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१० वर्षों से कार्यालय खोजते भटकती है एमाले

समाचार संदर्भ

संपादकीय समीक्षा के बाद तैयार।

  • नेकपा एमाले बल्खु के मदननगर में केंद्रीय कार्यालय भवन निर्माण का काम दो महीनों के भीतर शुरू करने की तैयारी में है।
  • २०७२ के भूकंप के बाद से, लगभग दश वर्षों से एमाले केंद्रीय कार्यालय के लिए जगह तलाशते हुए अस्थायी कार्यालय में लगातार स्थानांतरण करता रहा है।
  • एमाले ने दस वर्षों में लगभग १५ करोड़ खर्च कर अस्थायी कार्यालय स्थापित किया है और अब बल्खु में नया भवन बनाने जा रहा है।

४ जेठ, काठमाडौँ – नेकपा एमाले ने बल्खु के मदननगर में केंद्रीय कार्यालय भवन निर्माण की तैयारियां शुरू कर दी हैं।

केंद्रीय कार्यालय सचिव डॉ. भिष्म अधिकारी के अनुसार भवन निर्माण कार्य शीघ्र ही शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा, ‘‘दो महीनों के अंदर ही काम शुरू करने की योजना बन रही है।’’

कल, रविवार को मदन-आश्रित दिवस के अवसर पर महासचिव शंकर पोखरेल ने बल्खु में भवन निर्माण की घोषणा की थी। महासचिव की इस घोषणा के बाद एमाले कार्यकर्ताओं में उत्साह दिखाई दिया है।

एमाले नेता कृष्ण राई कहते हैं, ‘‘मदननगर में केंद्रीय कार्यालय भवन बनाने के लिए हमने कई प्रयास किए। नेताओं ने व्यापारी की बातों को सुना लेकिन हमें कोई ध्यान नहीं दिया। अंततः हमें यहीं स्थान चुनना पड़ा।’’

बुद्धिजीवी परिषद के अध्यक्ष गजेन्द्र थपलिया ने सोशल मीडिया स्टेटस के माध्यम से खुशी जताई। उन्होंने कहा, ‘‘एमाले को चाहने वाले सदस्य, शुभचिंतक, नेता-कार्यकर्ता ही नहीं, देश-विदेश के सभी लोगों के लिए यह खुशखबरी है। जल्द से जल्द इसी स्थान पर भवन निर्माण हो और नेकपा एमाले की विरासत लौटाने वाला कार्यालय बन सके।’’

२०७२ के भूकंप में बल्खु स्थित कार्यालय भवन क्षतिग्रस्त होने के बाद से ही एमाले दस सालों से केंद्रीय कार्यालय की तलाश में भटक रहा है। अस्थायी कार्यालय स्थानांतरण के दौरान भी विवाद होते रहे हैं।

भवन गिरने के बाद कार्यालय को धुम्बराही में पासांग ल्हामु प्रतिष्ठान के कार्यालय में स्थानांतरित करना पड़ा था। भोजपुर के सांसद कृपाशुर शेर्पा अध्यक्ष रहे प्रतिष्ठान भवन कार्यालय स्थानांतरण के समय विवाद का कारण बना था।

उस समय राजनीतिक दलों ने प्रतिष्ठान का कार्यालय इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताई थी। उस समय शेर्पा संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री थे और बाद में केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री बने। उस कार्यालय में एमाले कार्यरत था।

२०७५ जेठ में एमाले और माओवादी के मिलन से नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) हुई। ओली के प्रधानमंत्री बनने के बाद उक्त प्रतिष्ठान में ही केंद्रीय कार्यालय रहा।

हालांकि, २०७७ जनवरी में नेकपा विभाजित हो गई। सर्वोच्च अदालत ने नेकपा के एकीकरण को निरस्त करते हुए एमाले और माओवादी को पुनर्स्थापित किया।

पुनर्स्थापित एमाले ने कार्यालय धुम्बराही से अन्य स्थान पर मोतीलाल दुगड नामक व्यापारी के थापाथली में स्वजनों के घर में स्थानांतरित किया। पार्टी के भीतर उस घर में कार्यालय रखने का विरोध हुआ लेकिन असर नहीं पड़ा।

ओली के कार्यालय से जुड़ी पार्किंग समस्या के कारण कार्यालय स्थानांतरण का निर्णय लिया गया। ९ वैशाख २०७९ को थापाथली से च्यासल स्थानांतरित किया गया।

च्यासल स्थित तुलसीलाल प्रतिष्ठान के भवन में कार्यालय स्थानांतरण की प्रक्रिया में विष्णु रिमाल, भारत पहाड़ी, गजेन्द्र थपलिया, कंचन भट्ट और सुस्मिता क्षेत्री सक्रिय थे। लगभग १० करोड़ खर्च कर केंद्रीय कार्यालय स्थापित किया गया था।

