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प्रि-मनसून में वर्षा सामान्य से तीन गुना अधिक, मानसून में पड़ सकता है सूखे का खतरा

समाचार समीक्षा के बाद तैयार किया गया। चैत से वैशाख तक नेपाल में प्रि-मनसून के दौरान असामान्य रूप से लगातार वर्षा, ओले और हिमपात हुआ है, जिससे ठंडे मौसम का अनुभव किया गया है। पश्चिमी वायु प्रणाली की सक्रियता के कारण प्रि-मनसून में सामान्य से तीन गुना अधिक बारिश हुई है और वैशाख के अंत तक 230 मिमी पानी गिर चुका है। मौसम विशेषज्ञों ने एल नीनो प्रभाव के कारण मानसून के दौरान कम वर्षा और अधिक गर्मी होने का अनुमान लगाया है और सतर्क रहने की सलाह दी है। 3 जेठ, काठमांडू। सामान्यतः चैत–वैशाख नेपाल में अत्यधिक गर्मी के मौसम के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस वर्ष हालात अलग नजर आ रहे हैं। वर्षाात्कार शुरु हो चुका है, लगातार बारिश होने से ठंडक महसूस हो रही है। गर्मी होने के बावजूद जैकेट पहननी पड़ रही है, जो असामान्य अनुभव है। लगातार बारिश होने का कारण समझने के लिए समुंद्र तक जाना होगा। मौसम विज्ञानों के अनुसार इस वर्ष हुई वर्षा प्रि-मनसून अर्थात् मानसून पूर्व के मौसमी प्रणाली की सक्रियता के कारण है। प्रि-मनसून मध्य फागुन से मध्य जेठ तक होता है, जो सामान्यतः गर्म मौसम का होता है, लेकिन इस वर्ष वैशाख तक बार-बार वर्षा, ओले और बर्फबारी हुई है। कुछ स्थानों पर तूफान और बिजली गिरने की घटनाएं भी हुई हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति जेठ महीने तक जारी रह सकती है। वर्षा मुख्यतः तीन कारणों से होती है: सक्रिय पश्चिमी वायु, स्थानीय वायु और बंगाल की खाड़ी से आने वाली जलवाष्पयुक्त हवा का प्रभाव। पश्चिमी वायु (वेस्टर्न डिस्टर्बेन्स) पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली हवा की प्रणाली है जो प्रि-मनसून और ठंड के मौसम में नेपाल में वर्षा और हिमपात कराती है। यह भूमध्यसागर क्षेत्र से होकर तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान होते हुए दक्षिण एशिया में फैलती है। यह ठंडी और नम हवा हिमालय क्षेत्र में पहुंचकर बादल और वर्षा का कारण बनती है, कभी-कभार ओला और आंधी भी लाती है। इस वर्ष सर्दियों के खत्म होते ही प्रि-मनसून में भी पश्चिमी वायु सक्रिय रही जिसके कारण हिमपात और ओले गिरने की घटनाएं हुई हैं, यह बात त्रिभुवन विश्वविद्यालय जल तथा मौसम विभाग के सहप्राध्यापक मदन सिग्देल ने बताई। उन्होंने चैत–वैशाख में बार-बार वर्षा और ठंडक महसूस होने का कारण बताते हुए कहा, ‘सर्दियों के बाद पश्चिमी वायु की सक्रियता अधिक होने के साथ ही स्थानीय वायु और जलवाष्प का पुनरावर्तन भी बढ़ा जिससे वर्षा की मात्रा बढ़ गई।’ मौसमविद् उज्ज्वल उपाध्याय के अनुसार फिलीपींस सागर में बने बड़े तूफान (हरिकेन) के कारण बनी वायुमंडलीय प्रणाली ने नेपाल समेत इंडोनेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड, लाओस और वियतनाम तक व्यापक क्षेत्र में वर्षा की। पश्चिमी वायु का प्रभाव जेठ तक बना रहेगा और नेपाल में वर्षा जारी रहने का अनुमान है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय जल तथा मौसम विभाग के सहप्राध्यापक डॉ. विनोद पोखरेल ने भी जेठ माह के कुछ दिनों तक बारिश होने की संभावना जताई है। बादलों और वर्षा के कारण सूर्य की किरणें पृथ्वी तक नहीं पहुंच पातीं जिससे पृथ्वी जल्दी गर्म नहीं हो पाती, इसलिए ठंडक महसूस होती है। नेपाल में भी ऐसी स्थिति देखी गई है। कुछ दिन पहले दोपहर में धूप के दौरान भी बादलों के कारण बारिश हुई और रात को आकाश साफ होता रहा। दिन में सूरज की गर्मी कम होने और रात को तेज ठंड होने से चैत–वैशाख में भी ठंडक बनी रहती है, मौसमविद् बताते हैं। ‘सबसे ज्यादा धूप आने और तापमान बढ़ने के समय भी घने बादल और आंधी की वजह से सूर्य की गर्मी जमीन तक नहीं पहुंच पाती, जिससे दिन का तापमान कम रहता है,’ उपाध्याय कहते हैं। ‘रात को आकाश साफ होने से जमीन और वातावरण का तापमान जल्दी गिरने के कारण सुबह और रात में अधिक ठंड लगती है।’

इस वर्ष प्रि-मनसून में कितनी वर्षा हुई?
