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तीन सुरक्षा निकायों के अधिकारियों पर कार्रवाई, सेना के खिलाफ नरम फैसला

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने जेएनजी आंदोलन के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन के कारण तीन सुरक्षा निकायों के उच्च अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। आयोग ने राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा में सेना की संवेदनशीलता की कमी और सहयोग न देने के बावजूद सेना के खिलाफ कोई कार्रवाई सिफारिश नहीं की है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि प्रदर्शनकारियों के पास घरेलू हथियार होने के बावजूद सुरक्षा निकायों ने अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया, जिससे निर्दोष नागरिकों को गोली लगी।

१३ जेठ, काठमांडू। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने तीन सुरक्षा निकायों (नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस और राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग) के उच्च पदस्थ कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। २३ और २४ भदौ को हुए जेएनजी आंदोलन की जांच में आयोग ने नेपाली सेना के मामलों को लेकर शिथिल निर्णय लिया है। बुधवार को जारी २९ पृष्ठ के निष्कर्ष में आयोग ने तीनों सुरक्षा निकायों के कर्मियों की कमियों और त्रुटियों को उजागर करते हुए उनकी सजा की अनुशंसा की, जबकि सेना के मामलों में कोई कार्रवाई न करने का निर्णय लिया।

नेपाल पुलिस के तत्कालीन आईजीपी चन्द्रकुवेर खापुङ, तत्कालीन एआईजी (अभी के आईजीपी) दानबहादुर कार्की, डीआईजी ओमविक्रम राणा, काठमांडू के तत्कालीन एसएसपी (अभी डीआईजी) विश्व अधिकारी, सशस्त्र पुलिस के तत्कालीन आईजीपी राजु अर्याल, एआईजी (अभी आईजीपी) नारायणदत्त पौडेल, एसपी जीवन केसी, काठमांडू के तत्कालीन सीडीओ छवि रिजाल, गुप्तचर के तत्कालीन प्रमुख हुतराज थापा, अनुसंधान निदेशक कृष्ण खनाल और फील्ड में तैनात कमांडरों को मानवाधिकार उल्लंघन के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।

इनमें खापुङ, अर्याल और थापा को भविष्य में सरकारी सेवा से बाहर रखने और संविधान की धारा २४९ की उपधारा २ (ग) के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। बाकी और वर्तमान में कार्यरत कर्मचारियों के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

२४ भदौ को हुई आगजनी और तोड़फोड़ में भी सेना द्वारा नजरअंदाज किए जाने की बात आयोग ने कही है। सिंहदरबार, राष्ट्रीय राष्ट्रपति कार्यालय सहित महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्रों की सुरक्षा में तैनात सेना असफल रही, इसका उल्लेख किया गया है। २३ और २४ भदौ की दोपहर तक नेपाली सेना को छोड़कर सभी सुरक्षा निकाय असफल रहे, जबकि मंत्री परिषद ने सेना की सहायता लेने का कोई निर्णय नहीं लिया।

हालांकि सेना की कमजोरियों के बावजूद आयोग ने सेना के खिलाफ कोई कार्रवाई का प्रस्ताव नहीं दिया, बल्कि प्रधानसेनापति और सुरक्षा कमांडरों को चेतावनी देने की सलाह दी है।

आयोग पहले भी तत्कालीन गृह सचिव गोकर्णमणि दुवाडी, एआईजी सिद्धिविक्रम शाह, एसएसपी दीप शमशेर जबरा, एसपी ऋषिराम कंडेल सहित कुछ सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश कर चुका है। सशस्त्र पुलिस के डीआईजी सुरेशकुमार श्रेष्ठ पर भी कार्रवाई प्रस्तावित थी, लेकिन इस नई रिपोर्ट में उनके विषय में कोई जिक्र नहीं है।

सुरक्षा निकायों के बीच समन्वय और संचार में कमी भी आयोग की रिपोर्ट में पाई गई है। संसद भवन की सुरक्षा के लिए नेपाल पुलिस ने स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) और सड़क पर प्रदर्शन नियंत्रण के लिए अन्य टोली तैनात की थी, जबकि सशस्त्र पुलिस और गुप्तचर भी मौजूद थे, लेकिन सभी में समन्वय का अभाव रहा।

आयोग ने यह भी प्रकाश डाला कि प्रदर्शनकारियों के पास घरेलू हथियार (जैसे लाठी, पिक, पेट्रोल बम) थे, जबकि सुरक्षा कर्मियों ने एसएलआर, इन्सास जैसे आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया। संसद भवन में तोड़फोड़ करने वालों को गोली नहीं लगी, पर निर्दोष नागरिक जिन्हें भवन के आसपास देखा गया, उन्हें गोली लगी। यह असंतुलित बल प्रयोग को दर्शाता है।

आयोग ने पर्याप्त संसाधन न दिए जाने के कारण सुरक्षा में बड़ी कमी होने और इससे बड़ी क्षति हुई भी माना है। प्रदर्शनकारियों के बढ़ने पर सुरक्षा बलों की आपूर्ति में भी कमी रही, जिससे पुलिस को अपने प्राण बचाने के लिए गोली चलानी पड़ी।

आयोग की रिपोर्ट में सुरक्षा कर्मियों के हथियारों के खतरनाक उपयोग और नियंत्रण की कमी को भी विस्तार से बताया गया है।