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सरकार की कार्यशैली को लेकर जेनजी वर्ग में असंतोष

समाचार सारांश

  • जेनजी वर्ग ने संविधान संशोधन बहसपत्र तैयार करने कार्यदल की आमंत्रण स्वीकार न करते हुए २५ सदस्यों ने चर्चा में शामिल न होने का फैसला किया।
  • जेनजी वर्ग का कहना है कि २०८२ मंसिर २४ को हुए दस बिंदु समझौते का क्रियान्वयन नहीं हुआ और कार्यदल गठन में पारदर्शिता की कमी के कारण असंतोष है।
  • जेनजी नेताओं ने सुकुमवासियों के विस्थापन, संसद में जवाबदेही की कमी और सरकार की विवादित कार्यशैली को लेकर गंभीर असंतोष जताया।

५ जेठ, काठमांडू। ‘लोकतंत्र कोई गंतव्य नहीं, बल्कि एक यात्रा है। यह केवल लिखित नियम या कानून ही नहीं, बल्कि अनौपचारिक प्रक्रियाएं, व्यवहार और कार्यविधि भी है।’

मजबूत और प्रगतिशील लोकतंत्र के निर्माण के लिए सरकार और राज्य के विभिन्न अंगों, निकायों तथा सम्बंधित पक्षों द्वारा पारदर्शी, जवाबदेह, समतामूलक और न्यायसंगत प्रक्रियाओं को अपनाना आवश्यक है, ऐसा कहा है जेनजी वर्ग ने शुक्रवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में। इस विज्ञप्ति का मुख्य कारण था प्रधानमंत्री बालेन शाह द्वारा गठित संविधान संशोधन बहसपत्र तैयार करने कार्यदल की तुलना में आमंत्रण।

३० वैशाख को जेनजी नेताओं को संदेश के माध्यम से बहसपत्र निर्माण कार्यदल से आमंत्रण प्राप्त हुआ, जिसमें आंदोलन के प्रतिनिधियों को चर्चा के लिए बुलाया गया था। सूची में कुल २९ जेनजी नेता शामिल थे।

रक्षा बम, उपार्जुन चाम्लिङ, तनुजा पाण्डे, माजिद अन्सारी, अर्णव चौधरी, रिजन रानामगर, अमृता वन, युजन राजभण्डारी, प्रभाष बस्नेत, पेमा वाङ्गबु, टंक जैसी, यादव अर्याल, यतिश ओझा, जनक पोखरेल, आयुष बस्याल, सुदीप सेठ, अरुणसिंह नेपाली, विप्लवी न्यौपाने, सांकेन राई, एवं मोनिका निरौला भी नामित थे।

हाल ही में एक जेनजी नेता ने प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा बुलाए गए जेनजी सदस्यों के लिए एक व्हाट्सएप समूह बनाया, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय के सह-सचिव लिलाधर सुवेदी भी शामिल हुए। सुवेदी ने समूह में सूचित किया कि ‘कार्यदल जेनजी आंदोलन के प्रतिनिधियों और कानून के छात्रों के साथ चर्चा करेगा, कृपया निर्दिष्ट तारीख, समय और स्थान पर उपस्थित रहना सुनिश्चित करें।’

इस अनौपचारिक व्हाट्सएप समूह में चर्चा शुरू हुई। एक अन्य जेनजी नेता ने कार्यदल की चर्चा पर प्रश्न उठाते हुए कहा, ‘संविधान संशोधन का स्कोप क्या है? इस चर्चा से क्या अपेक्षा की जा रही है?’

जब कार्यदल की चर्चा के विषय साझा किए गए, तो जेनजी नेताओं के बीच इस पर गहन विचार हुआ।

पहला प्रश्न था कि चर्चा में भाग लिया जाए या नहीं। असंतोष बढ़ने पर प्रधानमंत्री कार्यालय के सह-सचिव के अलावा एक अन्य समूह भी बनाया गया, जिसमें जेनजी नेताओं ने विचार-विमर्श किया। कुछ ने यह शिकायत की कि सूची में कुछ साथी शामिल नहीं थे।

आगे चलकर लक्ष्मी घिमिरे, मनिषा चौधरी, प्रज्वल विक्रम राणा, अमित खनाल ऊर्जा, प्रभात लाभ, शरिष्मा थापा, प्रवेश दाहाल, कमल मगर और रुक्साना कपाली के नाम जोड़े गए, साथ ही जेनजी घायलों के नाम भी सूची में शामिल हुए।

हालांकि, नामों के शामिल होने के बावजूद कई नेताओं ने भाग न लेने का निर्णय लिया। २५ जेनजी नेताओं ने कार्यदल के आमंत्रण को स्वीकार न करते हुए १ जेठ को एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें पूर्व समझौते के क्रियान्वयन में विफलता और सरकार की एकपक्षीय तथा अपारदर्शी कार्यशैली के प्रति असंतोष व्यक्त किया गया और चर्चा में शामिल न होने का ऐलान किया।

