
समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा पश्चात तैयार किया गया।
- आगामी आर्थिक वर्ष के बजट में सांसद के निर्वाचन क्षेत्र केंद्रित परियोजनाएं शामिल करने के लिए सरकार ने प्रत्यक्ष निर्वाचित सांसदों से रणनीतिक सड़क और पुल परियोजनाओं की मांग की है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने संसदीय क्षेत्र के पूर्वाधार विकास कार्यक्रम पर अंतरिम रोक लगाई है, फिर भी सरकार योजना मांग कर बजट में इसे छुपाने की कोशिश कर रही है।
- नेकपा एमाले के प्रमुख सचेतक ऐन महर ने कहा है कि सरकार की नीतिगत सुझाव न लेकर सिर्फ योजना मांगना सांसदों के प्रति अपमानजनक है।
१३ जेठ, काठमाडौं। इस वर्ष भी बजट में ‘सांसद विकास कोष कार्यक्रम’ को घुमावदार तरीके से शामिल करने की योजना है। सरकार आगामी आर्थिक वर्ष के बजट की पूर्व तैयारी के दौरान सांसदों से निर्वाचन क्षेत्र केंद्रित योजनाएं मांग रही है और इन्हें बजट में रखने की तैयारी में है।
प्रधानमंत्री एवं मन्त्रिपरिषद कार्यालय और अर्थ मंत्रालय के संबंधित अधिकारियों के अनुसार, सांसदों से योजना संग्रह का काम तत्कालीन शहरी विकास मंत्रालय (अब पूर्वाधार विकास मंत्रालय) ने किया है। अधिकारियों का कहना है कि यह जनता की मांग सुनने और समाधान करने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
‘जो भी पार्टी से निर्वाचित हों, जनता उन सांसदों को अपनी मांगें बताती है। जनता की आवश्यकता के अनुसार योजना संकलित की गयी हैं,’ एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘इसे गलत समझना उचित नहीं होगा।’
इस योजना के तहत प्रत्यक्ष निर्वाचित सांसदों से तीन-तीन रणनीतिक सड़क और पुल परियोजनाएं संकलित की गई हैं। समानुपातिक सांसदों से प्राथमिकता के आधार पर एक योजना प्राप्त हुई है। यह निर्धारित नहीं था कि कितनी राशि की योजना देनी होगी।
सरकार के आग्रह के अनुसार नेपाली कांग्रेस के सांसद योगेश गौचन ठकाली ने छह योजनाएं पेश की हैं। ठकाली ने कहा, ‘नई और पुरानी दोनों तरह की छह योजनाएं प्रस्तुत की हैं। पिछली कार्यान्वित या धीमी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए निर्देशित किया है।’
पहले संसद सदस्य के चयन के आधार पर उन्हीं योजनाओं में धन आवंटित किया जाता था। २०७० साल में जब सुशील कोइराला प्रधानमंत्री थे, तब पूर्वाधार विकास कोष की अवधारणा शुरू हुई, बाद में नाम बदलकर सांसद विकास कोष रखा गया।
समय के साथ सांसद के मुख्य कार्य को लेकर बहस हुई। कहा गया कि सांसद को विकास योजना मांगने वाली भूमिका नहीं, अपितु कानून निर्माण में लगी भूमिका निभानी चाहिए। इस कारण नाम फिर से ‘स्थानीय पूर्वाधार विकास साझेदारी कार्यक्रम’ रखा गया।
इस कार्यक्रम के तहत संघीय संसद निर्वाचन क्षेत्रों में ६ करोड़ और प्रदेश स्तर पर ६ करोड़ रुपये वार्षिक आवंटन हो रहा था। लेकिन विकास के नाम पर यह राशि कार्यकर्ताओं में वितरण कर दुरुपयोग होने की आलोचना होती रही।

