
फिर एक बार वही घटना दोहराई गई। आईसीसी क्रिकेट विश्वकप लीग २ के स्कॉटलैंड के खिलाफ मैच में गुलशन झा अंतिम समय में दबाव झेलने में असफल रहे, जिससे नेपाल दो रन से हार गया। खास बात यह है कि हाल के कुछ बड़े अंतरराष्ट्रीय मैचों में हार के समय भी बल्लेबाजी क्रीज पर गुलशन झा ही थे। इसलिए उनकी चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। समर्थक आलोचना और समर्थन दोनों ही पक्षों में बहस कर रहे हैं।
दरअसल क्रिकेट का सुकून ही तब है जब मैच अंतिम ओवर तक जाता है। हालांकि बार-बार ऐसी गलतियां होने पर यह सवाल उठता है – नेपाली खिलाड़ी बड़े टीमों के खिलाफ दबाव क्यों सहन नहीं कर पा रहे? राष्ट्रीय टीम के पूर्व खिलाड़ी दीपेन्द्र चौधरी कहते हैं, “खिलाड़ियों द्वारा उस वक्त लिए गए निर्णय बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इसे ‘निर्णय क्षमता’ कहा जाता है।” नेपाली खिलाड़ियों की दबाव सहने और सही समय पर निर्णय लेने की क्षमता में कहाँ कमी आ रही है, यही आज मुख्य बहस का विषय बना हुआ है।
गुलशन के संदर्भ में बात करें तो पिछले तीन बड़े मैचों को देखें। 2024 में अमेरिका/वेस्ट इंडीज टी20 विश्वकप में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ केवल एक रन की हार नेपाली क्रिकेट प्रशंसकों के लिए कभी न भूलने वाला अनुभव रहा। उस समय क्रीज पर गुलशन ही थे। एक रन लेने का मौका मिलने के बावजूद वह अत्यंत तनावपूर्ण क्षण में चूक गए थे। दो महीने पहले मुंबई टी20 विश्वकप में इंग्लैंड के खिलाफ 4 रन की हार भी एक बड़ा उदाहरण है, जिसमें लोकेश बम अंतिम समय में दबाव झेलने में विफल रहे। उस मैच में करण केसी ने स्ट्राइक लोकेश को दी और पिछली गेंद पर गुलशन झा बोल्ड हो गए थे।