एक जेनजी नेता ने बताया, ‘पहले से ही हमारे पास एक व्हाट्सएप समूह था, लेकिन इस मसले पर अलग समूह में चर्चा हुई। सह-सचिव शामिल होने के बावजूद भी हमने निकटस्थ वार्ता में शामिल न होने का निष्कर्ष निकाला।’

जेनजी नेताओं ने कार्यदल गठित करने के औचित्य पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समझौते के अनुसार एक उच्चस्तरीय संविधान संशोधन सुझाव आयोग गठित किया जाना था, जिसमें स्वतंत्र विशेषज्ञ, जेनजी और युवाओं की भागीदारी होती।

मगर वर्तमान कार्यदल के सदस्यों और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता न होने को लेकर असंतोष है और सदस्यों की पात्रता पर प्रश्न उठाए गए हैं।

जेनजी नेताओं ने कहा कि आंदोलन से जुड़े कई अभियुक्तों के कारण असंतोष है। शहीद परिवार और घायलों को अभी भी न्याय मिलने का इंतजार है।

उन्होंने कहा, ‘राजधानी से बाहर के साथी हर प्रक्रिया से बाहर हैं। हम २०८२ मंसिर २४ को किए गए दस बिंदु समझौते के कार्यान्वयन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’ जेनजी नेताओं ने सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया।

चयन प्रक्रिया और आमंत्रण सूची में छोड़े गए नेताओं के मुद्दे को उठाते हुए जेनजी नेताओं ने छह बिंदुओं की मांग की और पुनः आमंत्रण देने से पहले इन मांगों को पूरा करने का आग्रह किया।

जेनजी नेता अर्णव चौधरी ने कहा कि सरकार द्वारा गठित कार्यदल न तो कानूनी है और न ही औचित्यपूर्ण, यह राजनीतिक दलों की तरह दिखता है। उन्होंने कहा कि सरकार ने कानून और प्रक्रिया सार्वजनिक किए बिना इस पहल को आगे बढ़ाया है और प्राथमिकता पर ही सवाल उठते हैं।

चौधरी ने कहा, ‘हमें चर्चा के लिए बुलाया गया है जबकि देश में राष्ट्रीय मुद्दे यथास्थित हैं। सुकुमवासियों समेत अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए हमें बुलाया गया है। जिन लोगों ने कई सवाल उठाए, उन्हें पहले बुलाना स्पष्ट सन्देश है। सरकार सभी का ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है।’

जेनजी नेताओं ने सरकार की हाल की कार्यशैली पर गंभीर असंतोष जताया। संयुक्त बयान में भूमिहीन सुकुमवासियों, दलितों और असंगठित बस्तियों में राज्य के अमानवीय व्यवहार को तुरंत रोकने की मांग की गई।

जेनजी नेता रक्षा बम ने कहा, ‘सरकार से अच्छी उम्मीदें थीं, लेकिन प्राथमिकता छोड़ कर सुकुमवासियों को हटाना पहला विकल्प बनाया गया, जो निराशाजनक है।’

सरकार से यह उम्मीद भी थी कि सुकुमवासी बस्तियां हटाने में उचित प्रबंधन होगा, लेकिन जब होल्डिंग सेंटर ले जाने पर कोई तैयारी नजर नहीं आई तो निराशा हुई। संसद, न्यायालय और प्रधानमंत्री की जवाबदेही में कमी बताई गई।

रक्षा बम ने कहा, ‘प्रधानमंत्री बालेन “आइ एम दी स्टेट” कह कर आगे बढ़ रहे हैं और ऐसा लगता है कि केपी ओली की शैली दोहराई जा रही है। यदि यह सरकार विफल हुई तो सबसे ज्यादा दुखी हम होंगे। नई सरकार से बड़ी आशाएं थीं, लेकिन ये पहली घटना में ही असफल लग रही है।’

जेनजी नेता उपार्जुन चाम्लिङ ने कहा कि सरकार की कार्यशैली आने वाले दिनों के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा, सरकार ने संसद में अध्यादेश लाया, सुकुमवासियों का विस्थापन किया, सीमा विवाद में सौ रुपये के कस्टम विवाद और प्रधानमंत्री की संसद में जवाबदेही न होना आपत्तिजनक है।

चाम्लिङ ने कहा, ‘संविधान संशोधन बहसपत्र तैयार करने की जिम्मेदारी पारदर्शी होनी चाहिए, विधि और उद्देश्य स्पष्ट हों।’ उन्होंने कहा, ‘कार्यदल में जेनजी की सहभागिता दिखाने के लिए केवल औपचारिक आमंत्रण देना पर्याप्त नहीं है।’

अंत में उन्होंने कहा, ‘सरकार अहंकार पर आधारित काम कर रही है, ऐसी कार्यशैली देश को आगे नहीं बढ़ाएगी।’