प्रि-मनसून वह संक्रमणकाल होता है जो सर्दी के बाद और मानसून शुरू होने से पहले आता है। जल तथा मौसम विभाग के अनुसार मध्य फागुन से मध्य जेठ तक नेपाल में औसतन 200 से 230 मिमी वर्षा होती है, क्षेत्र के अनुसार भिन्नता रहती है। काठमांडू में प्रि-मनसून की औसत वर्षा लगभग 100 मिमी होती है, लेकिन इस वर्ष वैशाख के अंत तक 230 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई है, जो सामान्य वर्ष से लगभग तीन गुना अधिक है। जेठ माह में भी वर्षा होने की संभावना के कारण इस वर्ष की प्रि-मनसून अवधि में वर्षा मात्रा और बढ़नी तय है। उपाध्याय ने काठमांडू के आंकड़े पेश करते हुए कहा, ‘पिछले 45 वर्षों के आंकड़ों के अनुसार वैशाख और जेठ महीनों में औसत 100 मिमी वर्षा होती है, जबकि इस वर्ष वैशाख 25 तक 230 मिमी वर्षा हुई है। वैशाख अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए वर्षा तीन गुना तक पहुंच सकती है।’ 1981 से 2025 तक के आंकड़ों से प्रि-मनसून में वर्षा के उतार-चढ़ाव स्पष्ट होते हैं। मौसम विशेषज्ञ अशोक बख्रेल के अनुसार 1990 में सबसे अधिक 332.31 मिमी वर्षा हुई थी, इसके बाद 2000 में 322.85 मिमी, 2021 में 317.9 मिमी और 2020 में 315.59 मिमी वर्षा दर्ज हुई है। 2025 में भी 274.21 मिमी वर्षा हुई थी। सबसे कम वर्षा 1992 में 138.01 मिमी दर्ज हुई। अन्य कम वर्षा वाले वर्षों में 1996 (141.56 मिमी), 2014 (154.91 मिमी) और 1995 (162.42 मिमी) शामिल हैं। ‘इन आंकड़ों से प्रि-मनसून वर्षा में तीव्र उतार-चढ़ाव साफ दिखता है,’ बख्रेल कहते हैं। उन्होंने बताया कि प्रि-मनसून में पूर्वी नेपाल पश्चिमी हिस्से की तुलना में दो गुना से भी ज़्यादा वर्षा प्राप्त करता है। आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम नेपाल में औसतन 133.7 मिमी, मध्य नेपाल में 250.9 मिमी और पूर्वी नेपाल में 291.3 मिमी वर्षा होती है। इसका मुख्य कारण बंगाल की खाड़ी से आने वाली जलवाष्पयुक्त हवा और हिमालयी भौगोलिक संरचना को मौसम विशेषज्ञ मानते हैं।

फायदे और नुकसान
चैत–वैशाख में सामान्यत: पश्चिमी वायु प्रणाली हिमालय और पहाड़ी इलाकों में वर्षा और हिमपात कराती है। प्रि-मनसून की यह वर्षा कृषि, पेयजल उपलब्धता, वनाग्नि और आपदा जोखिम को सीधे प्रभावित करती है। विशेष भाव से मक्का और धान की बुवाई की तैयारी इस समय होती है, इसलिए इस वर्षा को कृषि के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार लगातार वर्षा और तापमान में गिरावट से ठहराव आया है और वनाग्नि की घटनाएं कम हुई हैं। लेकिन इसे पूरी तरह सकारात्मक नहीं कहा जा सकता। लगातार वर्षा से गेहूं, मसूर जैसे फसलों की कटाई में किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। नेपाल कृषि अनुसंधान परिषद (नार्क) के तकनीकी अधिकारी रामेश्वर रिमाल के अनुसार लगातार वर्षा के कारण पूर्वी तराई के कुछ जिलों के किसान मुग