‘हल बनाने से सजावट तक लगभग ९ करोड़ खर्च हुआ,’ टीम के एक नेता ने कहा, ‘फिर भी खर्च रुका नहीं। पिछले साल बाढ़ ने भारी नुकसान किया। जेनजी आंदोलन के दौरान कार्यालय जलने से और खर्च बढ़ा।’

जलकर क्षतिग्रस्त कार्यालय की मरम्मत के लिए प्रवासी संगठनों और सरकार के नेताओं से आर्थिक मदद जुटाई गई।

बागमती प्रदेश सरकार में मंत्री रहे डॉ. दिनेशचन्द्र देवकोटा से २५ लाख रुपये मदद मांगी गई थी।

डॉ. देवकोटा ने सहायता का निर्णय लिया था, लेकिन सूचना प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह तक पहुंचते ही धनराशि जारी होने से रोक दी गई और कार्यालय हटाने का निर्देश मिला।

सूचना सार्वजनिक होने के बाद एमाले नेताओं को तत्काल कार्यालय खोजने पर मजबूर होना पड़ा लेकिन अब तक कोई नया कार्यालय नहीं मिला है।

केंद्रीय कार्यालय सूत्रों के अनुसार, ‘बल्खु के आसपास ही कार्यालय खोज रहे हैं लेकिन अभी तक कोई जगह नहीं मिली है।’ काठमांडू के स्थानीय नेताओं के सहयोग के बावजूद भी कार्यालय नहीं मिला है।

दान में भवन लेने को लेकर विवाद

तुलसीलाल प्रतिष्ठान से पांच साल के अनुबंध कर च्यासल में कार्यालय स्थानांतरित करते समय बल्खु में ही केंद्रीय कार्यालय भवन बनाने का निर्णय लिया गया था। शिलान्यास ओली ने किया था।

पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने बल्खु से कार्यालय अन्यत्र स्थानांतरण का विरोध किया था।

लेकिन अस्थायी रूप से कार्यालय स्थानांतरण के दौरान ०८१ असोज में स्थायी कार्यालय बल्खु से अन्यत्र स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया।

अधिकारियों की आपत्ति के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली और व्यापारी मीनबहादुर गुरुङ ने कीर्तिपुर में एमाले भवन का शिलान्यास किया।

कीर्तिपुर-२ में अरबों मूल्य के कार्यालय भवन को गुरुङ द्वारा दान में देने की सहमति थी। इस निर्णय ने पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह आलोचना बढ़ाई।

दान में मिलने वाले भवन में कार्यालय न रहने देने की मांग को लेकर कई एमाले नेताओं ने विरोध जताया। डॉ. विंदा पांडे और उषाकिरण तिम्सिना को छह महीने के लिए निलंबित किया गया और अन्य नेताओं को भी कार्रवाई की गई।

दान में कार्यालय लेने के लिए कार्यकर्ताओं से भी धन जुटाया जा रहा था। ०८० साल सदस्यता नवीनीकरण के दौरान भवन निर्माण के लिए धनराशि भी संकलित की गई थी।

काठमांडू के पूर्व अध्यक्ष कृष्ण राई कहते हैं, ‘छह लाख से ज्यादा कार्यकर्ताओं से भवन निर्माण के लिए धन जुटाया गया था, लेकिन दान में भवन लेने का निर्णय लेकर पैसे का कोई हिसाब नहीं दिया गया और भवन भी नहीं बना।’

पिछले साल भाद्र में जेनजी आंदोलन के बाद मीनबहादुर गुरुङ सहमति से पीछे हटे। ओली और गुरुङ के बीच दशैं से पहले केंद्र कार्यालय हस्तांतरण का समझौता हुआ था।

इस तरह, दस वर्षों तक केंद्रीय कार्यालय खोजने में अनेक समस्याओं और बदनामी के बावजूद स्थिति जस की तस है।

एमाले के एक नेता ने कहा, ‘अस्थायी कार्यालय स्थानांतरण में लगभग १५ करोड़ खर्च हो चुका है। ये राशि नई भवन निर्माण के लिए काफी होगी।’

बागमती नदी के किनारे से ४० मीटर दूरी पर भवन बनाया जाएगा जिससे बड़ा कार्यालय बनेगा और बल्खु से स्थानांतरण की आवश्यकता नहीं होगी, उनका तर्क है।

‘सर्वोच्च अदालत ने २० मीटर खाली जगह छोड़ने का आदेश पहले ही दे दिया है जो अतिरिक्त सुरक्षा है,’ वे कहते हैं।