अधिक आलोचनाओं के बाद तत्कालीन अर्थ मंत्री विष्णु पौडेल ने २०७८/७९ के बजट से सांसद विकास कोष की राशि हटा दी और कार्यक्रम समाप्त कर दिया।
लेकिन सांसदों के दबाव पर तत्कालीन अर्थ मंत्री डा. प्रकाशशरण महत ने २०८०/८१ के बजट में सांसद विकास कोष पुनः स्थापित किया।
महत ने ‘संसदीय पूर्वाधार विकास कार्यक्रम’ के तहत निर्वाचन क्षेत्रों में पाँच-पाँच करोड़ रुपये आवंटित किए। इसके अनुसार २७५ सांसदों के लिए कुल १३ अरब ७५ करोड़ रुपये विनियोजित हुए, परंतु यह कार्यक्रम लागू नहीं हो सका।
संसदीय पूर्वाधार विकास कार्यक्रम के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया गया। ६ भदौ २०८० को सर्वोच्च के संवैधानिक इजलास ने योजना आयोग, मंत्रालयों के क्षेत्राधिकार, विकास अवधारणा, स्वार्थ दूरी, सुशासन एवं जवाबदेही पर ध्यान देते हुए इस कार्यक्रम पर अंतरिम रोक लगा दी।
सर्वोच्च अदालत के फैसले के खिलाफ संसद में भी प्रश्न उठे। तत्कालीन सांसद रमेश लेखक, श्यामकुमार घिमिरे, महेश बर्तौला, सूर्य थापा और अम्मरबहादुर थापाले इस मामले को स्वीकार नहीं किया और मुकदमे का सामना किया, लेकिन वित्तीय वर्ष के भीतर कोई निर्णय नहीं हुआ।
आज भी सांसद विकास कोष की मांग जारी है। सर्वोच्च के आदेश के बाद भी सांसद योजना मांग रहे हैं और उन्हें बजट में आवंटन किया जा रहा है।
तत्कालीन अर्थ मंत्री वर्षमान पुन ने सांसदों से योजना मांग कर बजट तैयार किया था। उस समय लाखों की योजनाओं को भी बजट में जगह मिली थी।
इस वर्ष भी इसी तरह सांसदों से योजना मांग कर बजट में शामिल किया जा रहा है, हालांकि राशि की कोई सीमा निर्धारित नहीं है।
प्रकाशशरण महत ने २०८० साल में नियम बनाए थे जिसमें संघीय स्तर पर ३ करोड़, प्रदेश स्तर पर एक करोड़ से अधिक और स्थानीय स्तर पर एक करोड़ से कम मूल्य की योजना ही लाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन अब तक यह लागू नहीं हो पाया है।
अर्थात् सांसद अभी भी विधायी भूमिका में रहते हुए योजना चयन और बजट कार्यान्वयन में शामिल हैं।
सुशासन के सिद्धांतों के विरुद्ध
समाजशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. दीपेश घिमिरे के अनुसार सांसदों को विकास कार्यों में जोड़ने के पीछे दो मुख्य कारण हो सकते हैं।
पहला, सांसद का मुख्य काम नीति निर्माण है, इस बात की व्यापक जन चेतना नहीं है। जनता सड़क और विकास योजना चाहती है।
दूसरा, ऐसे कार्यक्रमों में करीब १०% प्रशासनिक खर्च होता था जो कार्यकर्ताओं के परिचालन में सहायक होता था।
सांसदों द्वारा चयनित योजनाओं में उपभोक्ता समितियों के माध्यम से भी कार्यकर्ताओं के लिए व्यवस्था की जाती थी। उन्होंने बताया, ‘पहले सांसद इन कार्यक्रमों के जरिये खुद को विकासकर्ता साबित करते थे और कार्यकर्ताओं को पोषण भी करते थे।’

लेकिन लगातार इस तरह की योजनाओं को जारी रखना गलत है, ऐसा घिमिरे का तर्क है।
‘सांसद का काम कानून बनाना और सरकार को जवाबदेह बनाना है। तंत्र में जांच और संतुलन बनाए रखना है,’ उन्होंने कहा, ‘अपने जिम्मे कार्यों से बाहर कार्य करना सुशासन के सिद्धांतों के खिलाफ है। यह अभ्यास गलत है।’