और जूट की खेती के लिए ज़मीन भी तैयार नहीं कर पाए हैं। ओले और आंधी ने मक्का, केला सहित फलों और सब्जियों की फसलों को नुकसान पहुंचाया है। विशेषतः वैशाख–जेठ में अत्यधिक वर्षा से मिट्टी जल्दी गीली होती है, जिसके कारण आगामी मानसून में भू-स्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। मौसम विज्ञानी बताते हैं कि प्रि-मनसून की सक्रियता या निष्क्रियता के आधार पर मानसून की वर्षा कम या ज्यादा होगी, यह निश्चित नहीं है। प्रशांत महासागर के तापमान, हिंद महासागर की स्थिति और जेट स्ट्रीम जैसे वैश्विक प्रणाली नेपाल के मानसून के स्वरूप निर्धारित करती हैं। वर्तमान में प्रशांत महासागर का तापमान औसत से अधिक यानी एल नीनो स्थिति में है, जबकि हिंद महासागर का तापमान सामान्य है। जल तथा मौसम विभाग ने इस वर्ष मानसून में सामान्यत: कम वर्षा और अधिक गर्मी की संभावना जताई है। नेपाल के कुछ इलाकों में सामान्य वर्षा होगी, लेकिन अधिकांश स्थानों पर औसत से कम बारिश की संभावना बताई गई है। मौसम विशेषज्ञ सुदर्शन हुमागाईं कहते हैं कि अनिश्चित और संवेदनशील मौसम के कारण मौसम के स्वरूप में बदलाव आ रहा है। कहीं बारिश समय पर नहीं होती, कहीं अत्यधिक होती है और कहीं सूखा पड़ता है। पिछली बार मधेस में मानसून के दौरान सूखा पड़ा था और सूखा ग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया था। पूर्वी नेपाल में मानसून में देरी से गहन वर्षा और भूस्खलन के कारण बड़ी विपत्ति आई थी। जल तथा मौसम विभाग के वरिष्ठ विशेषज्ञ मीनकुमार अर्याल ने कहा है कि इस वर्ष भी ऐसी स्थिति आ सकती है, इसलिए सतर्क रहना आवश्यक है। उनका कहना है, ‘मानसून शुरू होने पर कुछ दिन सूखा भी रह सकता है और कुछ जगह भारी वर्षा भी हो सकती है। यह नुकसान भी पहुँचा सकती है इसलिए हमेशा सावधान रहना जरूरी है।’ मौसम विज्ञानी डॉ. विनोद पोखरेल ने बताया कि इस वर्ष एल नीनो की स्थिति काफी ‘डरावनी’ है और इसका प्रभाव दक्षिण एशिया में अकाल की संभावना बढ़ा सकता है। उन्होंने फेसबुक पर लिखा है, ‘आगामी 6 महीनों के मौसम पूर्वानुमान के अनुसार यह स्थिति गंभीर समस्या पैदा कर सकती है। एल नीनो दक्षिण एशिया में अकाल ला सकता है।’ विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षा की अनिश्चितता और अस्थिरता जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है। इसलिए जलवायु अनुकूलन योजना बनाने की सलाह दी जा रही है। मौसम विशेषज्ञ मदन सिग्देल ने कहा कि हाल के मौसमी घटनाएं नेपाल के मौसम प्रणालियों को और अधिक अस्थिर और संवेदनशील बना रही हैं। कुछ लोग इसे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानते हैं, लेकिन सिग्देल कहते हैं, ‘सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को प्रमाणित करना जरूरी है, फिर हमारी पारंपरिक धारणाओं और योजनाओं को संशोधित करके उसी के अनुसार कार्यक्रम बनाना चाहिए।’