को पत्थर के माध्यम से अभिव्यक्त करने की परंपरा धूमिल हो रही थी। इसे संरक्षित करते हुए पर्यटन से जोड़ने के उद्देश्य से पार्क बनाया गया है। अब यह पार्क नगरपालिका की आमदनी का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है।’
नगरपालिका के अनुसार, पार्क के दर्शनार्थी द्वारा भुगतान किए जाने वाले टिकट शुल्क से सरकार को आय हो रही है। इससे पार्क न केवल सांस्कृतिक केंद्र बनकर उभरा है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण परियोजना भी बन गया है। हाल ही में तेह्रथुम, धनकुटा, पाँचथर, इलाम, झापा, मोरङ, सुनसरी सहित अन्य जिलों के साथ भारत के सिक्किम और दार्जिलिङ क्षेत्र से भी पर्यटक आने लगे हैं। मिक्लाजुङ गाउँपालिका से भ्रमण के लिए आए उपाध्यक्ष सन्तोष सेर्मा लिम्बु ने कहा कि सोशल मीडिया पर केवल देखे गए पार्क को सीधे देखने पर अनुभव अलग था। उन्होंने कहा, ‘यहाँ आकर समझ में आया कि यह केवल एक पार्क नहीं बल्कि एक जीवंत इतिहास है। लिम्बु सभ्यता को समझने वालों के लिए यह एक उत्कृष्ट स्थल साबित हुआ है।’