उन्होंने इन योजनाओं के समाप्ति और सरकार एवं सांसदों से नई दिशा अपनाने का आग्रह किया।
वर्तमान सरकार जेनजी आंदोलन की पृष्ठभूमि में आई है, जिसने सुशासन और भ्रष्टाचार नियंत्रण की मांग की थी। इसी क्रम में प्रतिनिधि सभा चुनाव हुआ और राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी ने दो तिहाई बहुमत से मजबूत सरकार बनाई।
राष्ट्रिय समाजवादी पार्टी संसदीय दल के नेता वालेन्द्र शाह (बालेन) इस सरकार के प्रमुख हैं। सरकार के समक्ष नीतिगत सुधार के लिए कोई बाधा नहीं है।
डॉ. घिमिरे कहते हैं, ‘यदि सांसदों को फिर से योजना चयन का अधिकार दिया गया तो यह सुशासन के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। सरकार को इसे रोकने के लिए कदम उठाना चाहिए।’
नीति संबंधी मुद्दों में विपक्ष का उपेक्षा
बजट को लेकर व्यक्तिगत रूप से सांसदों से योजना जरूर मांगी गई है, लेकिन सरकार ने विपक्षी दलों के साथ सामूहिक चर्चा नहीं की है।
नेपाली कांग्रेस की मुख्य सचेतक बसना थापा ने कहा, ‘पहले विपक्षी दल के साथ औपचारिक चर्चा होती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।’
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विपक्ष के सुझावों से सरकार के फैसलों की समझ बढ़ेगी। ‘निर्णय सरकार करेगा लेकिन कैसे आगे बढ़ना है, इसे समझना जरूरी है,’ उन्होंने कहा।
प्रधानमंत्री बालेन ने व्यक्तिगत रूप से प्रदेशवार सांसदों से चर्चा की है।
१६ चैत को कोशी और कर्णाली प्रदेश के सांसदों से, १७ चैत को सुदूरपश्चिम से, १८ चैत को मधेस प्रदेश से, २० चैत को गण्डकी प्रदेश से और २३ चैत को लुम्बिनी प्रदेश के सांसदों से वार्ता की गई।
२ वैशाख को समानुपातिक सांसदों के साथ भी मौजूदा और अगली आर्थिक वर्ष की प्राथमिकताओं पर चर्चा हुई।
प्रधानमंत्री बालेन ने सांसदों से मुख्यतः तीन बातें अनुरोध कीं-
पहला- इस वर्ष सरकारी सुधार पर सरकार का मुख्य फोकस रहेगा, उसी के अनुरूप सुझाव दें।
दूसरा- बजट आवंटन में असमानता न हो और रणनीतिक योजनाएं प्रस्तुत करें।
तीसरा- तत्काल समाधान योग्य समस्याओं के लिए समन्वय करें।
सांसदों की योजनाओं को प्रधानमंत्री एवं मन्त्रिपरिषद कार्यालय द्वारा संकलित कर प्राथमिकताओं के आधार पर बजट में शामिल किया जाता रहा है।
लेकिन एमाले के प्रमुख सचेतक ऐन महर के अनुसार ऐसे सुझाव और ‘कुछ योजनाएं भेजो’ के स्तर की मांगें जनता की वास्तविक आवश्यकता पूरी नहीं कर सकतीं।
‘हमें नीतिगत चर्चा चाहिए कि पूर्वाधार में कैसे सुधार लाया जाए, कौन सी गेम-चेंजिंग योजनाएं हो सकती हैं,’ उन्होंने पूछा। ‘शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्युतीकरण में सरकार का काम कैसे आगे बढ़े, उसमें विपक्ष की भूमिका भी अहम है।’
महर ने कहा, ‘सरकार ने विपक्ष को पूरी तरह नजरअंदाज किया है। ‘तीन सड़क और तीन पुल योजना लाओ’ ये क्या सांसद होने का काम है?’ उन्होंने यह भी कहा, ‘निर्वाचन क्षेत्र की सभी समस्याएं न पूछकर केवल सड़क परियोजनाओं तक सीमित कर देना सांसदों का अपमान है।’
