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चिकित्सा शिक्षा आयोग और सीटीईवीटी के बीच विवाद: प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचा भर्ना मामला

१४ वैशाख, काठमाडौं । चिकित्सा शिक्षा के डिप्लोमा स्तर में प्रवेश परीक्षा लिए बिना ही छात्रों की भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने के विषय पर चिकित्सा शिक्षा आयोग और प्राविधिक शिक्षा तथा व्यावसायिक तालिम परिषद् (सीटीईवीटी) के बीच विवाद प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिपरिषद्को कार्यालय तक पहुंच गया है। आयोग के एक उच्च अधिकारी के अनुसार सीटीईवीटी ने अपनी ही विनियमावली दिखाकर भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का दावा किया है, लेकिन आयोग इसे चिकित्सा शिक्षा अधिनियम के मर्म और कानून के विरुद्ध कदम मानते हुए और कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। उन अधिकारियों ने कहा, ‘उन्होंने दावा किया है कि सभी प्रक्रियाएँ पूरी हो चुकी हैं और मंत्रीस्तरीय निर्णय से अनुमोदित विनियम के अनुसार काम किया गया है। लेकिन विनियमावली कानून से ऊपर नहीं हो सकती। कानून से ऊपर कोई नहीं है। आयोग इसे सामान्य तौर पर नहीं लेगा।’

सीटीईवीटी ने हाल ही में डिप्लोमा स्तर के स्वास्थ्य कार्यक्रमों में एकीकृत प्रवेश परीक्षा के बिना ही भर्ती प्रक्रिया शुरू करने पर आयोग को आपत्ति है। सरकार ने मंगलवार को आयोग के उपाध्यक्ष पद पर डॉ. श्रीकृष्ण गिरी को जिम्मेदारी सौंपी। उसके बाद दोनों संस्थाओं के बीच बुधवार को लंबी बातचीत हुई। आयोग पक्ष ने इस चर्चा में स्पष्ट किया कि वे केवल आयोग के कानून और मानकों के अनुसार ही आगे बढ़ेंगे, जबकि सीटीईवीटी ने अपनी प्रक्रिया को नियमसम्मत बताया।

आयोग के सूत्रों के अनुसार, बातचीत में सिटिभीटी को चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में पहले हुई अनियमितताएं, पहुंच आधारित भर्ती, गुणवत्ता में गिरावट और राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से चिकित्सा शिक्षा आयोग की स्थापना की याद दिलाई गई। ‘ऐसे मनमाने कामों को रोकने के लिए आयोग बना है,’ अधिकारी ने कहा, ‘हमारे अलग नियम हैं और उन्हें ज्यों के त्यों पालन होना चाहिए।’ अधिनियम में प्रमाणपत्र स्तर के स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों में प्रवेश परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया आयोग के समन्वय में ही हो सकती है। इस बार यह प्रक्रिया बिना आयोग के समन्वय के शुरू कर दी गई।

शिक्षा तथा खेलकूद मंत्री सस्मित पोखरेल ने मंत्री के तौर पर सीटीईवीटी की नई विनियमावली जारी करके भर्ती प्रक्रिया को सरल बनाया। सरकार ने सभी राजनीतिक नियुक्ति रद्द करने वाले अध्यादेश के माध्यम से पदाधिकारियों को हटा दिया था, जिससे आयोग उपाध्यक्ष समेत पदाधिकारियों के बिना चल रहा था। उसी दौरान बिना कानूनी प्रक्रियाओं के सीधे भर्ती शुरू कर दी गई।

२३ वैशाख को मंत्री पोखरेल ने ‘प्राविधिक शिक्षा तथा व्यावसायिक तालिम परिषद् परीक्षा सम्बन्धी विनियमावली २०७१’ को निरस्त कर २०८३ की नई विनियमावली स्वीकृत की। इसके बाद सीटीईवीटी ने १ जेठ को चिकित्सा शिक्षा के तीन वर्षीय डिप्लोमा कार्यक्रमों के लिए भर्ती सूचना जारी की। यह निर्णय राष्ट्रीय चिकित्सा शिक्षा अधिनियम, २०७५ के आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन करता है। अधिनियम की धारा १६ की उपधारा (५) के खंड (ग) के अनुसार, परिषद के अंतर्गत संचालित प्रमाणपत्र स्तर के स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों में प्रवेश परीक्षा तथा भर्ती प्रक्रिया आयोग के समन्वय में ही हो सकती है।

सहमति न बनने पर प्रधानमंत्री के सामने पहुंचा विवाद: दोनों पक्षों के बीच समझौता न बनने पर बुधवार को शिक्षा मंत्री के साथ बैठक हुई। आयोग और सीटीईवीटी के प्रतिनिधि शामिल इस बैठक में शिक्षा मंत्री ने प्रवेश परीक्षा के बिना भर्ती प्रक्रिया पर संजीदगी दिखाई, जैसा कि स्रोतों ने बताया। ‘आयोग के कार्यक्षेत्र के बारे में मंत्री को पूरी समझ नहीं थी। जब आयोग ने उसे समझाया तो मंत्री ने सवाल किया कि बिना प्रवेश परीक्षा के चिकित्सा शिक्षा में भर्ती कैसे संभव है?’ सूत्र ने बताया।

