
समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा की गई।
- पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने लोकतांत्रिक गणराज्य की रक्षा के लिए संविधान, संसद, न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस जैसे संस्थाओं की सुरक्षा आवश्यक बताई है।
- ओली ने कहा है कि लोकतंत्र के ये संस्थान कमजोर होंगे तो समाज मजबूत नहीं हो सकता और तानाशाही का खतरा बढ़ जाएगा।
- प्रणाली से असंतोष हो तो भी उसे वैधानिक तरीके से संबोधित करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था जरूरी है, उन्होंने स्पष्ट किया।
१५ जेठ, काठमांडू। नेकपा एमाले के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने लोकतांत्रिक गणराज्य की सुरक्षा हेतु संविधान, संसद, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया जैसे संस्थानों की रक्षा बेहद आवश्यक बताई है। उन्होंने कहा, यदि लोकतांत्रिक गणराज्य नहीं होगा तो जनता को सुख नहीं मिल सकता।
‘लोकतांत्रिक गणराज्य न होने पर समाज को क्या-क्या खोना पड़ता है, यह केवल गणराज्य न होने पर ही समझ में आता है, जो हमारी पुरानी पीढ़ी ने भोगा है,’ ओली ने गणराज्य दिवस के अवसर पर फेसबुक पर लिखा, ‘जब लोकतंत्र के ये संस्थान कमजोर हो जाते हैं, तो कोई भी समाज मजबूत नहीं बन सकता, जनता सुखी भी नहीं होती।’
उन्होंने आगे कहा कि यदि लोकतंत्र के संस्थान कमजोर हुए तो कोई समाज मजबूत नहीं हो सकता और जनता को भी सुख नहीं मिलेगा। इसलिए लोकतांत्रिक गणराज्य के अंगों की सुरक्षा आवश्यक है, इस पर उन्होंने बल दिया।
गणराज्य दिवस के मौके पर उन्होंने लोकतंत्र प्राप्ति के लिए हुए संघर्षों को याद करने और लोकतंत्र कमजोर होने पर भविष्य कैसा होगा, इस विषय पर शांति मन से सोचने की अपील की है।
‘लोकतांत्रिक गणराज्य के इन अंगों की रक्षा करना हम सभी के भविष्य की रक्षा करना है,’ ओली ने लिखा, ‘गणराज्य दिवस के पावन अवसर पर मैं सभी से आग्रह करता हूँ कि वे उत्साहित हुए बिना शांत मन से लोकतंत्र के लिए हुए कठिन संघर्षों को याद करें और यदि लोकतंत्र कमजोर हुआ तो भविष्य कैसा होगा, इस पर विचार करें।’
उन्होंने कहा कि जनता की निराशा से लाभ उठाकर संस्थाओं में अविश्वास फैलाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना तानाशाही शासन जन्म देने का खतरा पैदा करता है। इसलिए संविधान, संसद, न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस के अधिकार क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए और इन संस्थानों की रक्षा करनी चाहिए, जो वर्तमान में कुल मिलाकर गणराज्य की रक्षा है।
देश में कई राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं, लेकिन परिवर्तन की गति अपेक्षित तेज़ नहीं हो पाई है, यह गति सामाजिक चेतना पर निर्भर है, उन्होंने कहा। उन्होंने कहा, ‘गणराज्य का विकल्प नहीं है। परिवर्तन की गति जितनी तेज़ नहीं हो पाती, उतना असंतोष बढ़ सकता है, लेकिन उन असंतोषों को वैध रूप से समाधान करना भी लोकतांत्रिक प्रणाली से संभव है।’
