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पराल की आग आग: नई फिल्म का विमोचन

नेपाली साहित्य के प्रथम आधुनिक कथाकार गुरुप्रसाद मैनाली के ‘नासो’ कथा संग्रह में सम्मिलित ‘पराल की आग’ कहानी पर आधारित फिल्म का नया संस्करण हाल प्रदर्शन में है। चामे और गौंथली की कथा प्रस्तुत करने वाली यह पारिवारिक फिल्म पति–पत्नी के बीच के द्वंद्व, विवाद, वाद-विवाद और अस्थायी मारपीट को पारंपरिक मान्यता के अनुसार क्षणभंगुर बताती है और जोड़ी को अंततः मेल-मिलाप करने पर जोर देती है। यह कहानी सदियों से चली आ रही कहावत ‘पति-पत्नी के झगड़े पराल की आग की तरह होते हैं’ को स्वीकार करती है। लेकिन क्या पति–पत्नी के संबंध केवल इतना सीमित होते हैं? क्या झगड़े, यातना, शारीरिक हिंसा, गाली-गलौज, अपमान और तिरस्कार के बावजूद वे फिर से प्रेमपूर्ण, स्नेही, कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित हो सकते हैं? यह क्या संभव है? आज के दौर में यह प्रश्न नया आयाम ले चुका है।

कथाकार मैनाली ने जब यह कहानी लिखी, उस समय सामाजिक-राजनैतिक परिस्थिति ऐसी थी जहां पति-पत्नी के विवादों को पराल की आग समझा जाता था। वर्तमान स्थिति में देखें तो क्या अभी भी वही स्थिति बनी हुई है? नेपाली वर्ष २०२२ में प्रकाशित ‘नासो’ कथा संग्रह में मैनाली ने ९० के दशक की शुरुआत से लेकर २००७ के बाद लिखी गई ग्यारह कहानियां शामिल की हैं, जिनमें ‘पराल की आग’ भी है। नेपाली वर्ष २०४० में इन्द्रबहादुर राई ने ‘कठपुतली का मन’ नामक कथा संग्रह प्रकाशित किया, जिसमें शीर्षक कथा में चार उप-कथाएँ हैं और उनकी जड़ें कुछ हिस्सों में चामे और गौंथली की कहानियों से मिलती-जुलती दिखती हैं।

इन कहानियों में कुछ पात्रों के संबंधों की असुरक्षा पत्ते की तरह हवा में हिलती दिखाई देती है, जबकि कुछ ने आत्महत्या का प्रयास भी किया है। एक कथा में पंचायती काल में शादी के बाद पत्नी ने आत्महत्या कर ली, तो कहीं किशोरावस्था में विवाह होने और फिर दो बच्चों की मां का रिश्तों से टूट कर जीवन का अंत हो गया। दंपती पात्रों में कुछ प्रमुख और कुछ गौण भूमिका में हैं। कथाकार राई ने अपनी कहानियों में दंपतियों के झगड़ों को केवल पराल की आग नहीं बल्कि उससे कुछ अधिक जटिल प्रमाणित किया है। मैनाली के द्वारा कही गई पुरानी मान्यता ‘पति-पत्नी का झगड़ा पराल की आग है’ को राई ने लगभग चार दशकों बाद चुनौती दी है कि यह केवल पराल की आग नहीं है।

अब दाम्पत्य कलह केवल पराल की आग नहीं बल्कि सामाजिक वास्तविकता को समझने में हमें वर्षों लग गए। नेपाली वर्ष २०४० में प्रकाशित कथाओं ने इस बात को स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में केवल पुरुष दोषी नहीं होते, महिलाओं की भी कुछ भूमिका होती है। यद्यपि समय बहुत बदल चुका है, हम अभी भी चामे और गौंथली की वही पुरानी कहानी दोहरा रहे हैं। संवाद ‘पत्नी से जूझना होगा क्या?’ आज के नवयुवकों को अर्थपूर्ण लगता है या नहीं, यह प्रश्न सामने आता है।

‘पराल की आग’ जैसी कहानियां भूतकाल की हैं। क्या आज भी इन्हीं कथाओं और उनके भावनात्मक पक्षों को बिना परिवर्तन स्वीकार करना चाहिए? जब ‘पराल की आग’ फिल्म बनाई गई, तो निर्माता, निर्देशक और कलाकारों ने क्या इन्द्रबहादुर राई की ‘कठपुतली का मन’ कहानी पढ़ी थी या नहीं? इस नवीन कथा को समझने और समीक्षा करने के लिए क्या नई पीढ़ी के पाठक और दर्शक तैयार हो चुके हैं या नहीं?