सीटीईवीटी ने अपनी विनियमावली की वैधता का तर्क दिया, लेकिन आयोग ने दोहराया कि विनियमावली अधिनियम को समाप्त नहीं कर सकती। अधिकारियों ने गलती मानने के बजाय सुधार करने की बात कही। ‘अगर आधार कमजोर हो तो ऊपर की पेंटिंग से काम नहीं चलेगा,’ अधिकारियों ने बैठक में कहा, ‘चिकित्सा शिक्षा की मजबूत नींव कमन इंट्रांस और मेरिट सिस्टम है। श्रेष्ठ छात्रों का चयन किए बिना उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवा संभव नहीं है।’

चर्चा के बाद शिक्षा मंत्री आयोग की दलील को कुछ हद तक सकारात्मक मान रहे हैं, ऐसा सूत्रों ने दावा किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री से परामर्श कर आवश्यक निर्णय लेने का आश्वासन दिया। विवाद गहरा होने पर शिक्षा मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच भी संवाद हुआ। ‘रात भर शिक्षा मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय में चर्चा हुई है,’ आयोग के निकट स्रोत ने कहा, ‘हम अधिनियम को तंग करने को स्वीकार नहीं करेंगे।’ आयोग आगामी २१ जेठ को प्रधानमंत्री सहित उच्चस्तरीय बैठक करने की भी तैयारी कर रहा है। इस बैठक में चिकित्सा शिक्षा से जुड़ी विभिन्न विवादास्पद मुद्दे, प्रवेश परीक्षा प्रणाली, मेरिट, निजी और सरकारी संस्थानों का नियमन आदि बात की जाएगी।

आयोग की चेतावनी – अधिनियम से ऊपर कोई नहीं: सीटीईवीटी के अंतर्गत अधिकांश स्वास्थ्य संबंधित डिप्लोमा कार्यक्रम एसईई उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थी स्तर के होते हैं, इसलिए उच्च ग्रेड वाले छात्रों को वहीं तुरंत आकर्षित करने के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है। अधिनियम के नीचे के नियमावली या विनियमावली अधिनियम की मुख्य धाराओं को बदल नहीं सकते। चिकित्सा शिक्षा में भर्ती सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए आयोग ने सख्त मापदंड और बहुस्तरीय प्रक्रिया बनाई है। किसी भी शिक्षा संस्थान को स्वास्थ्य डिप्लोमा कार्यक्रम शुरू करने से पहले अपनी पूर्वाधार, शिक्षक, प्रयोगशाला, अस्पताल पहुँच, उपकरण और जनशक्ति का विवरण ‘सेल्फ एप्राइजल फर्म’ के रूप में देना होता है। उसके बाद आयोग या आयोग के अनुमोदन से सीटीईवीटी स्थलगत निरीक्षण करती है। निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर आयोग के पूर्ण सदस्य यह तय करते हैं कि किस संस्थान में कितने छात्रों की भर्ती हो सकती है। तभी भर्ती प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

लेकिन इस बार, १९ वैशाख को अध्यादेश के बाद आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अंजनीकुमार झा समेत पदाधिकारी हटाए गए। आयोग नेतृत्व रहित बना। कुछ दिन बाद ही मंत्रीस्तरीय निर्णय से विनियमावली पास होकर सीटीईवीटी ने सीधे भर्ती शुरू कर दी। मंत्री पोखरेल की स्वीकृति वाली विनियमावली के विनियम ४ की उपधारा (३) में एसईई या एसएलसी के अंक या ग्रेड का आधार लेकर योग्य छात्रों की सूची जारी करने की व्यवस्था की गई है। इसका मतलब चिकित्सा शिक्षा के डिप्लोमा स्तर में प्रवेश परीक्षा नहीं होगी। बड़ी जीपीए प्राप्त करने वाले को अवसर मिलेगा। प्रवेश परीक्षा हटने से प्रतिस्पर्धा का निष्पक्ष आधार कमजोर होगा और निजी शिक्षा संस्थान आज़ादी से अपने मुताबिक छात्रों का चयन कर पाएंगे, आयोग के पूर्व अधिकारियों का कहना है। सीटीईवीटी के अधिकारी दावा करते हैं कि उन्होंने नया कार्यक्रम नहीं जोड़ा है और पिछले वर्ष आयोग के निर्धारित कोटा के अनुसार ही भर्ती प्रक्रिया चलाई गई है।

आयोग के सूत्र कहते हैं कि यह भर्ती प्रक्रिया ही नहीं बल्कि चिकित्सा शिक्षा प्रणाली के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। ‘अगर प्रवेश परीक्षा प्रणाली कमजोर हुई तो पुरानी बिमारियाँ फिर आएंगी,’ सूत्र ने कहा, ‘मेरिट खत्म होगी, पहुंच वाले अवसर कब्जा कर लेंगे और अंतत: स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता नष्ट हो जाएगी।’