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चरागण स्वयं को कैसे पहचानते हैं?

लेखक ने अमेरिका में दुर्लभ श्वेताँखीभौं चरा की खोज करते हुए 533वां जीवनकाल चरा (लाइफर) मिलने का अनुभव साझा किया। भंगेरा पक्षियों में प्रजनन के दौरान अलग-अलग रंगों वाले नर और मादा पक्षी घोंसला सुरक्षित रखने और उसकी देखभाल करने का व्यवहार दर्शाया गया। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अध्ययन से यह पता चला कि पक्षी अपने प्रतिबिंब को पहचान सकते हैं और उनके गीत सीखने में भिन्नता पाई गई है।

रविवार सुबह, नींद खुलते ही फोन पर नज़र पड़ी। मेरे फोन में दो-चार महत्वपूर्ण एप के अलावा खास किसी एप के नोटिफिकेशन सक्रिय नहीं थे। उनमें से एक था – ग्रुप मी। डिस्कॉर्ड की तरह यह ऐप संदेश भेजने के लिए उपयोग होता है और यहां पर पक्षी देखने वाले अधिकांश लोग यही ऐप इस्तेमाल करते हैं। ग्रुप मी में भी अधिकतर अचानक या दुर्लभ पक्षी मिलने पर ही संदेश आते हैं। नोटिफिकेशन देखकर नींद खुल गई। जल्दी से देखा कि “गार्गने इन सदर्न मिनेसोटा” लिखा था। गार्गने या नेपाली में श्वेताँखीभौं एशिया और यूरोप में पाए जाने वाले पक्षी हैं, अमेरिका में ये अत्यंत दुर्लभ और फिरन्ते (माइग्रेटिंग) होते हैं। मैं श्वेताँखीभौं को कोशी टप्पु वन्यजीव अभयारण्य में देख चुका था, पर अमेरिका में यह मेरे लिए नया लाइफर था।

उस समय मेरा अमेरिका का लाइफर 532 था! 533वें नंबर के उस पक्षी को देखने की तीव्र इच्छा से हम तीन घंटे दूर उस स्थान की ओर चल पड़े। पहुंचने पर दोपहर का समय हो चुका था। एक खेत के किनारे जमा पानी की जगह पर बहुत सारे हंस मौजूद थे। हमने गौर से देखा, पर श्वेताँखीभौं नहीं दिखे। पानी में मौजूद अन्य सभी हंस दूर से भी उस श्वेताँखीभौं जैसा ही दिखते थे। कुछ देर विभिन्न पक्षियों को देखते रहे, लेकिन कोई नहीं मिला। थोड़ी देर बाद एक अलग झुंड के हंस वहां उतरे। मैंने दूरबीन से अच्छी तरह देखा, उन सभी में से एक अलग था। श्वेताँखीभौं! खोजा हुआ पक्षी मिल गया!